Archive for February, 2009
जैसा देश वैसा भेष
Feb 17th
आम तौर पर मैं पहेली-पचड़े में नहीं पड़ता । एक सर्प पहेली जिसका उत्तर मुझे भी नहीं मालूम ! कोई बताएगा ? इस विचारोत्तेजक पहेली ने मुझे टिप्पणी बक्से में ज़बरन ढकेल ही दिया । उत्तर देने से पहले सतर्क होकर इधर उधर देखा, सो माहौल के अनुसार मेरा उत्तर था ; भाई, मैं तो पटखनी खा गया, थोड़ा आयोडेक्स मिल सकता है, क्या ? उसे मल कर काम पर चला जाय ।
सर्प-पहेली का मेरा उपरोक्त उत्तर ‘ जैसा देश वैसा भेष ‘ नीति के अंतर्गत ही लिया जाय । उत्तर देकर मैं संतुष्ट था कि साँभा अगली कड़ी में तो खेल का मज़ा दिखायेगा ही । पर सरदार खुस न हो सका । आज चंद घंटे पहले अपनी वैलेन्टाइन को सँवारने की… आगे पढ़िये
डा. अनुराग के बचपन पर कराह उठा यह पचपन
Feb 10th
जैसे जैसे डा. अनुराग की पिछली ज़बरदस्त पोस्ट को बाँचता जाता, दिल से.. हमारे वाले दिल से, कराह उठ रही थी, “हाय अमर तुम न हुये ।” ऎ भाई कोई यहीं खुन्नुस न निकाल लेना, कि “ अगर होते तो, क्या उखाड़ लेते ?” एकदम सच बात है, मैं क्या कर लेता.. ?
मैं बचपन में ही चुगद था, और विद्वान टिप्पणीकारों के मत में, सो तो अब तक हूँ । अब यह शब्द इतना सहज लगता है.. कि फ़ौरन ही हर ऎसे टिप्पणीकार की पारखी निगाहों का फ़ालोअर बन जाता हूँ । मेरे बाबा कोई चीज बरबाद होते हुये देख कहते.." सकल वस्तु संग्रह करहूँ आवैहिं एकु दिन काम, समय पड़े पर ना मिले माटिहूँ खरचे दाम । " सो अपना अमूल्य ( दो कौड़ी से आगे पढ़िये
बिन बुलायी, एक अपूर्ण कविता
Feb 3rd
आज व्याधिग्रस्त माया श्रीवास्तव धुर 5 बजे अवतरित हुईं, टालने का प्रश्न नहीं.. पर थोड़ी व्यग्रता थी क्योंकि यह आज के परामर्श समय की अंतिम बेला थी, हिस्ट्री लेने के दौरान मेरे मुँह से ‘ परिवेश ‘ शब्द का उल्लेख हुआ । बस, उनके पतिदेव महोदय ने मुझसे एक छोटा सा ब्रेक लेने का अनुयय किया, और बिना किसी भूमिका के यह पंक्तियाँ सुनाने लग पड़े । एक-डेढ़ मिनट के बाद ही मैंने एक ट्रैफ़िक पुलिसिया इशारा कर उन्हें रूकने का संकेत दिया, और अपना काम पूरा कर सका.. पर एक स्थानीय कवि के इस कविता की पंक्तियाँ रह रह कर जैसे चिंचोड़ रही है, इतना अलाय-बलाय, लटरम-पटरम नेट पर ठेलता / पेलता रहता है, थोड़ा बहुत जगह मुझे भी दे दे । मैं खीझ गया, " तू तो आगे पढ़िये
क्षमा करें डा. मान्धाता
Feb 2nd
ब्लाग में आख़िर क्या लिखा जाना चाहिये.. पढ़ कर मेरी प्रतिक्रिया रोके ना रूक सकी । बड़ा अनुकूल विषय है,सो टिप्पणी के रूप में यह पोस्ट यहीं चेंप देता हूँ ।
डा. मान्धाता जी, आपने मेरा मनोनुकूल विषय उठाया है, अतएव.. सहमत हूँ, कि हिन्दी ब्लागिंग स्तरहीनता से ग्रसित है । पर किसी भी घटक को स्तरहीन मानने के सभी के अपने अपने मापदंड हैं, और सभी ज़ायज़ हैं ।
हिन्दी किताबों के स्टाल पर, यदि भीष्म साहनी और कृष्णा सोबती शोभायमान हैं.. तो उनको काम्बोज, शर्मा और भी न जाने कौन कौन अँगूठा दिखाते धड़ाधड़ माल बटोर रहे हैं । यह अपनी अपनी रूचि है.. और व्यवसायिकता की माँग है ।
पर, डा. मान्धाता, इसे बहस का मुद्दा… आगे पढ़िये



