Posts tagged कभी कभी मेरे दिल में…
पता नहीं क्यों ?
Jul 21st
लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ… पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, ” पता नहीं क्यों ? “ यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?
कभी कभी मेरे दिल में..
Apr 29th
…. यह ख़्याल आता है कि, ब्लागिंग में मुआ ब्लागर आख़िर करता क्या है … क्या केवल यही तो नहीं, कि " रमैया तोर दुल्हिन लूटै बजार " ? शायद ऎसा नहीं ही होगा.. काहे कि सदियन पाछै कबीरौ पलटि के ठोकिं गये रहें,
" हम तुम तुम हम और न कोई । तुमहि पुरुष हम ही तोर जोई ॥ " ब्लागर के जोई का कोई सगा सम्बन्धी क्यों न हो ? सो, ब्लागस्पाट की मेहरारू और पाठकों की भौजाई बने बिना ब्लागिंग करना दिनों दिन जैसे दुष्कर होता जा रहा है.. ( छिमा करो, माता ! ) … आगे पढ़िये
हे पार्थ ! दो कप चाय पर.. लिखता रह तू ब्लाग
Apr 18th
पिछले शनिवार को कुछ.. और इस शनिवार को इनपर इतने लहालोट हुये जा रहे हो.. तुम भी उमा भारती हो क्या .. ? या फिर इनसे कोई सौदा सेट हो गया है ? भईया, ई पंडितइनिया हमका जिये न देई.. लेयो टोंकि दिहिन ! भगवान इनका मुँह चीरते समय कुछ ज़्यादा ही उदार हो गया होगा ?वईसे दखीए त बतिया सधरणै है, लेकीन पंडिताइन दुल्हिन के ई बात हमयै हिरदै पर सोझे धक्क से लग गेया , एतना बड़ा ज़ुलुम सोच … ?
हमको भी यह 16 मई के बाद वालों की बिरादरी का समझती हैं काऽ.. हौ ? आजकल ई राजनीतिए पढ़ती हैं.. अटकलें बेलती हैं, सकल जग राजनीति फटि पड़ रही है, यहू का करें.. विकल्प होय तो बताओ… आगे पढ़िये
घी के लड्डू, टेढ़े ही सही …
Nov 23rd
आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये, XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े आगे पढ़िये
बिग बी अपने कबीले के हैं…. क्या सच्ची में ?
Nov 4th
डिसक्लेमर: बड़े मूड से एक पोस्ट लिखने का मन बनाकर आया था, चंद घंटे पहले ही आज की चिट्ठाचर्चा पर एक लम्बा कमेन्ट ठोक कर आया था । सहसा मन उचट गया,सो मन हुआ कि थोड़ी मस्ती की जाय, पर बिना पुख़्ता किये कुछ भी पोस्ट करने में झिझक होती है, पता नहीं कौन लण्ठ भड़क जाय, या पोस्ट का ही संदर्भ सहित व्याख्या करनी पड़ जाये.. सो अपनी आज की टिप्पणी ही उठा कर यहाँ नकल-चिप्पी तकनीक से जड़ डाला । जो पढ़े उसका भला, और जो न पढ़े उसका कभी न सोचो भला !
आज एक माइक्रो चमरई हो जाय
Oct 16th
का हरज़ है.. भाई, आज थोड़ा सा माइक्रो हो लिया जाय, तो ? माइक्रो और वह भी थोड़ा सा.. क्या केने क्या केने !
तो, मेरे बाबा जी रजनी के संग कल रात कहीं गायब हो गये, शरद मेला की भीड़भाड़ में फिसल के निकल गये होंगे । आज सुबह 9 के दरमियान पान के दुकान तक जाकर, पनवरिया को दूर से इशारा किया, कि मुझ तक इन दोनों को पहुँचा जाओ । वहाँ एक पंडितजी और उनके मित्र बेचारे पान वाले के दम किये हुये थे, जरा 132 तेज रखना और किवाम डाला ? तो ठीक, अब यह भी डाल दो.. और सुनो जरा वह भी, इत्यादि इत्यादि..
ई सब निरख अउर तदोपरांत ऊ सब देखत हमरे दिमाग में कुछ कुछ होता है वाला कुछ… आगे पढ़िये
तू चल… मैं जन्मजन्मांतर का पाप काट कर आता हूँ,
Oct 4th
‘स्कन्दमाता श्रीमती शिवेसर्वार्थसाधिके आज प्रातः से ही अनमनी सी थीं । कई बार शिवशंकर भोलेनाथ भूतभावन ने प्रश्नवाचक दृष्टि डाली, नज़रें बचा गयीं ! गणेश तो सुबह से ही सजने बजने में भागदौड़ मचाये हैं । कल अम्मा के साथ मृत्यलोक की तीन दिन की पिकनिक पर जाना है, कार्तिकेय को तो कोई चिन्ता ही नहीं है । रिद्धि- सिद्धि गणपति से उदासीन हो गयीं हैं, अब इनके सूँड़ कौन लगे.. अभी अभी विदायी लेकर आये हैं, चिल्ला चिल्ला कर प्राणियों ने कहा अगले बरस तू जल्दी आ, फिर भी ये है कि.. ऊँह कौन समझाये ? विनायक माज़रा भाँप ही तो गये, सफाई पेश की “अरे भागवानों, तब मैं जम्बूद्वीपे भारतखंडे कहाँ गया था ? वह तो दुष्ट ठाकरे का आमची महाराष्ट्र था, पगलियों ! पिताश्री के सेना… आगे पढ़िये



