Archive for August, 2008
अहो… तो आज टिप्पणिये बंद है !
Aug 27th
वाह भाई, क्या नज़ारा है….. तू रूठा रहे, मैं मनाता रहूँ… तो मज़ा जीने का और भी आता है ! अय हय, अरविन्द भाई.. एकदम्मै से भभक पड़े.. अभी क्लिनिक से लौटा तो देखा, कि एक सार्थक ’ क्वचिदन्यतोअपि…’ चल रही है । देखा तो ज़ाकिर भाई भी कतार में खड़े गा रहे हैं..’आपने याद दिलायाऽ ऽ..तो मुझे याद आया ’ आनन्दम आनन्दम, जय हो भोलेनाथ त्रिपुरारी.. बोल बम्म
इधर स्साला मँईं बी बिज़्ज़ी रहा और.. अरॆऽऽ हः ,ऊ क्या बोलता कि लीखने ऊखने का जइसे मनइच नॆंईं करता ! लीखने का नॆंईं तो पढ़ने का.. कुच्छ तो करेंगा न बाबा… खाली पीली अक्खा टाइम का क्या करेंगा, मैन ? सो हम लेरका – लेरकी लोग का बिलाग पढता, जब्बी कोई बिलाग… आगे पढ़िये
मुझे इतना ज़लील भी न करो.. बेटों
Aug 17th
अरे यह शीर्षक कैसे चला गया ? यह तो मैंने सहेज़ कर किसी और पोस्ट के लिये रख छोड़ा था । चलिये.. भगवान की मर्ज़ी या मेरे अवचेतन का चोर ! बचपन से घुट्टी पिलायी गयी है.. जो होता है, अच्छे के लिये ही होता है । सो, इसी को चलने देते हैं !
लोगों के मेल आ रहे हैं, सक्रिय नहीं हूँ । तो, भाई क्या करें ? मुलुक की सक्रियता तो दूसरे पाले में बैठी ठेंगा दिखा रही है । तो हम उसके अपने पाले में आने का इंतज़ार ही तो कर सकते हैं ? सो विकास के प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुये देख कर भी, यदि मैं आपको निष्क्रिय लगता हूँ, तो लगा करे ! अरे कुछ नहीं तो, इस वेबपेज़ को ही निरख लीजिये, भाई..कितने… आगे पढ़िये
नारी – नितम्बों तक की अंतर्यात्रा
Aug 8th
कल अनूप भाई का उलाहना पढ़ा चिट्ठाचर्चा पर, सक्रिय रहने की सलाह भी नत्थी थी । अनूप भाई का मैं आदर करता हूँ, वैसे तो अनादर भी किसी का नहीं किया करता । यह तो अपने विनम्र होने की परंपरा में कहा जाता है, सो कह रहा हूँ । वैसे आप इसको अपने लिये सीरियसली भी ले सकते हैं । उन्होंने दो कदम आगे बढ़ कर मेरे सहज और चुटीले होने की सूचना भी दे दी । अनूप भाई को मैं ब्लागिंग में आदर्श मानता हूँ, सो मैं गौरवान्वित होता भया, आभार !
सहज तो समझ में आता है, क्योंकि मैं साहित्य मेरा विषय नहीं रहा।साहित्य व्यसनी होना अलग बात है, साहित्यकार होना अलग..वैसे ही जैसे कि शराबी और डिस्टलरी का होता होगा ।… आगे पढ़िये



