जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल
Jul 8th
आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और …………ठल्ले
उब दिनों एक गाना सुना करता था, उसे अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ भी लिया ( अभी ईस्वामी की टिप्पणी के बाद यह अँश जोड़ा है.. धन्यवाद स्वामी ! )
तो एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास फेल.. अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई " बस इसी को पकड़ लिया, " रेल जब हुईहै, तौनि डब्बवा भी हुईबे करि… डब्बवा मा जब हुईहैं जगह तो सवारिन केरि लदबे करी… , सवारिन केरि लदबे करीऽऽ भईया सवारिन केरि लदबे करीऽऽ "
बस इसी को पकड़ लिया, इसके दर्शन को आत्मसात कर लिया.. लगे हुये डिब्बों को परखा, फ़र्स्ट किलास.. सेकेन्ड किलास, जनता, पैसेन्ज़र, … आगे पढ़िये
हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली
Jul 6th
हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है
Jul 4th
यह है जुलाई का महीना, और इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने रखती है । इन पँक्तियों के लेखक को विश्वास है कि, आप में से अधिकाँश कुछ कुछ ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।
यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो इस दिवस पर डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली में यह प्रतीक्षित दिवस त्रयदिवसीय स्वास्थ्य मेले के उपराँत आज की सुविधाजनक तिथि पर ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है आगे पढ़िये
Amar Kumar has sent you a cold drink
Jun 21st
पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के चले आये हैं, तो यह ब्ला ब्ला ब्लाग भी झेलिये..
आजकल अपुन के मेल बाक्स में कोल्ड-ड्रिंक की लूट मची है ! मेरे ढाँचें का डाक्टरी वाला टेम्पलेट अँग्रेज़ी से भले बना हो, पर कंटेन्ट तो देसी रहेगा ! जैसे दूल्हे राजा का कितना भी ऋँगार कर देयो, उनका बाबू राजा बनाय के जयमाल के लिये ऊँची कुर्सी पर बईठाय देयो ! चारों तरफ़ फ़ोकस ही… आगे पढ़िये
विस्मृत बिस्मिल और ब्लागर च तनवीर
Jun 13th
पहले तो यह बता दूँ कि,यह पोस्ट भँग की तरँग में नहीं लिखी जा रही है । मानता हूँ कि शीर्षक बड़ा अटपटा बन पड़ा है, बल्कि यदि मुझे स्वयँ ही टिप्पणी देनी होती, तो उसे फ़कत एक लाईन में समॆट देता, " तेली के सिर पर कोल्हू ! " पर इस शीर्षक के पीछे एक मज़बूरी भी है , कृपया इसे सारथीय टोटका न मानें । मँगलवार 9 जून को सायँ चँद सतरें मरहूम हबीब तनवीर साहब पर पोस्ट करने का इरादा था कि, अचानक एक पारिवारिक आपदा आन पड़ी । मेरे बहनोई देवाशीष नहीं रहे,अब वह स्वर्गीय देवाशीष के नाम से याद किये जाते रहेंगे । अस्तु, यह रह ही गया ।
कल वृहस्पतिवार 11 जून को हुतात्मा बिस्मिल जी की जयँती थी ।… आगे पढ़िये
बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है
Jun 5th
कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक साँप निकला था, और मैंने उसे भाग जाने दिया । अभी भी वह यहीं है, किसी ठँडी जगह में.. । रिशि मुझे नसीहत दे रहे थे, कि आपने ’ उसे नहीं मारना ’ कह कर ठीक नहीं किया । मैं उनको धरती पर साँपों के होने का महत्व समझा रहा था, इनका भी जैविक पर्यावरण में एक अहम किरदार है । इतने में रिशि महाशय मौजिया पड़े फिर तो अपने लीडर्स इनसे… आगे पढ़िये
लै भाई, मन्नैं बी इक पहेल्ली पूछ लैण दे ।
Jun 1st
धन्यवाद भाई जी, तन्नैं होश दिलायी के बिन पहेल्ली पुच्छै इह निट्ठल्ले को ब्लागर मानता ए कोण्या ? भाई, आप बात तो ठीक कहवै सौं, बुरी सँगत में पड़कै, मैं भी बड्डी बड्डी पोस्ट लिखण लाग्यै लग सै । जे पहेल्ली ना पुच्छी ते फेर ब्लागर किस्सा ? आज रस्म अदा कैण वास्ते इक निट्ठल्ली पहेल्ली हो जाण दै । मन्नैं इनाम वीनाम देना कोणी, मर्ज़ी हो बूझ.. ना मर्ज़ी बने तो टिप्पण आले बक्से से परे नट जा । ये रही अपणी पहेल्ली..
एक मारे से मरा काण खोल के पढ लै, एक मारे से मरा.. दो सँदेशे से मरे और सँदेशी मरा जब तीन चले परदेश ते कुल पहेल्ली यो करके बनी के
एक मारे से मरा दो सँदेशे आगे पढ़िये








