Posts tagged अपठनीय
क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट – हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब
Sep 28th
नँगे सच में नहायी बहना
May 26th
देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी, सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई, दादा विनायक सेन रिहा हुये, और मैं ब्लागर होकर भी अपनी खुशी की चीख-पुकार खुल कर न मचा सका । बिजली की आवाज़ाही, अफ़सरों का विदाई और स्वागत समारोह एटसेट्रा करीने से एक पोस्ट भी न लिखने दे रहा है !कुश जी, अब तुम न कह देना, कि पहले ही कौन सा करीने से लिखा करते थे । मुझे यूँ छेड़ा ना करो, मैं ठहरा रिटायर्ड नम्बर !
भूमिका… आगे पढ़िये
बिन बुलायी, एक अपूर्ण कविता
Feb 3rd
आज व्याधिग्रस्त माया श्रीवास्तव धुर 5 बजे अवतरित हुईं, टालने का प्रश्न नहीं.. पर थोड़ी व्यग्रता थी क्योंकि यह आज के परामर्श समय की अंतिम बेला थी, हिस्ट्री लेने के दौरान मेरे मुँह से ‘ परिवेश ‘ शब्द का उल्लेख हुआ । बस, उनके पतिदेव महोदय ने मुझसे एक छोटा सा ब्रेक लेने का अनुयय किया, और बिना किसी भूमिका के यह पंक्तियाँ सुनाने लग पड़े । एक-डेढ़ मिनट के बाद ही मैंने एक ट्रैफ़िक पुलिसिया इशारा कर उन्हें रूकने का संकेत दिया, और अपना काम पूरा कर सका.. पर एक स्थानीय कवि के इस कविता की पंक्तियाँ रह रह कर जैसे चिंचोड़ रही है, इतना अलाय-बलाय, लटरम-पटरम नेट पर ठेलता / पेलता रहता है, थोड़ा बहुत जगह मुझे भी दे दे । मैं खीझ गया, " तू तो आगे पढ़िये
ऎसी आज़ादी और कहाँ, आज़ाद ख़्याल विवेचन
Jan 31st
विवेक भाई आग लगा कर अगले हफ़्ते के लिये बाई कर गये । गोया, चर्चाकार न हुये ज़मालो हो गये । यह तीसरी बार है, जब मैं इन चिट्ठाचर्चा वालों के उकसावे में पोस्ट लिखने को मज़बूर हो रहा हूँ । भुस्स मे आग लगा कर बी ज़मालो दूर खड़ी ।
मेरी पिछली कई पोस्ट से तो अंदाज़ ही लिया होगा, कि ई डाक्टर धँधे में जैसा भी ठस्स हो, लेकिन यहाँ दिमाग का निख़ालिस भुस्स डम्प करने आता है । भगवान ठस्स भेजा देता, तो ई आग लगबे काहे करती ? सो भगवान दुश्मन के दिमाग में भी ऎसा भूसे का ढेर भर कर न भेजे । इन चर्चाकार ने गणतंत्र-दिवस पर पोस्ट लिखने वालों की पूरी क्लास ले ली । पाखंडम शरणम गच्छामि संस्कृति में … आगे पढ़िये
ज़वाब कोई ज़रूरी तो नहीं, फिर भी ?
Nov 21st
RECAP: बिग-बी अपने कबीले में होने की खोजबीन से उपजे एक प्रतिक्रियात्मक पोस्ट के आगे…
अपने चहेते मंच चिट्ठाचर्चा से सूत व निट्ठल्ले की कपास को लेकर एक बेवज़ह लट्ठम-लट्ठा हो चली । नतीज़तन जुलाहे की लट्ठम-लट्ठा की प्रामाणिकता पर चंद सवाल उठे व ख़ारिज़ भी कर दिये गये । यह एक अप्रिय प्रसंग है, जो टाला जा सकता था, किन्तु… ? बहुत सारे किन्तु, जब एक प्रश्न बन कर खड़े होते हैं, तो ज़वाब माँगने लग पड़ते हैं, लिहाज़ा.. मन में यह चल रहा था कि क्या ज़वाब से मुँह मोड़ लिया जाय या अपने ब्लागिया-सिकंदर को पोरस की सीख याद दिलायी जाय, जो भी हो यह तो पूछा ही जा सकता है कि, ज़वाब… आगे पढ़िये
फ़ौरी तौर पर….
Oct 31st
यह या कोई अन्य पोस्ट लिखना तो नहीं चाह रहा था । श्री परसाई जी, ज़नाब कन्फ़्यूसियस साहब, महादेवी जी इत्यादि के उत्तराधिकारियों के मध्य मुझ जैसे लावारिस बेलौस ब्लागर का क्या काम ? प्रतिक्रियाहीन असम्पृक्त समाज का यह सदस्य कुछ भी लिखेगा, तो.. ख़ैर जाने दीजिये ! वैसे ही यहाँ साहित्यिक हिन्दी, आंचलिक हिन्दी, प्रचलित हिन्दी, खड़ी हिन्दी, पड़ी हिन्दी etc. को उठाने वाले बहुजनों की बहुतायत है | ब्लागिंग के पेशेवर, गैरपेशेवर, तक्नीकी, भड़ासी, फ़ँतासी इत्यादि किसी वर्ग में फ़िट हूँ ? शायद नहीं, तो ? आज सुबह उठने के बाद गैलरी में ज़मीन पर पड़े अख़बार से आँखें चुराता हुआ, मैं टायलेट की ओर बढ़ लेता हूँ ।… आगे पढ़िये
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः मीमांसा
Oct 7th
वस्तुतः मेरी पिछली पोस्ट पर श्री अनूप जी की टिप्पणी आयी, कि महाराज इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का अर्थ तो दे देते । सतीश बोले कि गागर में सागर.. ! इस प्रकार अपने ही हाथों यह धर्मसंकट उत्पन्न किया, सो प्रायश्चित स्वरूप यह पोस्ट ठेलने का साहस किया गया है । गवारा तो नहीं था, पर जैसा… आगे पढ़िये



