भूत के मुँह मॆं राम-नाम
Apr 26th
रामचन्द्र कह गये सिया से..ऎसा उलटयुग आयेगा,
सँत जपेंगे गाली-गुफ़्ता..और भूत रामनाम गायेगा
लो जी आप हँस दिये… निट्ठल्ले से अपनी वायदाखिलाफ़ी की माफ़ी माँग कर मैं यहाँ सीरियस ब्लॉगिंग करने आया, और…. और, आप हँस दिये ! हिन्दुस्तान तरक्की क्यों करे जब हमारे आप जैसे लोग ही हर मुद्दे में लोचा ढ़ूँढ़ने लगते हैं । दरअसल मैं ऎसी एक पोस्ट पहले भी लिख चुका हूँ, पर्यावरण पर, दोस्तों ने कहा कि अमाँ डॉक्टर… कहाँ लोट रहे हो, ज़मीन से उठ कर किताबी हकीकतों में आओ ! तभी से मैं सट्ट मार गया । दूजी बार ऎसी बदख्याली बीते अक्टूबर में आयी, जब लखनऊ मुरादावाद में
आगे पढ़ियेसर जी, फोटो अच्छी आयी है ?
Apr 7th
सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? मेरा सिर मरीज पर झुका हुआ है, मैं हाथ उठा कर रुकने का इशारा करता हूँ । फिर दोहराया जाता है, ” सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? ” यह आलोक हैं.. आलोक त्रिपाठी ! सामने आलोक जी खड़े हैं, मेरे सामने अपने नये मोबाइल सेट का स्क्रीन लहराते हुये.. उसमें है मेरी तस्वीर ! नोकिया 6500 या ऎसा ही कुछ.. शोरूम में अकेले जाने से घबड़ा रहे थे । आलोक.. मेरा Liaison Representative को आप लोग क्या कहवे करें हैं, मैं नहीं जानता.. मैं तो इन्हें गडबड़झाला प्रतिनिधि कहता हूँ, क्लिनिक और लैब का मल्टीपरपॅस पुर्जा ! और किसी कि हिम्मत न होती, पर यह पितृहीन बालक मेरे स्नेह और सानिध्य में कुछ अधिक लड़ैता हो गया… आगे पढ़िये
गुमशुदा मेलों की तलाश में
Mar 23rd
ऎसा नहीं है कि, मुर्गा बाँग न दे तो सवेरा ही न हो ! होगा, अवश्य होगा और होता ही रहा है । तो फिर, दिन को मुर्गे की बाँग से जोड़ने का सबब ? मनुष्य को अपनी जागृतावधि तय करने लिये शायद एक डिमार्केशन लाइन की ज़रूरत महसूस हुई होगी, इस प्रारँभ-बिन्दु पर उसने मुर्गे के उद्घोष को पकड़ लिया । भले ही अब तक सभ्यतायें उसे हलाल करती आयी हैं, पर मुर्गा अपने मार्ग से कभी न हटा । जैसे उसने इसे अपने कर्तव्य से ही जोड़ लिया हो, इससे बेपरवाह कि नाशुक्रगुज़ार कौमें उसकी बलि को पचा कर भूल भी सकती है, वह इन कौमों को जगाने का काम बेखौफ़ करता आया ।
झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
Jul 3rd
जब मैं छोटा बच्चा था, कभी शरारत नहीं करता था.. ढँग की जब कोई बात सुने ना, फिर मैं दँगा करता था आज मेरा मन निट्ठल्ला डीप-रेस्ट है, मैंनें दू-दुगो पोस्ट लिक्खड्डाली.. और एक सब्सक्राइबर तक झाँकने न आया । ऍग्रीगेटर के टोट्टे में सब अपनी अपनी टिप्पणी गिनने में व्यस्त हैं… इधर अपने को दँगा करने का मन हो रैया है । टूँऊँउ ऊँ, जिन्हें नाज़ था बेलागिंग की बुलन्दियों पर.. कहाँ है, कहाँ है, कोहाँयऽ हँयऽऽऽ.. कोहाँय हँय टूँऊँउ ऊँ, ऊँउँ.. वो मठाधीशों की धौंसें, वो एसोशियन… आगे पढ़िये
“… .. ….. .. … .. ? ”
May 6th
इस पोस्ट के कई शीर्षक दिमाग में घूम रहे थे, टिप्पणी मॉडरेशन से अपना कद कैसे बढ़ाये । कुशल टिप्पणी प्रबँधन से ब्लागरीय सौहाद्र कैसे कायम करें विषयपरक टिप्पणियाँ बहुमूल्य है, इसे बरबाद होने से रोकें स्पैम की आड़ में टिप्पणियाँ और बड़का ब्लागर, मुझे तो कोई जमा नहीं.. आप अपनी सुविधानुसार इनमें कोई एक चुन लें । यदि सभी चुन लेंगे तो भी मेरा क्या ले जायेंगे ?
नॉऊ प्रोसीड टू पोस्ट ! लगता है, आज भी इस नाज़ुक मौके पर पोस्ट न लिख पाऊँगा । चिरकालीन विघ्नसँतोषी जीव पँडिताइन का प्रवेश.. वह विश्वामित्र की मेनका न सही, पर अभी तलक कुछ ख़ास हैं । सो, अपने असँयमित होने को सिकोड़ उन्हें तवज़्ज़ों देनी ही पड़ी..
आज का अख़बार देखा ? नहीं, नेट खोल कर निट्ठला बैठा हुआ… आगे पढ़िये
आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो…
Apr 26th
इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक फायदा तो है ही कि, उनसे ऍलार्म का काम बखूबी लिया जा सकता है । फिर यह तो ठहरीं, ढीले स्प्रिंग की बिगड़ी हुई घड़ी ! अल्ल्सुबह पौने तीन बजे ही इन्होंनें टुन्नु टुन्नु की ऎसी रट लगायी कि उठना ही पड़ा… दिल लगाया ब्लॉगिंग से तो चैन क्या चीज़ है .. पहले तो अज़ीब आदमी से दो-चार होने का फैसला लिया, बेचारा वेबलॉग उपेक्षित पड़ा है । इस अज़ीब आदमी… आगे पढ़िये









कई दोहराव की गवाह एक लम्बी टिप्पणी
Apr 15th
टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग एक साफ सुथरे दिमाग की
12 टिप्पणियाँ
टिप्पणी नहीं, यह सच्चा वाकया है, जो 1992 में मेरे साथ गुज़री थी । सँयोग की बात है यह 3 ब्लॉगपोस्टों पर दोहराई गयी । पहली बार श्री ज्ञानदत्त पाड़ेय की पोस्ट पर दूसरी बार का मुझे ठीक से स्मरण नहीं, और आज तीसरी बार श्री अफ़लातून जी के पोस्ट पर यही टिप्पणी माकूल लगी ।
जब पहले पहले शयनयान चला था, बडी अफ़रातफ़री थी नियम कायदा स्पष्ट नही था ( वैसे अभी भी कहा है,अपनी अपनी व्याख्याये है ) तो शिमला से एक अधिवेशन से एम०बी०बी०एस० लौट रहा था , अम्बाला से इस शयनयान मे शयन करता हुआ सफ़र कर रहा था बीबी बच्चे आरक्षण दर्प से यात्रा सुख ले रहे थे, कभी नीचे कभी ऊपर आगे पढ़िये