Archive for September, 2009
क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट – हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब
Sep 28th
नो.. नो.. नो.. दर्पण दर्शन क्यों ?
Sep 9th
आज सुबह सोकर उठा..वह तो देर सबेर सभी उठते ही हैं, ख़ास बात क्या है ? लेकिन आज मेरा मन कुछ भारी था, अनमना सा बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठा शरीफ़े में आते हुये फूलों की कलियाँ गिन रहा था । वह बगल में खड़ी हो जैसे आर्डर ले रही हों, “ ब्लैक टी या नींबू पानी ? ” कुछ ज़वाब दूँ कि उससे पहले ही वह पत्नी-अवतार में दरस दे दिहिन, “ जो बोलना है, जल्दी बोलो.. अभी बहुत काम है । अभी नहाया भी नहीं हैं, तुम मैक्सी में घूमते देख चिल्लाने लगोगे !
सुघड़ पत्नियाँ पति का ज़वाब सुनने का इंतेज़ार नहीं किया करतीं, सो एक फ़रमान जारी करते हुये पलट गयीं, “ चाय बना देती हूँ !” मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये आगे पढ़िये
चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो
Sep 7th
माडरेशन की प्रतीक्षा में
Sep 6th
इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?" हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये । पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।" दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?" अब शर्त लगा ले.. और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी । किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है… आगे पढ़िये



