Archive for May, 2009
नँगे सच में नहायी बहना
May 26th
देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी, सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई, दादा विनायक सेन रिहा हुये, और मैं ब्लागर होकर भी अपनी खुशी की चीख-पुकार खुल कर न मचा सका । बिजली की आवाज़ाही, अफ़सरों का विदाई और स्वागत समारोह एटसेट्रा करीने से एक पोस्ट भी न लिखने दे रहा है !कुश जी, अब तुम न कह देना, कि पहले ही कौन सा करीने से लिखा करते थे । मुझे यूँ छेड़ा ना करो, मैं ठहरा रिटायर्ड नम्बर !
भूमिका… आगे पढ़िये
आज बड़े खुश लग रहे हो ?
May 26th
डिस्क्लेमर : यह पोस्ट श्री बज्राँग बली के नाम पर आरँभ किया जा रहा है, अनायास बिजली गुल हो जाने की दशा में पोस्ट पूरी न हो पाने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व केन्द्र व निष्कामी राज्य सरकार का होगा । इसका मायाराज से कोई लेना देना नहीं है !
रायबरेलीवासी मतदान के तत्काल बाद से विद्युतबाधा के बँधक बने हैं । सोनिया भाभी से माया ननदिया को उचित नेग मिलने तक यह तमँचा लगा रहेगा । अतः ब्लागिंग की बत्ती भी गुल है ! अफ़सरान के चेहरे की बत्ती गुल है, चाटुकारों की बत्ती गुल है । हे कपि, समय पड़े पर तू ओबामा के सँग हो लिया और, कुसमय पर अपने देशी अडवानी श्रीराम चरण कमल रज से ही रूठ गया । उनकी छोड़, हम दीनों की… आगे पढ़िये
विरोध का यह तरीका, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका
May 20th
जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये
May 17th
बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप यही समझ लीजिये कि “ बुद्धू को कहाँ बुद्धू बक्सो सों काम ? “ फिर भी.. कुछ तो है, कि आज एक बेकार सा मुद्दा पकड़ कर बैठा हूँ, कि न्याय मिले पहले तो आप इन जीवनदास से मिलिये मिल भये… क्या समझे ? अभी फ़िलवक़्त मुझे प्लाई-व्लाई तो लेनी नहीं है, सो मैं तो यही समझ रहा हूँ, कि भारतीय न्याय-वयवस्था इतनी धीमी और लचर… आगे पढ़िये
He is obselete, who is he ?
May 15th
यूँ तो अपन को किसी लफ़ड़े में पड़ने की आदत तो है, नहीं ? अब तक तक तो आप भी जान गये होंगे,कि, मैं अपना दामन बचा कर दूर से तमाशा देखने वाला एक आम शहरी आदमी हूँ । चाहें तो, मुझे शरीफ़ भी कह लीजिये, तो भी मैं बुरा न मानने का ! इसलिये मैं डा. अरविन्द के यहाँ से आते शोर से अपने को अलग ही रखे रहा । एक ब्लागर दूसरे ब्लागर को दे ही क्या सकता है, भला ? फ़क़त दो चार टिप्पणी या गाली गलौज़ तो आम बात है, ऎसे शैतानी पोस्ट पर भी यदि साधु वाद आ जाय.. तो अपवाद ही मानो ! अपवाद यूँ कि, साहित्यिक गोष्ठियों जैसी नेटवर्किंग यहाँ उतनी परिपक्व न हो पायी है, या फिर कोई हिन्दी… आगे पढ़िये
अक्षरश:
May 12th
कई दिनों से ब्लागर पर सक्रिय नहीं हूं। इधर-उधर एक इक्का-दुक्का टिप्पणी ठोकी व " धन्यवाद देने की आवश्यकता नहीं है " की औपचारिकता निभाते हुए नन्हा मन का टेम्पलेट तैयार कर दिया । अब क्या करें ? नये-नये इन्सटाल किये विन्डो – 7 के नयनाभिराम विशिष्टतायें व नयी सहूलियते संगाल रहा हूं । इधर दो दिनों से पूरी तैय्यारी से आ बैठता, कि 1857 के ग़दर की सालगिरह ( 10 और 11 मई ) पर पोस्ट लिखूँ । पर ऎसा है न कि, अभी हम अपने शैशव को भरपूर जी तो लें.. फिर क्राँति व्राँति की बातें बाद में देखी जायेगी । सो कोई भी पोस्ट लिखना ही टाल गया, क्या पता यह भी ’ बिस्मिल ’ की तरह उपेक्षित हो जायें, और… आगे पढ़िये
अप्रासँगिक स्वगत कथन
May 7th
सुबह सुबह अख़बार पढ़ दिन ख़राब करने से बेहतर लत है, चिट्ठाचर्चा ! आदत के मुताबिक आज भी पलटाया तो ..
" उपस्थित श्रीमान / मैडम साथ एक बेहतरीन लिंक लेकर अनूप जी को पाता हूँ, ”
जो कि स्वयँ में चर्चाकार का ही टैगलाइन है, और बहुत अच्छा है
बड़ा भला लग रहा है, चुहल सूझ रही है..कि एक पोस्ट लिखूँ, " आओ सखि, लिंक मिलि बाँटैं " कौन जानता है, कब समय मिल पाय… अभी ही लिख लेता.. लेकिन सिंह साहब की पत्नी नीरू किसी काम से पँडिताइन से मिलने आयीं हैं, और जम कर बैठ गयीं, क्योंकि उनके पास टैम नहीं है (यदि होता.. तो शायद एक अदद बिस्तर और डोलची के संग पधारतीं ! ) अपना प्रिय… आगे पढ़िये



