Posts tagged बेतक़ल्लुफ़
“… .. ….. .. … .. ? ”
May 6th
इस पोस्ट के कई शीर्षक दिमाग में घूम रहे थे, टिप्पणी मॉडरेशन से अपना कद कैसे बढ़ाये । कुशल टिप्पणी प्रबँधन से ब्लागरीय सौहाद्र कैसे कायम करें विषयपरक टिप्पणियाँ बहुमूल्य है, इसे बरबाद होने से रोकें स्पैम की आड़ में टिप्पणियाँ और बड़का ब्लागर, मुझे तो कोई जमा नहीं.. आप अपनी सुविधानुसार इनमें कोई एक चुन लें । यदि सभी चुन लेंगे तो भी मेरा क्या ले जायेंगे ?
नॉऊ प्रोसीड टू पोस्ट ! लगता है, आज भी इस नाज़ुक मौके पर पोस्ट न लिख पाऊँगा । चिरकालीन विघ्नसँतोषी जीव पँडिताइन का प्रवेश.. वह विश्वामित्र की मेनका न सही, पर अभी तलक कुछ ख़ास हैं । सो, अपने असँयमित होने को सिकोड़ उन्हें तवज़्ज़ों देनी ही पड़ी..
आज का अख़बार देखा ? नहीं, नेट खोल कर निट्ठला बैठा हुआ… आगे पढ़िये
आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो…
Apr 26th
इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक फायदा तो है ही कि, उनसे ऍलार्म का काम बखूबी लिया जा सकता है । फिर यह तो ठहरीं, ढीले स्प्रिंग की बिगड़ी हुई घड़ी ! अल्ल्सुबह पौने तीन बजे ही इन्होंनें टुन्नु टुन्नु की ऎसी रट लगायी कि उठना ही पड़ा… दिल लगाया ब्लॉगिंग से तो चैन क्या चीज़ है .. पहले तो अज़ीब आदमी से दो-चार होने का फैसला लिया, बेचारा वेबलॉग उपेक्षित पड़ा है । इस अज़ीब आदमी… आगे पढ़िये
मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…
Mar 7th
इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप अपनी प्रति सुरक्षित करवा लें )
साथ ही मैं मैं रवि छत्तीसगढ़ी रवि रतलामी भाई से अनुरोध करूँगा कि यदि वह मेरी हरकतों को अनदेखा न कर सकें, तो उसका समर्थन अवश्य करें । मेरे 19 वर्ष के लेखन अनुभव में इस प्रकार का लड़कपन ज़ायज़ है !
मैं आज की चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ .. कारण निताँत व्यक्तिगत है… आगे पढ़िये
ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !
Mar 2nd
लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा ।
ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने तीसरा ठोका, दिल इस कदर बल्ले बल्ले होया, कि इक माहौल बन गया.. ना जी, ये तो सेलेब्रेट का मामला है, मौका और माहौल दोनों आन मिले उम्मीद थी कि गला-वला तर करने को आज गृह मँत्रालय से अँतरिम राहत मिल जायेगी । पर सनम जी ?
वह तो झू्ठियों की सरदार निकलीं । चहक कर उचकीं, ऒऎ क्या बात है, " चक दे इँडिया !" और पलट कर मेरी … आगे पढ़िये
मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है
Jan 11th
एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो वहू ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़ लिहै से उनकी अकड़ की तो आप पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई… आगे पढ़िये
ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये
Oct 4th
ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ?? क्यूँ ??
क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा जैसे आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है । पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये । यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत ही जुड़े रहे, परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी… आगे पढ़िये
चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो
Sep 7th



