Archive for June, 2008
आह, नारको रोको… रोको ना… ये नारको
Jun 30th
टाइमिंग के मामले में, मुझे कमज़ोर समझा जाता रहा है , गलत समय पर टप्प से बोल देना । शायद आज फिर यह साबित होने जा रहा है । पिछली बार डा० अमित कांड के समय, मैं एम्स के हड़ताली ( ? ) डाक्टरों के पक्ष में कुछ लिख-विख रहा था… अब डाक्टर तलवार सुर्ख़ियों में हैं, तो नारको टेस्ट पर लिखने को ऊँगलियों में कई दिन से ऎंठन हो रही है । लिखूँ ?बड़ा फ़ैशन में है यह नारको, अ हैपेनिंग थिंग । हम भारतीयों की एक विशेषता है, अंधानुकरण ! बहुधा फ़ैशन को केवल एक शब्द ‘ प्रचलन ‘ से ही परिभाषित करके फ़ारिग हो लिया जाता है । ठीक है, लेकिन प्रचलन तो प्रचलित होने के बाद ही तो उपजता होगा, यह जैसे मुर्ग़ी और अंडे के… आगे पढ़िये
अनुशासन ही देश को महान बनाता है ?
Jun 26th
यही तो मैं भी कहूँ, कि दिमाग से कुछ फिसल रहा है ! क्या, क्यों और कैसे ? मुझे आज दोपहर तक स्वयं ही मालूम न था । आज क्लिनिक जाते समय, अचानक वोह मारा इस्टाइल में बोधित्सव ( ब्लागर वाले नहीं ) ज्ञान कौंधा कि अनुशासन ही देश को महान बनाता है । सत्य वचन, हम तो भुलाय बैठे थे कि इस मुलुक में अनुशासन नामक चिड़िया भी हुआ करती है । भला हो इस मानसून का कि हमें इसका याद दिलाय दिया ! अनुशासन ही देश को महान बनाता है, हुँह यह कौन सी नयी बात है ? कुशल बहुतेरे महाशय का तो यह तो पुराना पर-उपदेश है !
यह तो भूल ही गया था कि यह मेरे भारत महान का महान राष्ट्रीय नारा है… आगे पढ़िये
क्यों .. … ?
Jun 20th
सुबह से मन कुछ अनमना सा हो रहा है । आज क्लिनिक भी नहीं गया । अभी ब्लागजगत की सैर करके लौटा हूँ, कुछ ख़ास पोस्ट नहीं दिखीं । अब बाकी कल देखा जायेगा..सोच कर सोने आया । प्रयास करने पर नींद और भी आँखमिचौली खेलती है । एफ़०एम० लगा दिया है, कुछेक गाने बज गये, क्या सुना, मुझे स्वयं पता नहीं । दो बजने वाले हैं, जब गानों में मन गड़ाने का प्रयास किया तो फ़ालतू सवाल ज़वाब होने लग पड़ा.. ..
FM. क्यों चलती है पवन मैं. हवा का दबाव कम होने से
FM.क्यों झूमे है गगन मैं.धरती की अपनी धुरी पर घूमने के कारण FM.क्यों मचलता है मन मैं.हृदय की गति और साँस बढ़ जाने के कारण आगे पढ़िये
काहे भाई, काहे परेशान है ?
Jun 15th
बुश आजुकाल फिर से बौराये भये हैं, पता नहीं उन पर कौन सी खुज़ली सवार होय गयी है ? डा० आर्या बतावें तो बता दें, चमड़ी की परख रखते हैं, वरना हम तो सीधी बात जानते हैं कि वह अपने जाते हुये राज का डर इस नवी किसिम के ख़ाज़ से छुपा रहे हैं । हमारी किताबें तो इसको कन्वर्ज़न रियेक्शन के नाम से पुकारती है । हुच्च हुच्च कर बता रहे हैं कि देखो दुनिया वालों, जिस भारतवर्ष की आबादी दुई बेर खाती थी और अब उसी की आधी आबादी दुई बेर खाने के जुगाड़ में हलाकान है, उसी नवे खलनायक हिंन्डियाः ( भारत ) के नालायकी से पूरी दुनिया में अनाज का टोटा पड़ा है ।
ओऎ बुश, तू अपनी बगलें खुजा । हमें काहे दिखा रहा है… आगे पढ़िये
मैं किस कबीले से हूँ ?
Jun 12th
पता नहीं मुझे कभी कभी क्या हो जाता है, किसी घटना को लेकर लगता है कि अरे, यह तो मेरे साथ घटित हुआ था, या हो रहा है । अनजानी जगह पर अनायास यह भावना जोर मारने लगती है कि यहाँ तो मैं आ चुका हूँ । जानता हूँ कि यह कोई रोजमर्रा की सामान्य घटना नहीं मानी जायेगी । किन्तु यह पागलपन भी नहीं है । यह चिकित्साजगत की एक सर्वमान्य प्रतिभासिक तथ्यपरता ( Phenomenon ) है । कारण ? अभी तक हम अनुसंधान ही कर रहे हैं कि ये Déjà-Vu क्यों होता है ?
कभी कभी लगता है कि पंडिताइन का चेहरा बहुत दूर होते होते अजनबी सा हो गया है, और मैं इस अजनबी चेहरे से कब और कैसे मिला था, इसमें गुम हो जाता… आगे पढ़िये



