कुछ तो है..जो कि,

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    सेवा में श्री सतीश पँचम, द्वारा blog-post_24.html, सफ़ेदघर, मुम्बई...

    दो दिन पहले भाई सतीश पँचम जी का आलेख पढ़ा, वास्तव में कमज़ोर हूँ या समझिये अपनी मानवीय कमज़ोरियों के चलते मॉडरेशन की तलवार देख अक्सरहाँ आगे बढ़ लेता हूँ.. ऎसे विषयों पर जहाँ सँवाद-परिसँवादों का त्वरित आदान प्रदान सँभव न हो, मन उदिघ्न हो जाता है । उनके आलेख की सच्चाई से सहमत होते हुये भी कुछ न कह पाने की मन में मलिनता  व्याप्त थी । अस्तु प्रेषित है यह बिलम्बित टिप्पणी.... सच है, स्टीफन हॉकिंग के विचारों को उनके व...
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    अलविदा दोस्तों !

    आज लिखने को मत कहना .... होश उड़े हुये हैं, आँखें थकी हुई हैं, दिलबुझा पड़ा है.... जायें तो जायें कहाँ । बड़ा अच्छा रि्टर्न - गिफ़्ट दिया है...शातिर तूने । हमने तुमको जिताया , बदले में तुमने हमको मूताया । तुम्हें ममता की छाँव दिलायी.. तो तुमने  पीछे से जूता टिकाया । गज़्ज़ब है, भाई गज़्ज़ब है ! इसी हफ़्ते भारतीय मुग़ालता आयोग ( पढ़ें योजना आयोग ) की रिपोर्ट पढ़ के सकते में था... कि, उन्होंनें सीधा आँकड़ा बैठा दिया कि यदि क...
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    गुमशुदा मेलों की तलाश में

    ऎसा नहीं है कि, मुर्गा बाँग न दे तो सवेरा ही न हो ! होगा, अवश्य होगा और होता ही रहा है । तो फिर, दिन को मुर्गे की बाँग से जोड़ने का सबब ? मनुष्य को अपनी जागृतावधि तय करने लिये शायद एक डिमार्केशन लाइन की ज़रूरत महसूस हुई होगी, इस प्रारँभ-बिन्दु पर उसने मुर्गे के उद्घोष को पकड़ लिया । भले ही अब तक सभ्यतायें उसे हलाल करती आयी हैं, पर मुर्गा अपने मार्ग से कभी न हटा । जैसे उसने इसे अपने कर्तव्य से ही जोड़ लिया हो, इससे बेपरवा...
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  • वावा एक सलवार शूट

    बाबा.. बाबा...बाबा.. अरे अब बस भी करो, बाबा !...

    सोचा था कि योगागुरु रामदेव यादव पर कुछ न लिखूँगा... चहुँ ओर बाबा का शोर, उफ़ ! तथाकथित बाबा को लेकर पूरे ब्लॉगजगत सहित, हमारा प्रगतिशील जुगाली समाज दो घड़ों में बँट गया है... यदि बाबा पर मैं कुछ लिख देता तो कितनी गालियाँ सुननी पड़तीं, कि खुद रामदेव भी शर्मा जाते । धनदौलत के अलावा यही सम्मोहित चेले-चपाटे तो उनकी पूँजी हैं, जिन्हें मिथ्या मान कर वह कभी भी त्याग सकते हैं । जान रहेगी तो हिन्दुस्तान में चेलों की कमी थोड़े ही ...
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    सर जी, फोटो अच्छी आयी है ?

    सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? मेरा सिर मरीज पर झुका हुआ है, मैं हाथ उठा कर रुकने का इशारा करता हूँ । फिर दोहराया जाता है, " सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? " यह आलोक हैं.. आलोक त्रिपाठी ! सामने आलोक जी खड़े हैं, मेरे सामने अपने नये मोबाइल सेट का स्क्रीन लहराते हुये.. उसमें है मेरी तस्वीर ! नोकिया 6500 या ऎसा ही कुछ.. शोरूम में अकेले जाने से घबड़ा रहे थे । आलोक.. मेरा Liaison Representative को आप लोग क्या कहवे करें है...
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जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल

Jul 8th

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग बेतक़ल्लुफ़

20 टिप्पणियाँ

आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और …………ठल्ले

उब दिनों एक गाना सुना करता था, उसे अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ भी लिया ( अभी  ईस्वामी  की टिप्पणी के बाद यह अँश जोड़ा है.. धन्यवाद स्वामी ! )

तो एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास फेल.. अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई " बस इसी को पकड़ लिया, " रेल जब हुईहै, तौनि डब्बवा भी हुईबे करि… डब्बवा मा जब हुईहैं जगह तो सवारिन केरि लदबे करी… , सवारिन केरि लदबे करीऽऽ भईया सवारिन केरि लदबे करीऽऽ "

बस इसी को पकड़ लिया, इसके दर्शन को आत्मसात कर लिया.. लगे हुये डिब्बों को परखा, फ़र्स्ट किलास.. सेकेन्ड किलास, जनता, पैसेन्ज़र, … आगे पढ़िये

टिप्पणियों पर, निंदक नियरे राखिये, बेतक़ल्लुफ़, संगी साथी

हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

Jul 6th

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग बेतक़ल्लुफ़

18 टिप्पणियाँ

सोचा कुछ – हुआ कुछ और ही है निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक बेटी को फोन लगाया, उछल पड़ी " पापा सच्चीऽऽ ? बेटे को मेसेज़ किया, पलटवार हुआ " देखें कब तक ? बिसूरता बुद्धू बक्सा खिल पड़ा, बोला आजा मेरे कोल आ साड्डे नाल मनों अतिरँजन है, है मामला तेरे च्वायस का तुझे वधू बालिका दिखाऊँ, या गहनों से अटी गरीबी से हरसाऊँ नहीं समाचार दिखाओ यानि सम अचार, मैं जिससे रोटी तो खाऊँ घणे फिट टाइम तू आया, बज़ट आण आला है, बोल वोई दिखाऊँ बजट क्या रे ? वह आगे पढ़िये
टाइमपास, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका, बेतक़ल्लुफ़, मेरा लिखा मत पढ़ो, होली

हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है

Jul 4th

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग [...]

12 टिप्पणियाँ

यह है जुलाई का महीना, और  इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने  रखती है । इन  पँक्तियों के लेखक को  विश्वास है कि, आप में से  अधिकाँश  कुछ कुछ  ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो  इस  दिवस  पर  डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली  में यह  प्रतीक्षित  दिवस  त्रयदिवसीय  स्वास्थ्य  मेले  के  उपराँत  आज  की  सुविधाजनक  तिथि  पर  ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया  जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है आगे पढ़िये

कुछ ख़ास मौकों पर, धूप छाँव, संगी साथी

Amar Kumar has sent you a cold drink

Jun 21st

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग बेतक़ल्लुफ़

13 टिप्पणियाँ

पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और  जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के चले आये हैं, तो यह ब्ला ब्ला ब्लाग भी झेलिये..

 

आजकल अपुन के मेल बाक्स में कोल्ड-ड्रिंक की लूट मची है  ! मेरे ढाँचें का डाक्टरी वाला टेम्पलेट अँग्रेज़ी से भले बना हो, पर कंटेन्ट तो देसी रहेगा ! जैसे दूल्हे राजा का कितना भी ऋँगार कर देयो, उनका बाबू राजा बनाय के जयमाल के लिये ऊँची कुर्सी पर बईठाय देयो ! चारों तरफ़ फ़ोकस ही… आगे पढ़िये

टाइमपास, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका, बेतक़ल्लुफ़, मेरा लिखा मत पढ़ो, होली

विस्मृत बिस्मिल और ब्लागर च तनवीर

Jun 13th

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग [...]

10 टिप्पणियाँ

पहले तो यह बता दूँ कि,यह पोस्ट भँग की तरँग में नहीं लिखी जा रही है । मानता हूँ कि शीर्षक बड़ा अटपटा बन पड़ा है, बल्कि यदि मुझे स्वयँ ही टिप्पणी देनी होती, तो उसे फ़कत एक लाईन में समॆट देता, " तेली के सिर पर कोल्हू ! " पर इस शीर्षक के पीछे एक मज़बूरी भी है , कृपया इसे सारथीय टोटका न मानें । मँगलवार 9 जून को सायँ चँद सतरें मरहूम हबीब तनवीर साहब पर पोस्ट करने का इरादा था कि, अचानक एक पारिवारिक आपदा आन पड़ी । मेरे बहनोई देवाशीष नहीं रहे,अब वह स्वर्गीय देवाशीष के नाम से याद किये जाते रहेंगे । अस्तु, यह रह ही गया ।

कल वृहस्पतिवार 11 जून को हुतात्मा बिस्मिल जी की जयँती थी ।… आगे पढ़िये

आब्ज़ेक्शन मी लार्ड, कुछ तो है, निंदक नियरे राखिये, संगी साथी

बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है

Jun 5th

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग बेतक़ल्लुफ़

13 टिप्पणियाँ

कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप  यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक साँप निकला था, और मैंने  उसे भाग जाने दिया । अभी भी वह यहीं है, किसी ठँडी जगह में.. । रिशि मुझे नसीहत दे रहे थे, कि आपने ’ उसे नहीं मारना  ’ कह कर ठीक नहीं किया । मैं उनको धरती पर साँपों के होने का महत्व समझा रहा था, इनका भी जैविक पर्यावरण में एक अहम किरदार है । इतने में रिशि महाशय मौजिया पड़े फिर तो अपने लीडर्स इनसे… आगे पढ़िये

टाइमपास, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका, बेतक़ल्लुफ़, मेरा लिखा मत पढ़ो, होली

लै भाई, मन्नैं बी इक पहेल्ली पूछ लैण दे ।

Jun 1st

टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग बेतक़ल्लुफ़

19 टिप्पणियाँ

धन्यवाद भाई जी, तन्नैं होश दिलायी के बिन पहेल्ली पुच्छै इह निट्ठल्ले को ब्लागर मानता ए कोण्या ? भाई, आप बात तो ठीक कहवै सौं, बुरी सँगत में पड़कै, मैं भी बड्डी बड्डी पोस्ट लिखण लाग्यै लग सै । जे पहेल्ली ना पुच्छी ते फेर ब्लागर किस्सा ? आज रस्म अदा कैण वास्ते इक निट्ठल्ली पहेल्ली हो जाण दै । मन्नैं इनाम वीनाम देना कोणी, मर्ज़ी हो बूझ.. ना मर्ज़ी बने  तो टिप्पण आले बक्से से परे नट जा ।          ये रही अपणी पहेल्ली..

एक मारे से मरा काण खोल के पढ लै, एक मारे से मरा.. दो सँदेशे से मरे और सँदेशी मरा जब तीन चले परदेश ते कुल पहेल्ली यो करके बनी के

एक मारे से मरा दो सँदेशे आगे पढ़िये

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    Blogger Elite Plebian अनूप शुक्ल अपठनीय अमिताभ बच्चन अल-क़ायदा अज़ीब आदमी आत्मग्लानि आब्ज़ेक्शन आब्ज़ेक्शन मी लार्ड इलाहाबादी उनकी टिप्पणियों पर उर्दू उर्दू किसकी ज़ुबाँ एक टिप्पणी एक साफ सुथरे दिमाग की कभी कभी मेरे दिल में... कमज़ोर सरकारों कीपरंपरा कातिल ज़वानी-अदा मस्तानी कुछ तो है कुछ ख़ास मौकों पर खिंचाखिंचाई जात न पूछौ साधु की टाइमपास टिप्पणियों पर तलाश साफ़ सुथरे दिमाग की ताकि सनद रहे .. धूप छाँव न जाने क्यों परिभाषित न हो सका निंदक नियरे राखिये निट्ठल्ले का फोटोब्लाग बहस जारी रखिये बात बेबाक बुरबकई बेतक़ल्लुफ़ ब्लॅगिया का झस मेरा लिखा मत पढ़ो यह कोई गप्प नहीं यह कोई तक़ल्लुफ़ नहीं ये डाक्टर वर्गविहीन संगी साथी संदर्भहीन व्याख्यायें होली
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