Posts tagged कुछ ख़ास मौकों पर
हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है
Jul 4th
यह है जुलाई का महीना, और इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने रखती है । इन पँक्तियों के लेखक को विश्वास है कि, आप में से अधिकाँश कुछ कुछ ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।
यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो इस दिवस पर डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली में यह प्रतीक्षित दिवस त्रयदिवसीय स्वास्थ्य मेले के उपराँत आज की सुविधाजनक तिथि पर ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है आगे पढ़िये
भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !
Jan 5th
पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008
हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! " यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही… आगे पढ़िये
तू क्या कर रहा है, बे ?
Dec 30th
आतंक आतंक आतंक.. आह, आतंक ! यह ससुरा आतंक शब्द ही इतने गहरे पैठ गया है, कि इसको सुनने मात्र से आतंक उभर आता है । न जाने क्यों, मैं इसके पीछे लट्ठ ( अपना लट्ठ है, भाई ) लेकर पिला पड़ा हूँ ! पर, वज़ह क्या व्यक्तिगत है ? नहीं जी.. भला आहत स्वाभिमान लेकर कौन चैन की नींद सो सकता है ? सच ही सोच रहे हैं आप कि, लगता है स्वाभिमान की ठेकेदारी अमर कुमार को ही मिली है ? सत्य वचन महराज़.. जो चला गया उसे भूल जाओ ! पर, मेरी मोटी समझ कहती है कि, अक्षुण्ण भारत की इकाई… आगे पढ़िये
ऎ वतन के सज़ीले नौज़वानों…
Dec 5th
इन सजीले नौज़वान बहादुरों ( ? ) को देखिये.. देख कर चौंक गये, कि अपनी ज़ाँबाज़ मीडिया ने इनको कवर तक न किया.. क्या हमारा ज़ाँबाज़ मीडिया चुप बैठा है.? नहीं नहीं, वह बेचारे चुप नहीं, बल्कि दहशत फैलाने और कुर्सी दौड़ समीक्षा में डूबे हैं,इसलिये वह कर भी नहीं सकते !
क्या भारत सचमुच सँपेरों का देश है ? साँप के गुजर जाने पर लकीर पीटने की शालीन परंपरा से जीवंत एक सभ्यता.. कभी कभार साँप नेवले की गुत्थमगुत्था भी देखने को मिल जाती है, पर लकीर पीटने और साँप किधर से आया था, और दँश कितना गहरा है.. इससे फ़ुरसत मिले तो अगल बगल भी देखें ! आस्तीन के साँपों का कहना ही क्या , उनकी खामोश सुरसुराहट… आगे पढ़िये
कौन है यह, जाकिर-उर-रहमान उर्फ चाचा ?
Dec 2nd
अगर आप मुंबई पर हुए आतंकी हमले की तह में जाएं तो सरकारी एजंसियों द्वारा की गयी अंतहीन मनमानियां और लापरवाही सामने दिखाई देगी. मसलन, मार्च २००६ में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की यात्रा के बाद अल-कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन का एक आडियो संदेश जारी हुआ था जिसमें लादेन ने यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को निशाना बनाने की बात कही थी. निर्देश दे रहे थे. उन्हें बार-बार फर्जी सौदेबाजी की भी सलाह दी जा रही थी. अब देखें कि आतंकी हमला हुआ कैसे और उसका टार्गेट क्या था? हमले की रात हमलावरों ने १३ स्थानों पर अंधाधुंध गोलीबारी आगे पढ़िये
घी के लड्डू, टेढ़े ही सही …
Nov 23rd
आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये, XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े आगे पढ़िये
फ़ौरी तौर पर….
Oct 31st
यह या कोई अन्य पोस्ट लिखना तो नहीं चाह रहा था । श्री परसाई जी, ज़नाब कन्फ़्यूसियस साहब, महादेवी जी इत्यादि के उत्तराधिकारियों के मध्य मुझ जैसे लावारिस बेलौस ब्लागर का क्या काम ? प्रतिक्रियाहीन असम्पृक्त समाज का यह सदस्य कुछ भी लिखेगा, तो.. ख़ैर जाने दीजिये ! वैसे ही यहाँ साहित्यिक हिन्दी, आंचलिक हिन्दी, प्रचलित हिन्दी, खड़ी हिन्दी, पड़ी हिन्दी etc. को उठाने वाले बहुजनों की बहुतायत है | ब्लागिंग के पेशेवर, गैरपेशेवर, तक्नीकी, भड़ासी, फ़ँतासी इत्यादि किसी वर्ग में फ़िट हूँ ? शायद नहीं, तो ? आज सुबह उठने के बाद गैलरी में ज़मीन पर पड़े अख़बार से आँखें चुराता हुआ, मैं टायलेट की ओर बढ़ लेता हूँ ।… आगे पढ़िये



