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Feb
07

यह कोई पोस्ट नहीं है ।

यह कोई पोस्ट नहीं है । आज की ( असली और प्राचीन ) चिट्ठाचर्चा पर रतलामी भाई से असहमत होते हुये, यह टिप्पणी की तो है । पर आजकल मूँछों पर ताव देकर टिप्पणियों के डिलीट किये जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है ( हालाँकि बिना मूँछ वाले इसमें आगे हैं ), सो यह ड्राफ़्ट यहाँ सहेज़ दिया । यह कोई पोस्ट नहीं है ।

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आदरणीय महोदय, यह सवाल गैर वाज़िब है । कोई भले ही न माने, टिप्पणियों का कोई विकल्प नहीं ! रही बात ई-मेल या फोन से टिप्पणी करने की, तो वह गैर-वाज़िब है, क्योंकि… ► आगे पढ़िये ►

Jan
11

मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है

एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. blogger-o-wordpress सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़  लिहै  से  उनकी  अकड़  की  तो  आप  पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई दुईनो तीनों जन उनके ठियाँ पर जाँय अउर टिपिया आवत रहें । गँज़ी चाँद पर टिपियावै… ► आगे पढ़िये ►

Oct
04

ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये

ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ??  क्यूँ ??

क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा  जैसे  आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है । पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये । यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत  ही जुड़े रहे, परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी… ► आगे पढ़िये ►

Sep
28

क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट – हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब

मसल है… खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब

अर्थात, हे पाठकों यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी, तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ !

खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पणी के लिये पोस्ट चुन रहा था । रात्रि के 11.37 पर पेज़ रिफ़्रेश करने को F5 दबाया और आईला ’ रुकावट के लिये खेद है ’ जैसा ब्लागवाणी का पन्ना चमकने लगा । अफ़सोस दिल गड्ढे में जा गिरा । कीबोर्डवा से फौरन F5 नोंच कर फेंक दिया, ससुरी यही है, झगड़े की जड़ !  Freedom at Midnight पढ़ने में मन लगाना चाहा, देसी रियासत रज़वाड़ों की खुदगर्ज़ी के किस्से पढ़ कर अपनी कौम पर गर्व हो आया, लगा कि हम… ► आगे पढ़िये ►

Sep
26

क्राँति की तलवार – इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

शहीद भगत सिंह जन्मदिन पर विशेष

From INTERNET

अलीपुर बमकाँड के आरोपी श्री यतीन्द्रनाथ दास 63 दिन के  singh_b_unshavenआमरण  अनशन  के  पश्चात   ब्रह्मलीन हो गये  । सँभवतः ब्रिटिश सरकार उनको मिसगाइडेड हूलीगन से अधिक कुछ और न मानती थी । यह इसलिये भी कि शायद न तो इनका कोई राजनैतिक कद बन पाया था और न ही इनके सत्याग्रह को कोई राजनैतिक समर्थन मिल सका । नेतृत्व स्तर पर यह उपेक्षित रखे गये । इसके बावज़ूद भी आम जनता ने इनकी मृत्यु को शहादत का दर्ज़ा दिया और पूरे देश में इन्क़लाब ज़िन्दाबाद की लहर गूँज उठी । यह इन्क़लाब का सही मायनों में सूत्रपात था, जब यह नारा खुल

Sep
23

कवि हृदय वैज्ञानिक का चकित आध्यात्म्य

From PRINT समँदर की लहरें, सुनहरी रेत, श्रद्धानत तीर्थयात्री रामेश्वरम द्वीप कि वह छोटी-पूरी दुनिया सबमें तू निहित सबमें तू समाहित अधिकाँश पाठक इस वैज्ञानिक के परिचय  को  लेकर  उत्सुक  हो  उठे  होंगे ।  शायद  इनकी  इस कविता  के  इतने  अँश से ही आप इनका अँदाज़ा भी लगा चुके हों ।

मेरा इन दिनों डाक्टर अवुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम की विंग्स आफ़ फ़ायर का पुनर्वलोकन चल रहा है । पर इस बार पढ़ने में मैं मैं कई कई जगह ठहरने को बाध्य हुआ । यदि  अपनी  बात  कहूँ  तो, एक  डाक्टर  के नाते जीवन के तत्व को लेकर मेरे विचार उन अपार विद्युत-चुम्बकीय ऊर्ज़ाओं तक जाकर ठहर जाती है, जो  कि  इस  शरीर  के  हर  क्रियाकलाप, यहाँ

Sep
09

मज़बूत होता जाता रिश्ता

" शारीरिक जीवन के इस कैदखाने में आने से पहले हम कहाँ थे और क्या थे ? " " ये समझदार, सँज्ञाशील और शरीर में  बेचैन रहने वाली आत्मायें हमारे शरीर में आने से पहले कहाँ थीं और क्या थीं ? इससे पहले कि ज़माना हमें निरर्थक आवाज़ बना कर दुनिया में लाया, हम किस सँतोष की साँस ले रहे थे ? "

" हमारे प्राण इन स्वरूपों में बदलने से पहले किस स्थिति में थे ? " " सपनों की दुनिया में बोलती हुई यह जागृति, विचारों से सजा यह चिंतन, यह आनन्द और दुःख, प्रेम और घृणा से बँधी हुई अभिलाषायें माताओं के पेट में ही पैदा हुई या आकाश के वायुमँडल में ? " "क्या इससे पहले की आकाँक्षा हमें जीवन की गोद में ले आई… ► आगे पढ़िये ►

Sep
07

चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ… यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू… वाः वाः कौन कहता है, कि  आपने  कभी  कोई  वाह-वाह पोस्ट भी लिखी है ? किसीके यह पूछने से पहले ही, यह बता देता हूँ कि, भाई इब मन्नैं भी एक गुट बना लिया है । आठ-दस फोन नम्बर भी बटोर लिया है । चाहोगे तो अपने पोस्ट किये जाने वाली टिप्पणी का डिक्टेशन भी दे दूँगा, मुफ़्त.. मुफ़्त.. मुफ़्त.. !
भले आप दरिया किनारे जाकर मुर्गी के अँडे छील कर उबाल लो, उस  उबले  अँडे का

Sep
06

इनकी डायरी में कैद उनकी वर्दियाँ

बहुचर्चित शशि हत्याकाण्ड की गूँज कुछ थम सी गयी है ।  पर  मक़तूल  के  रिश्तेदार, कातिल   और पैरोकार तो इसे अपने अपने ढँग से जी ही रहे हैं !  इस  हत्याकाण्ड  के  मुख्य  आरोपी  आनन्द सेन  के साथ अन्य आरोपियों में सीमा आज़ाद भी सह-आरोपी ठहरायी गयी हैं, केस  विचाराधीन  है.. ज़ाहिर है, कानून का पहिया अपनी ही रफ़्तार से घूमेगा । फिलहाल सभी अभियुक्त सलाखों की निगहबानी में हैं । जैसा कि अक्सर होता है, आदमी  ज़ेल  की  तन्हाईयों  में  चिंतक  और  कवि  हो  जाता है । भला सीमा आज़ाद ही अछूती क्यों रहें ? आजकल वह भी कवितायें लिखने लग पड़ी हैं ।

इस वक़्त सीमा ज़मानत पर ज़ेल से बाहर हैं पर उनकी डायरी जो कि ज़ेल में लिखी जा रही थी… ► आगे पढ़िये ►

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