Archive for November, 2008
घी के लड्डू, टेढ़े ही सही …
Nov 23rd
आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये, XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े आगे पढ़िये
लो जी, मैं सुधर गया..
Nov 22nd
सुपर स्वामी की " मैं कहता हूँ डा. साहब कि सुधर जाओ," जैसी चेतावनी, भाई विवेक सिंह जी द्वारा पोस्ट की लम्बाई चौड़ाई पर सार्थक मीमांसा और चिट्ठाचर्चा पर थोड़ी मस्ती थोड़ा ढिशूम से प्रेरित हो शाम से आत्म-अवलोकन चल रहा है, कि ब्लागिंग नामक चिड़िया को किस पेड़ की डाल पर आसरा दूँ.. "पेट में बात ज़ुबाँ पर ताला " या फिर.." नहीं कोई माल, पर बज रहे गाल "
आज तो पंडिताइन भी मदद को न आयीं,’ खु़द ही गड्ढा खोदा.. ख़ुद ही भुगतो !’ यह हैं मेरी सच्ची सहधर्मिणी
और अंत में मिला एक तुच्छ ज्ञान, कि…. रखो एक लम्हा मौन
सो, मन में चल रहा है, कि.. … आगे पढ़िये
ज़वाब कोई ज़रूरी तो नहीं, फिर भी ?
Nov 21st
RECAP: बिग-बी अपने कबीले में होने की खोजबीन से उपजे एक प्रतिक्रियात्मक पोस्ट के आगे…
अपने चहेते मंच चिट्ठाचर्चा से सूत व निट्ठल्ले की कपास को लेकर एक बेवज़ह लट्ठम-लट्ठा हो चली । नतीज़तन जुलाहे की लट्ठम-लट्ठा की प्रामाणिकता पर चंद सवाल उठे व ख़ारिज़ भी कर दिये गये । यह एक अप्रिय प्रसंग है, जो टाला जा सकता था, किन्तु… ? बहुत सारे किन्तु, जब एक प्रश्न बन कर खड़े होते हैं, तो ज़वाब माँगने लग पड़ते हैं, लिहाज़ा.. मन में यह चल रहा था कि क्या ज़वाब से मुँह मोड़ लिया जाय या अपने ब्लागिया-सिकंदर को पोरस की सीख याद दिलायी जाय, जो भी हो यह तो पूछा ही जा सकता है कि, ज़वाब… आगे पढ़िये
अमर कुमार का ई-कचरा
Nov 15th
आज शनिवार है या समझिये कि था… वैसे तो इतने दिनों गायब रहा ही, पर आज है मेरी साप्ताहिक छुट्टी, और यही दिन तो असल छुट्टी में शुमार है, सो अपने मेल इनबाक्स का थोड़ा बहुत ज़ायज़ा वगैरह लिया ही था, कि एक हितैषी का मेल देखा.. वैसे तो इनका लगाई-बुझाई करने जैसा व्यक्तित्व नहीं है, पर इन्होंने श्री ई-स्वामी जी के किसी साइड एफ़ेक्ट पोस्ट का जिक्र कर, इशारा दिया कि मैं अपना भी पक्ष रखूँ ! अब मैं अपना भेजा तो अंबाला में छोड़ आया हूँ, गुड़ाई-निराई व सिंचाई के लिये, क्या करूँ ? पक्ष धरी धरी.. या न धरी !
लेकिन अपना पक्षवा काहे रखूँ, भाई.. ई कोनो… आगे पढ़िये
बिग बी अपने कबीले के हैं…. क्या सच्ची में ?
Nov 4th
डिसक्लेमर: बड़े मूड से एक पोस्ट लिखने का मन बनाकर आया था, चंद घंटे पहले ही आज की चिट्ठाचर्चा पर एक लम्बा कमेन्ट ठोक कर आया था । सहसा मन उचट गया,सो मन हुआ कि थोड़ी मस्ती की जाय, पर बिना पुख़्ता किये कुछ भी पोस्ट करने में झिझक होती है, पता नहीं कौन लण्ठ भड़क जाय, या पोस्ट का ही संदर्भ सहित व्याख्या करनी पड़ जाये.. सो अपनी आज की टिप्पणी ही उठा कर यहाँ नकल-चिप्पी तकनीक से जड़ डाला । जो पढ़े उसका भला, और जो न पढ़े उसका कभी न सोचो भला !
हे भगवान, तो यह सब तूने किया !
Nov 2nd
अपनी धरती पर ख़बरों का टोटा पड़ रहा, दिक्खै । पूरी दुनिया दुई दिन बाद सदर ए रियासत अमेरिका के इलेक्शन नतीज़ों को लेकर दुबली हुई जा रही है । शायद ठीकै हों सब के सब, अब ‘कोउ नृप होंहिं.. ‘ वाला ज़माना तो रहा नहीं, सब जागरूक हो गये हैं । ठीक से जग नहीं पाये हैं, उनींदे तौर पर सही.. लेकिन गरियाने वरियाने से आचमन-कुल्ला करने की शुरुआत हुई गयी है, चुभ चंकेत है, यह ! ( पढ़ें शुभ संकेत.. फटीचर टाइप के एडीटर द्वारा इतना सताया गया हूँ, कि अब अपने हाथों ही अपना लिखा एडिट करना, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा दर्द देता है.. अउर ई तो कुंजीपटल की चूक है, सो आज आप ही भुगत लो ) ठीक ट्रैक पर जा रहा हूँ, न… आगे पढ़िये



