जब मैं छोटा बच्चा था, कभी शरारत नहीं करता था.. ढँग की जब कोई बात सुने ना, फिर मैं दँगा करता था आज मेरा मन निट्ठल्ला डीप-रेस्ट है, मैंनें दू-दुगो पोस्ट लिक्खड्डाली.. और एक सब्सक्राइबर तक झाँकने न आया । ऍग्रीगेटर के टोट्टे में सब अपनी अपनी टिप्पणी गिनने में व्यस्त हैं… इधर अपने को दँगा करने का मन हो रैया है । टूँऊँउ ऊँ, जिन्हें नाज़ था बेलागिंग की बुलन्दियों पर.. कहाँ है, कहाँ है, कोहाँयऽ हँयऽऽऽ.. कोहाँय हँय टूँऊँउ ऊँ, ऊँउँ.. वो मठाधीशों की धौंसें, वो एसोशियन… आगे पढ़िये