Posts tagged धूप छाँव
भूत के मुँह मॆं राम-नाम
Apr 26th
रामचन्द्र कह गये सिया से..ऎसा उलटयुग आयेगा,
सँत जपेंगे गाली-गुफ़्ता..और भूत रामनाम गायेगा
लो जी आप हँस दिये… निट्ठल्ले से अपनी वायदाखिलाफ़ी की माफ़ी माँग कर मैं यहाँ सीरियस ब्लॉगिंग करने आया, और…. और, आप हँस दिये ! हिन्दुस्तान तरक्की क्यों करे जब हमारे आप जैसे लोग ही हर मुद्दे में लोचा ढ़ूँढ़ने लगते हैं । दरअसल मैं ऎसी एक पोस्ट पहले भी लिख चुका हूँ, पर्यावरण पर, दोस्तों ने कहा कि अमाँ डॉक्टर… कहाँ लोट रहे हो, ज़मीन से उठ कर किताबी हकीकतों में आओ ! तभी से मैं सट्ट मार गया । दूजी बार ऎसी बदख्याली बीते अक्टूबर में आयी, जब लखनऊ मुरादावाद में
आगे पढ़ियेनो.. नो.. नो.. दर्पण दर्शन क्यों ?
Sep 9th
आज सुबह सोकर उठा..वह तो देर सबेर सभी उठते ही हैं, ख़ास बात क्या है ? लेकिन आज मेरा मन कुछ भारी था, अनमना सा बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठा शरीफ़े में आते हुये फूलों की कलियाँ गिन रहा था । वह बगल में खड़ी हो जैसे आर्डर ले रही हों, “ ब्लैक टी या नींबू पानी ? ” कुछ ज़वाब दूँ कि उससे पहले ही वह पत्नी-अवतार में दरस दे दिहिन, “ जो बोलना है, जल्दी बोलो.. अभी बहुत काम है । अभी नहाया भी नहीं हैं, तुम मैक्सी में घूमते देख चिल्लाने लगोगे !
सुघड़ पत्नियाँ पति का ज़वाब सुनने का इंतेज़ार नहीं किया करतीं, सो एक फ़रमान जारी करते हुये पलट गयीं, “ चाय बना देती हूँ !” मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये आगे पढ़िये
हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है
Jul 4th
यह है जुलाई का महीना, और इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने रखती है । इन पँक्तियों के लेखक को विश्वास है कि, आप में से अधिकाँश कुछ कुछ ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।
यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो इस दिवस पर डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली में यह प्रतीक्षित दिवस त्रयदिवसीय स्वास्थ्य मेले के उपराँत आज की सुविधाजनक तिथि पर ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है आगे पढ़िये
अक्षरश:
May 12th
कई दिनों से ब्लागर पर सक्रिय नहीं हूं। इधर-उधर एक इक्का-दुक्का टिप्पणी ठोकी व " धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं है " की औपचारिकता निभाते हुए नन्हा मन का टेम्पलेट तैयार कर दिया । अब क्या करें ? नये-नये इन्सटाल किये विन्डो – 7 के नयनाभिराम विशिष्टतायें व नयी सहूलियते संगाल रहा हूं । इधर दो दिनों से पूरी तैय्यारी से आ बैठता, कि 1857 के ग़दर की सालगिरह ( 10 और 11 मई ) पर पोस्ट लिखूँ । पर ऎसा है न कि, अभी हम अपने शैशव को भरपूर जी तो लें.. फिर क्राँति व्राँति की बातें बाद में देखी जायेगी । सो कोई भी पोस्ट लिखना ही टाल गया, क्या पता यह भी ’ बिस्मिल ’ की तरह उपेक्षित हो जायें, और… आगे पढ़िये
तू क्या कर रहा है, बे ?
Dec 30th
आतंक आतंक आतंक.. आह, आतंक ! यह ससुरा आतंक शब्द ही इतने गहरे पैठ गया है, कि इसको सुनने मात्र से आतंक उभर आता है । न जाने क्यों, मैं इसके पीछे लट्ठ ( अपना लट्ठ है, भाई ) लेकर पिला पड़ा हूँ ! पर, वज़ह क्या व्यक्तिगत है ? नहीं जी.. भला आहत स्वाभिमान लेकर कौन चैन की नींद सो सकता है ? सच ही सोच रहे हैं आप कि, लगता है स्वाभिमान की ठेकेदारी अमर कुमार को ही मिली है ? सत्य वचन महराज़.. जो चला गया उसे भूल जाओ ! पर, मेरी मोटी समझ कहती है कि, अक्षुण्ण भारत की इकाई… आगे पढ़िये
ऎ वतन के सज़ीले नौज़वानों…
Dec 5th
इन सजीले नौज़वान बहादुरों ( ? ) को देखिये.. देख कर चौंक गये, कि अपनी ज़ाँबाज़ मीडिया ने इनको कवर तक न किया.. क्या हमारा ज़ाँबाज़ मीडिया चुप बैठा है.? नहीं नहीं, वह बेचारे चुप नहीं, बल्कि दहशत फैलाने और कुर्सी दौड़ समीक्षा में डूबे हैं,इसलिये वह कर भी नहीं सकते !
क्या भारत सचमुच सँपेरों का देश है ? साँप के गुजर जाने पर लकीर पीटने की शालीन परंपरा से जीवंत एक सभ्यता.. कभी कभार साँप नेवले की गुत्थमगुत्था भी देखने को मिल जाती है, पर लकीर पीटने और साँप किधर से आया था, और दँश कितना गहरा है.. इससे फ़ुरसत मिले तो अगल बगल भी देखें ! आस्तीन के साँपों का कहना ही क्या , उनकी खामोश सुरसुराहट… आगे पढ़िये
लो जी, मैं सुधर गया..
Nov 22nd
सुपर स्वामी की " मैं कहता हूँ डा. साहब कि सुधर जाओ," जैसी चेतावनी, भाई विवेक सिंह जी द्वारा पोस्ट की लम्बाई चौड़ाई पर सार्थक मीमांसा और चिट्ठाचर्चा पर थोड़ी मस्ती थोड़ा ढिशूम से प्रेरित हो शाम से आत्म-अवलोकन चल रहा है, कि ब्लागिंग नामक चिड़िया को किस पेड़ की डाल पर आसरा दूँ.. "पेट में बात ज़ुबाँ पर ताला " या फिर.." नहीं कोई माल, पर बज रहे गाल "
आज तो पंडिताइन भी मदद को न आयीं,’ खु़द ही गड्ढा खोदा.. ख़ुद ही भुगतो !’ यह हैं मेरी सच्ची सहधर्मिणी
और अंत में मिला एक तुच्छ ज्ञान, कि…. रखो एक लम्हा मौन
सो, मन में चल रहा है, कि.. … आगे पढ़िये



