Archive for October, 2008
फ़ौरी तौर पर….
Oct 31st
यह या कोई अन्य पोस्ट लिखना तो नहीं चाह रहा था । श्री परसाई जी, ज़नाब कन्फ़्यूसियस साहब, महादेवी जी इत्यादि के उत्तराधिकारियों के मध्य मुझ जैसे लावारिस बेलौस ब्लागर का क्या काम ? प्रतिक्रियाहीन असम्पृक्त समाज का यह सदस्य कुछ भी लिखेगा, तो.. ख़ैर जाने दीजिये ! वैसे ही यहाँ साहित्यिक हिन्दी, आंचलिक हिन्दी, प्रचलित हिन्दी, खड़ी हिन्दी, पड़ी हिन्दी etc. को उठाने वाले बहुजनों की बहुतायत है | ब्लागिंग के पेशेवर, गैरपेशेवर, तक्नीकी, भड़ासी, फ़ँतासी इत्यादि किसी वर्ग में फ़िट हूँ ? शायद नहीं, तो ? आज सुबह उठने के बाद गैलरी में ज़मीन पर पड़े अख़बार से आँखें चुराता हुआ, मैं टायलेट की ओर बढ़ लेता हूँ ।… आगे पढ़िये
अभी टैम नहीं है, शिव भाई !
Oct 20th
अभी टैम नहीं है, शिव भाई ! अभी अभी मेलबाक्स खोला, देखा शिव भाई का मेल ! आनन्दम, भाई की नयी पोस्ट होगी, मेल से सब्सक्राइब कर रखा है । हौले से नज़ाकत से खोला, हाय रब्बा.. यहाँ तो शिवभाई बड़े उखड़े मूड में किन्तु तनिक लिहाज़ से कहाँ का गुबार यहाँ निकाल रहे हैं । आद्योपांत बाँच गया, फिर धैर्य की चटनी से चाट चाट कर पढ़ा । वाह आपका यह अंदाज पसंद आया, भ्राता !
देखिये न, नकवा लक्ष्मण ने काटी, भुगत बेचरऊ राम गये, सीता हरवा बैठे, रीछ बानरों तक से समर्थन लेने को विवश हुये । सो, ईहाँ भि.. लीखे अमर कुमार अउर भीड़े सिव कुमार ! पर इस घोर कलयुग में यह भातृप्रेम… आनन्दम आनन्दम !
इसका उत्तर तो दूँगा, बरोबर दूँगा… आगे पढ़िये
फ़ुटकर सोच की गुरुअई
Oct 18th
यह शीर्षक कलेज़े पर स्काईस्क्रेपर रख कर दे रहा हूँ । हाँ,मैं अमर कुमार IPfe80::9dbb:aa5e:63db:1c9b/ 192.168.1.100 से इस बेला रात्रि के तृतीय प्रहर मानों किसी प्रेत के वशीभूत होकर यह पोस्ट चेंपने बैठा हूँ । इधर कुछेक वर्षों से रात्रि की इस बेला सुंदरियों के ख़्याल कम आते हैं । टाइम इज़ अप की घंटी कब बज जाये, कहा नहीं जा सकता सो जीवन के प्रश्नपत्र में बाद के लिये छोड़ कर रखे गये मुश्किल सवालात को निपटाने की हौल मची रहती है, संगिनी द्वारा दिया जा रहा ख़र्राटों का अनोखा पार्श्वसंगीत न चल रहा हो तो मेरा ‘अटको मत चलते चलो ‘ प्रेरित मन बेचैन होने लगता है । आज ही श्री मकरंद जी ने हैप्पी वीकएंड जैसा कुछ कहा था । पर, मकरंद तुम शायद रस्मी तौर पर… आगे पढ़िये
PD की एक ताज़ा पोस्ट पर …
Oct 18th
आज शनिवार है, मेरे साप्ताहिक अवकाश का दिन ! मेरी छुट्टियाँ मुझे कोई उलाहना नहीं देतीं, क्योंकि मैं चालाक हो गया हूँ । छुट्टियों के दस्तक देने से पहले ही उनकी सारी माँग पूरी कर देता हूँ । ख़ुदा का इनायत किया हुआ, यह दिन मैं पूरी तौर पर अपने नाम बुक किये रहता हूँ । आह्हः जीवन में यदि कोई सुख नसीब होता है, तो बस इसी एक दिन ! आनन्दम आनन्द
नींद से जाग कर, बिस्तर में पड़े पड़े बाहर की दुनिया से छन कर आती हुई आवाज़ों की टोह लेते हुये, ठंडी होती हुई चाय को देखते हुये, पंडिताइन का चिल्लाना इस कान से उस कान को निकालने का सुख ! आह्हः अनिर्वचनीय होता है, यह सब कुछ ! जाड़ों की सुबह रज़ाई में दुबके हों तो… आगे पढ़िये
आज एक माइक्रो चमरई हो जाय
Oct 16th
का हरज़ है.. भाई, आज थोड़ा सा माइक्रो हो लिया जाय, तो ? माइक्रो और वह भी थोड़ा सा.. क्या केने क्या केने !
तो, मेरे बाबा जी रजनी के संग कल रात कहीं गायब हो गये, शरद मेला की भीड़भाड़ में फिसल के निकल गये होंगे । आज सुबह 9 के दरमियान पान के दुकान तक जाकर, पनवरिया को दूर से इशारा किया, कि मुझ तक इन दोनों को पहुँचा जाओ । वहाँ एक पंडितजी और उनके मित्र बेचारे पान वाले के दम किये हुये थे, जरा 132 तेज रखना और किवाम डाला ? तो ठीक, अब यह भी डाल दो.. और सुनो जरा वह भी, इत्यादि इत्यादि..
ई सब निरख अउर तदोपरांत ऊ सब देखत हमरे दिमाग में कुछ कुछ होता है वाला कुछ… आगे पढ़िये
साहब तनि ई फरमवा भरवा दिजीए
Oct 10th
सुबह सबेरे दरवाज़े पर खड़खड़ … खड़खड़, यह कौन है भाई ? पीछे से अम्मा चिल्लायीं, ‘अरे रुको, पक्का गँवार है का, घंटी नहीं देखाता है ?’ “घंटिया तो देख रहें हैं, माई.. बीजलियो होगा के नहीं, ई नहीं बूझे थे । बाबू साहेब से तनिका काम था, भोरे में भेंटाइये जायेंगे, तब्बे न आयें हैं । बोले थे कि कोनो काम होगा त मदत-ऊदत कर देंगे ।” यह उसका प्रत्युत्तर था ! अब मैं चैतन्य हुआ, कोई पैसा उधार माँगने तो नहीं आया है ? इस समय राँची में हूँ, और यह आम बात है, सो यही होगा ! मैं किचकिचा कर निकला, देखा हनुमानुद्दीन खड़े हैं, चेहरे से याचना टपक रही है । ‘का है रे ?’ मेरा प्रश्न.. कुच्छौ न सरकार तनि ई फरमवा भरवा… आगे पढ़िये
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः मीमांसा
Oct 7th
वस्तुतः मेरी पिछली पोस्ट पर श्री अनूप जी की टिप्पणी आयी, कि महाराज इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का अर्थ तो दे देते । सतीश बोले कि गागर में सागर.. ! इस प्रकार अपने ही हाथों यह धर्मसंकट उत्पन्न किया, सो प्रायश्चित स्वरूप यह पोस्ट ठेलने का साहस किया गया है । गवारा तो नहीं था, पर जैसा… आगे पढ़िये



