Archive for May, 2008
अबे , तुम खुश तो हुये नऊये ?
May 28th
कैसा लगा बंम्बक नाऊ का किस्सा, कुछ ख़ास नहीं, बचकाना, मज़ेदार या कुछ और ?
वैसे भी यह पोस्ट गलत टाइम पर रिलीज़ हो गयी । हमरे बिलागपुरा में टेंशन हुयी गयी, कुछ जन बौरिया के गाली गुफ़्ता पर उतर आये, मरद मेहरिया सबै चिल्लाहट मचा दिये, सवा सोलह आने अराजकता के लेबल लायक । सब डिस्टर्ब होय गया । अभी तो ग़मी छायी है, बड़के मूड़ी जोड़ कर मंत्रणा कर रहे हैं, तमाशबीन मूड़ी पटक रहे हैं । पता नहीं इनको इस नऊये से का दुश्मनी रही ? हमको लगता है कि यह सुनियोजित दंगा, हमरे पोस्ट को फ़्लाप करने के लिये ही किया गवा है । खैर, जितना भी कोशिश करो.. नऊआ अमर है, मरेगा नहीं !
वैसे सच बताऊँ तो, मुझको भी लग… आगे पढ़िये
लो सुनो भाई, राजा और नउआ का किस्सा
May 26th
कहानियाँ बहुत समय पहले ही होती थीं, आज़ का सच कौन सुनना चाहता है ? तो, बहुत समय पहले की बात है , एक राजा थे और एक उनका मुँहलगा नाई ! नाई उस्तरे का धनी किंतु बुद्धि का भोथड़ा था , पर बनता होशियार था । हर जगह अपनी टाँग घुसेरने को तत्पर ! उसके मन में आया कि यह काजू मेवे खाने वाला राजा भला हगता क्या होगा ? जरा किसी दिन देखा जाये , कैसे भला ? मुश्किल है । कोई मुश्किल नहीं, नाऊन ने सुझाया । उनको सुबह टहलाने व खुली हवा में मालिश करने ले ही जाते हो, एक दिन ज़ुलाब दे दो । इसमें तो अच्छे अच्छे ढीले हो जाते हैं, क्या राजा क्या प्रजा ? बस असलियत देख लेना, और… आगे पढ़िये
राजा और नऊआ का किस्सा
May 25th
समीर भाई की फ़रमाइश हुई है कि यह किस्सा क्यों दबा गये ? समीर भाई मेरे बचपन के साथी एवं सहयोगी भी हैं । सो आपके आगे आना पड़ा । मौज का मसाला तो मौज में ही लिखेंगे न, दद्दू ? आप तो हेलिकाप्टर पर उड़ रहे हो और मुझ पर धुर देहाती किस्से का सवाल ठोक दिया । मेरे लड़कईं की यहसब बातें अब कौन पढ़ेगा , सैलून पार्लर के ज़माने में राजा अउर नउआ ? देख लो भाई, अगर चार ठईं पाठक भी न जुटे तो मुझको क्लेष पहुँचाने के भागीदार बनोगे । अपने को व्यक्त करते रहने की अपनी आदत तो है, किंतु इतना भी ठेलास नहीं सताता कि जुटे रहें, कंम्प्यूटरवा भी कल्ला कर बोले , ” भईय्या, अब अपना रिस्टार्ट… आगे पढ़िये
पर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ?
May 23rd
उफ़्फ़ कितनी गर्मी थी, यह अमेरिका, कनाडा व आयरलैंड में बैठे लोग क्या जानें ? वह तो सर्दियों में साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की तरह अपने इंडिया आते हैं, और गर्मियों की शुरुआत होते ही फिर फ़ुर्र हो जाते हैं । पर इन बातों का यहाँ क्या लेना देना, फिर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ? अब निट्ठल्ला तो बकवास ही करेगा, न ? सो कर रहा हूँ ! अब आप पढ़ने पर आमदा ही हैं, तो मैं क्या करूँ ?
हाँ, तो इस बार की गर्मी ग्लोबल वार्मिंग और बुश्श के भेज़े के तड़के के साथ आयी है, सो ज़ाहिर है कि कुछ ज़्यादा ही गर्म थी । यह कहा जाता है कि गर्मियों में हम डाक्टरों की ज़ेबें भी गर्म हुआ करती हैं, तो भाई… आगे पढ़िये
जरा सामने तो आओ छलिये .. ..
May 16th
अब इन्हें छलिया न कहूँ तो आप ही कोई नाम सुझायें । वैसे तो इनका परिचय शाह हनुमानुद्दीन के रूप में दिया जा चुका है, पर ये मौके पर हाथ से फिसल जाते हैं नतीज़न इनके इंटरव्यू की तारीख़ दिवानी के मुकदमें की तरह आगे बढ़ती जाती है । ज़ालिम, तुम क्या ब्लागिंग से मेरे उखड़ जाने बाद ही आओगे ? इस माथमंथन की नौबत ही न आती, ग़र मैं इनकी ज़ुस्तज़ू छोड़ किसी हिट होते आदमी को आईना दिखा देता ।
कल रात की ही बात है, मेरे मित्र मुन्ने उर्फ़ अज़हर खान का एकाएक फोन आया, " अरे यार डाक्टर, अब तुम जम्पिंग ब्लागिंग पर उतर आये हो, आख़िर कौन ज़ल्दी पड़ी है, तुम्हें ? "मैं अचकचा गया, " अमें क्या… आगे पढ़िये
आओ सखि जरा निन्दिया लें
May 13th
दूर कहीं किसीके रेडियो से गाने की आवाज़ सन्नाटे से संघर्ष करके आती प्रतीत हो रही है । नहीं जी, मैं बहरा नहीं हूँ,गाने का प्रतीत होना एक अलग तरह का एहसास है । गाना गाया जारहा है, यह निर्विवादित होता है, धुन भी चिरपरिचित लग रही है, किंतु स्पष्टता के अभाव में, आप गाने के बोल नहीं पकड़ पा रहें हैं, तो इसे क्या कहेंगे ? मन को अशांत कर देने वाली छटपटाहट ! साइडरूम से कुछ खाना खा कर लौटा, तो अनमने ढंग से टी०वी० खोल कर बैठ गया, जरा देखा जाये कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है ? वैसे टी०वी० में मेरी आस्था न के बराबर रह गयी है, पर कोई और चारा भी नहीं है । ब्लगियाऊँगा तो शायद रात ही न… आगे पढ़िये
मैं मोटा क्यों हूँ…मैं मोटा क्यूँ हूँ ?
May 10th
अरे भाई बिरादर, जब ऋतिक रोशन जैसी फ़िगर न रही, तो खिसियाहट मिटाने को यही पैरोडी बाथरूम में घुसते हुये, लोगों को जोर से सुनाते हुए, गुनगुना कर काम चलाना पड़ता है । हँसिये मत भाई, सही में इसे मैं काम चलाना ही कहूँगा, मज़बूरी है । अपने चाणक्य बाबा मलेच्छ भाषा में कह गये हैं, ( मलेच्छों का प्रवेश वर्जित तो नहीं ? ) Offence is the best Defence सो उनका अनुसरण करते हुये, दूसरों के हँसने से पहले मैं स्वयं ही गाने लगता हूँ । अगला भला क्या खाकर कोई किसी छिनरो का भतार छीनेगा ? जरा नमूना देख लीजिये, यह मैं नहीं, मैन्यूल है, बोले तो मेरा फिज़िशियन सैम्पल!



