Posts tagged संदर्भहीन व्याख्यायें
माडरेशन की प्रतीक्षा में
Sep 6th
इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?" हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये । पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।" दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?" अब शर्त लगा ले.. और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी । किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है… आगे पढ़िये
जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये
May 17th
बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप यही समझ लीजिये कि “ बुद्धू को कहाँ बुद्धू बक्सो सों काम ? “ फिर भी.. कुछ तो है, कि आज एक बेकार सा मुद्दा पकड़ कर बैठा हूँ, कि न्याय मिले पहले तो आप इन जीवनदास से मिलिये मिल भये… क्या समझे ? अभी फ़िलवक़्त मुझे प्लाई-व्लाई तो लेनी नहीं है, सो मैं तो यही समझ रहा हूँ, कि भारतीय न्याय-वयवस्था इतनी धीमी और लचर… आगे पढ़िये
देसी मायने-ज़मेन्ट गुरु, आज किये खुलासा
Apr 14th
सुना है, आज शाम IIM के पुरफ़ेसर लोगों को भी चारा चटा देने वाले श्रीयुत लालू प्रसाद यादव ’ जी ’ ने अपना चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद एक प्रौस-कानफ़िरेन्स बुलाया था । जिसमें उन्होंने जेपी अन्दौलन में अपने जेल जाने के अलावा.. देश के लिये किये गये अन्य त्यागों का भी ख़ुलासा किया ! चैनल वालों की तरह.. अपनी तो नमक मिर्च लगाने की आदत नहीं, सो.. पूरा ब्यौरा ज्यौं का त्यौं पेश कर देता हूँ !
हम आप लोग का इसलीए बोलाया हूँ, के आपका ई मेडीया में एक दू ठो बुरबक भाई.. ऎ हाल्ला मत मचाईये… आगे पढ़िये
चला बाघ मंत्री बनने !
Jan 14th
सुबह सुबह पंडिताइन ने झकझोर मारा, ” एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया ! अरे, मैं तो अपना ही किस्सा लेकर बैठ गया, एक आवश्यक औपचारिकता तो पहले पूरी कर लूँ ! आपसब ब्लागर भाई व भौजाईयों को समस्त उत्तरायण पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें ! जिनको भौजाई कहलाने में आपत्ति हो, कृपया नोट करें.. वह मेरी पोस्ट भले न पढ़ें, पर, उनका एतराज़ किसी भी दशा में दर्ज़ नहीं किया जायेगा ! एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया ! “ क्या आगे पढ़िये
भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !
Jan 5th
पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008
हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! " यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही… आगे पढ़िये
सनद रहे कि यह नकल है..
Dec 7th
अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ? यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे.. इस पोस्ट के मूल लेखक को… नहीं पहचाना ? कोई बात नहीं., फिर तो.. यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया । ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे। ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि आगे पढ़िये
घी के लड्डू, टेढ़े ही सही …
Nov 23rd
आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये, XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े आगे पढ़िये



