Archive for July, 2009
भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो
Jul 29th
पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक… त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक । बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू आजकल बड़ा बूझा और बुझाया जा रहा है, सोचा निट्ठल्ले बैईठ से तो अच्छा है कि, हमहूँ कुछौ बूझि जाँचि लेयी.. कल हो ना हो ! वो क्या है कि,
कहते हैं ना ..यह ब्लागर की बस्ती है..यहाँ पोस्ट मँहगी और टिप्पणियाँ सस्ती है । सो, अँतरिम राहत के लिये एक सस्ते दरों का पोस्ट दिया जा रहा है, निर्वाह कीजिये ।
यह ख़ानम बीते हुये ज़माने की खँडहर नहीं, क्योंकि यह स्वयँ ही… आगे पढ़िये
पता नहीं क्यों ?
Jul 21st
लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ… पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, ” पता नहीं क्यों ? “ यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?
जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल
Jul 8th
आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और …………ठल्ले
उब दिनों एक गाना सुना करता था, उसे अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ भी लिया ( अभी ईस्वामी की टिप्पणी के बाद यह अँश जोड़ा है.. धन्यवाद स्वामी ! )
तो एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास फेल.. अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई " बस इसी को पकड़ लिया, " रेल जब हुईहै, तौनि डब्बवा भी हुईबे करि… डब्बवा मा जब हुईहैं जगह तो सवारिन केरि लदबे करी… , सवारिन केरि लदबे करीऽऽ भईया सवारिन केरि लदबे करीऽऽ "
बस इसी को पकड़ लिया, इसके दर्शन को आत्मसात कर लिया.. लगे हुये डिब्बों को परखा, फ़र्स्ट किलास.. सेकेन्ड किलास, जनता, पैसेन्ज़र, … आगे पढ़िये
हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली
Jul 6th
हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है
Jul 4th
यह है जुलाई का महीना, और इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने रखती है । इन पँक्तियों के लेखक को विश्वास है कि, आप में से अधिकाँश कुछ कुछ ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।
यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो इस दिवस पर डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली में यह प्रतीक्षित दिवस त्रयदिवसीय स्वास्थ्य मेले के उपराँत आज की सुविधाजनक तिथि पर ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है आगे पढ़िये



