Posts tagged आब्ज़ेक्शन मी लार्ड
ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये
Oct 4th
ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ?? क्यूँ ??
क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा जैसे आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है । पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये । यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत ही जुड़े रहे, परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी… आगे पढ़िये
विस्मृत बिस्मिल और ब्लागर च तनवीर
Jun 13th
पहले तो यह बता दूँ कि,यह पोस्ट भँग की तरँग में नहीं लिखी जा रही है । मानता हूँ कि शीर्षक बड़ा अटपटा बन पड़ा है, बल्कि यदि मुझे स्वयँ ही टिप्पणी देनी होती, तो उसे फ़कत एक लाईन में समॆट देता, " तेली के सिर पर कोल्हू ! " पर इस शीर्षक के पीछे एक मज़बूरी भी है , कृपया इसे सारथीय टोटका न मानें । मँगलवार 9 जून को सायँ चँद सतरें मरहूम हबीब तनवीर साहब पर पोस्ट करने का इरादा था कि, अचानक एक पारिवारिक आपदा आन पड़ी । मेरे बहनोई देवाशीष नहीं रहे,अब वह स्वर्गीय देवाशीष के नाम से याद किये जाते रहेंगे । अस्तु, यह रह ही गया ।
कल वृहस्पतिवार 11 जून को हुतात्मा बिस्मिल जी की जयँती थी ।… आगे पढ़िये
जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये
May 17th
बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप यही समझ लीजिये कि “ बुद्धू को कहाँ बुद्धू बक्सो सों काम ? “ फिर भी.. कुछ तो है, कि आज एक बेकार सा मुद्दा पकड़ कर बैठा हूँ, कि न्याय मिले पहले तो आप इन जीवनदास से मिलिये मिल भये… क्या समझे ? अभी फ़िलवक़्त मुझे प्लाई-व्लाई तो लेनी नहीं है, सो मैं तो यही समझ रहा हूँ, कि भारतीय न्याय-वयवस्था इतनी धीमी और लचर… आगे पढ़िये
माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.
Apr 23rd
आज कट-पेस्टीय तकनीक से एक लँबी पोस्ट लिखने का जुगाड़ लग गया ! हमारे क्लास टीचर श्री अनूप शुक्ल जी कहते हैं.. वह हमरा लिखा बूझ नहीं पाते ! गुरु, आप कभी ऎसे अनाड़ी तो न थे.. ही ही तो.. कट-पेस्टीय तकनीक से लँबी पोस्ट का जुगाड़..क्या मैं छायावादी कहलाऊँगा यदि मैं इसकी तुलना भारतीय राजनीतिज्ञ से करूँ, तो ? हमें टिप्पणी चाहिये.. और उन्हें वोट ! हमने भी जहाँ अलाव जलती देखी, लपक कर हाथ सेंक लिये, बस फ़र्क़ इतना है, कि वह पहले आग लगा देते हैं, बाद में हाथ सेंकते हैं हाँ, अलबत्ता मुद्दे उठाने की कट पेस्ट में हम दोनों ही ईमानदार हैं, वह मुद्दों की वोट वैल्यू हेरते फिरते हैं, और हम कमेन्ट… आगे पढ़िये
मत मानो मेरा मत, पर यह मत कहना कि मत नहीं दिया था
Apr 11th
जैसा देश वैसा भेष
Feb 17th
आम तौर पर मैं पहेली-पचड़े में नहीं पड़ता । एक सर्प पहेली जिसका उत्तर मुझे भी नहीं मालूम ! कोई बताएगा ? इस विचारोत्तेजक पहेली ने मुझे टिप्पणी बक्से में ज़बरन ढकेल ही दिया । उत्तर देने से पहले सतर्क होकर इधर उधर देखा, सो माहौल के अनुसार मेरा उत्तर था ; भाई, मैं तो पटखनी खा गया, थोड़ा आयोडेक्स मिल सकता है, क्या ? उसे मल कर काम पर चला जाय ।
सर्प-पहेली का मेरा उपरोक्त उत्तर ‘ जैसा देश वैसा भेष ‘ नीति के अंतर्गत ही लिया जाय । उत्तर देकर मैं संतुष्ट था कि साँभा अगली कड़ी में तो खेल का मज़ा दिखायेगा ही । पर सरदार खुस न हो सका । आज चंद घंटे पहले अपनी वैलेन्टाइन को सँवारने की… आगे पढ़िये
क्षमा करें डा. मान्धाता
Feb 2nd
ब्लाग में आख़िर क्या लिखा जाना चाहिये.. पढ़ कर मेरी प्रतिक्रिया रोके ना रूक सकी । बड़ा अनुकूल विषय है,सो टिप्पणी के रूप में यह पोस्ट यहीं चेंप देता हूँ ।
डा. मान्धाता जी, आपने मेरा मनोनुकूल विषय उठाया है, अतएव.. सहमत हूँ, कि हिन्दी ब्लागिंग स्तरहीनता से ग्रसित है । पर किसी भी घटक को स्तरहीन मानने के सभी के अपने अपने मापदंड हैं, और सभी ज़ायज़ हैं ।
हिन्दी किताबों के स्टाल पर, यदि भीष्म साहनी और कृष्णा सोबती शोभायमान हैं.. तो उनको काम्बोज, शर्मा और भी न जाने कौन कौन अँगूठा दिखाते धड़ाधड़ माल बटोर रहे हैं । यह अपनी अपनी रूचि है.. और व्यवसायिकता की माँग है ।
पर, डा. मान्धाता, इसे बहस का मुद्दा… आगे पढ़िये



