Posts tagged ताकि सनद रहे ..
एक निःशब्द क्रंदन बतर्ज़.. चल उड़ जा रे पंछी
Mar 6th
बहुत ज़द्दोज़हद के बाद यह तय पाया गया कि , अब यहाँ से चलना चाहिये । मेरी एक मनपसंद कविता है, " कोशिश करने वालों की हार नहीं होती .. " जब यहाँ पेज़ लेआउट, एलिमेंट एवं सेटिंग, संपादन वगैरह में दख़ल ही ना रहा तो ज़ाहिर है कि यह देश हुआ बेगाना……चल उड़ जा रे पंछी ऽ
वस्तुतः पंछी मुझे बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, अपने छत पर कहीं छाँव में चारपाई डाल कर उनको खुले आसमान में स्वछंद उड़ते देखने का सुख अवर्णनीय है । हर चिंता फ़िक्र को अपने डैनों से झाड़ते हुये निरद्धंद… आगे पढ़िये
एक पोस्ट , अनमनी सी
Feb 28th
मेरा एक प्रिय गीत हुआ करता है, " दिल ढूँढ़ता है फिर कभी फ़ुरसत के रात दिन चार पल " आज वह दो चार पल हासिल भी हुये तो सोचा कुछ ब्लागियाया जाय । बहुत से विषय और संदर्भ मन में घुमड़ रहे हैं, यह ‘ ये डाक्टर…’ श्रृंखला भी अधूरी सी छूटी जा रही है । चलो आज फ़ाइनल हो जाय ।
आपको यह जान कर ताज्जुब होगा कि मेरा यह सड़िल्ला ‘ कुछ तो है…. ‘ चोरी हो गया है । मैं तो अब तक एक-एक टिप्पणी किसी तरह सहेजता रहा और यहाँ किसी भाई ने पूरी की पूरी ब्लगिया ही बटोर कर अपनी ज़ेब के हवाले कर लिया । जी हाँ , मेरा स्वामित्व बोले तो मालिकाना हक़ किसी कद्रदान ने हड़प लिया यानि Administrative Rights छिन… आगे पढ़िये
गरीब मुल्क के अमीर पालनहार
Jan 6th
परदा उठने के पहलेआपको मज़बूर नहीं कर सकता कि आप मुझे यहाँ झेलें किंतु मेरी मज़बूरी है कि बहुत ज़ब्त करने के बाद ही मज़बूर होकर इस पन्ने पर आता हूँ ।
कहीं से आवाज़ आयी है, बल्कि कुछ गैर- ब्लागर बिरादरी के मित्रों ने भी इंगित किया है, कि मैं आखिर पाज़िटिव क्यों नहीं देख पाता ? बिल्कुल सही है मित्रों, आप सभीजन की यह टिप्पणी एवं कुछेक कटाक्ष दोनों ही अपनी अपनी सीमाओं में मुझे शिरोधार्य हैं । किंतु मैं इस पन्ने पर एक ख़ास अंतर्वस्तु ( थीम ) लेकर ही आता हूँ, ठीक उसी प्रकार जैसे की हर शरीर का अपना अलग व्यक्तित्व होता है आगे पढ़िये
वर्ष की अंतिम बेला पर..
Dec 31st
कुछ तो ऎसा होगा ही..कि जिस घड़ी दुनिया नाच गा रही होगी, यह सिरफिरा अपना कुछ तो है पकड़े बैठा है !
दो तीन दिन से मन बड़ा खिन्न हो चला है, लगता है कि हम गलत दिशा की तरफ़ मुड़ते जा रहे हैं । अनायास अज़दक की पोस्ट से टकराने का संयोग हो गया । कुछ उनका लहज़ा भी बहुद सुखद नहीं कहा जासकता और एक टीप्पणीकार ने तो हद ही कर दी । आप स्वयं देख लें । हमारे एग्रीगेटर बंधु भी अपनी जनसंख्या बढ़ाने ली दौड़ में, अच्छे बुरे सबको समेटे पड़े हैं \ हाँलाकि मेरे तो दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं आगे पढ़िये



