Archive for April, 2008
अथ कथा शाह हनुमानुद्दीन
Apr 30th
तुमने किया था कल आने का वादा…बुढ़वा गंगा किनारे वाले की मोटी खड़खड़ाती आवाज़ कहीं दूर से तैरती हुई आरही है । इसको कैसे पता लग गया कि मेरा हनुमानुद्दीन कल आने का वादा करके मुकर रहा है । बुढ़वा तो धूमकेतु की तरह छाता जा रहा है, खैर… वह शेरवुड वाला है, और मैं मिडिल स्कूल टाट-पट्टी की उपज, वह क्रीमी लेयर तो मैं सड़ा छाछ ! फिरभी अपने ब्लाग का राजा भोज तो हूँ ही, हम कोई अनिल अंबानी के वेबसाइट के मोहताज़ थोड़े हैं । यहाँ सभी राजा हैं, हम हैं राजा ब्लाग के, हमसे कुछ न बोलिये..हमसे कुछ न बोलिये, रूँ रुँ रुँ रुँ..जिसने भी हमें टिप्पणी दी..हम उसी के हो लियेऽ ..ऽ, हम उसी के हो लियेऽ ..ऽ, हम हैं राही ब्लाग आगे पढ़िये
ओऎ…ब्लगिया का सब्ब झस लेई गयो रे…
Apr 25th
ब्लागिंग पर तो हमजैसे निट्ठल्लों और ठेलुओं का एकाधिकार समझत जात रहा । जहाँ बड़कन में से एकाध जन भी, कभी भूले भटके नाकौ छिनकै नहिं आवत रहे, उहाँ पेट भर कै अघाय भये, मनई भी मुँह उठाय घुसै चले आरहें हैं । फ़ुरसतिया फेम के सुकुल महाराज अबतक इलाहाबादी बाहुल्य से पीड़ित रहे, अउर एक कउनो बुढ़वा गंगा किनारेवाला भी फाट पड़ा बिलंगिया में । फाट पड़ा तो फाट पड़ा, भला हमार काहे का फटे ? ईहाँ रोजई दुई तीन टपकत हैं, मुफ़त के चंदन घिस मेरे लल्लू । हमरे घरे से तो कुच्छ जाय नहीं रहा ! लेकिन ई बुढ़वा गंगा किनारे वाला इहाँ का कर रहा है, यही जानै का हमरे पेट मा दरद उठि रहा हवे । हमहू लपकेन कि आओ तईं… आगे पढ़िये
बचना, ओऽ ..ऽ ख़बीसों….लो मैं आ गयाःऽ
Apr 22nd
लोजी लो, मैं तो राँची से लौट भी आया, अब कहोगे कि अपनी मनगढ़ंत पूरी करो । सो, पूरी तो करना ही पड़ेगा वरना सबलोग क्या कहेंगे ? यही ना कि दो दो ब्लाग का बयाना लिये पड़ा है, वहाँ ‘ काकचरितम’ अधूरी छोड़, एक मनगढ़ंत पोस्ट को भी अधर में टाँग कर यहाँ टहल रहा है । कल की पैदाइश और ख़लीफ़ागिरी चालू ! बाँयीं आँख भी सुबह से फड़क रही है, इधर शीर्षक में भी ख़बीस घुस आया है, अल्लाह जाने क्या होगा आगे ? कोई भी जीवित या मृत बंधु ख़फ़ा न हों ।… आगे पढ़िये
एक मनगढ़ंत पोस्ट !
Apr 16th
भईय्या, पहले ही बता दूँ ताकि हमारे ऊपर कोई ऊँगली न उठाये कि यह मनगढ़ंत पोस्ट उनकी है, मेरा यह पात्र जिसका साक्षात्कार मैं आपके सामने परोसने वाला हूँ , नितांत मौलिक है । कुछजनों की ऊँगली आदतन बहुत सक्रिय रहा करती है, हमेशा फ़ड़फ़ड़ाती रहती है, पता नहीं कौन टकरा जाये, सो वह अपनी ऊँगली में तेल वेल लगाकर तत्पर रहा करते हैं, तो सही-गलत ठिंये पर लगाने का मौका चूकें ही क्यों ? आजकल सुनते हैं कि ब्लागजगत में चोरी चमारी बहुत हो रही है । यह एक अच्छा संकेत है, यानि चोरी का सीधा संबन्ध समृद्धि से है । नंगटे की लंगोट या नकटे की नाक पर भला कौन अहमक निगाह भी डालेगा ? वैसे कल्पना या कपोलकल्पना से परहेज़ करता हूँ, यह मुझे अफ़ीमची की… आगे पढ़िये
ई है बंबई नगरिया, तू देख बबुआ .. ..
Apr 13th
आपणाची मुंबई शंघाई बनने जा रहा है, कब तक ? मैं वापसी के ट्रेन में था, और दो जनों के बीच शायद टाइमपास बातचीत चल रही थी , क्योंकि दोनोंजन एक साथ ही अपने बोलने लग पड़े थे । पीछे की बर्थ से किसी ने चुटकी ली, जब भईय्ये लोग बाहर हो जायेंगे और गौरमिंट आरक्षण वगैरह के विकराल कब़्ज़ियत से फ़ारिग हो लेगी तब ? पण कवायद चालू आहे
कुछ फोटू शोटू देख कर आप भी तसल्ली कर लो ।
इनको… आगे पढ़िये
या देवि सर्वभूतेषू …. ?
Apr 13th
यह प्रश्नचिह्न, क्यों ? आज षष्ठी है….’ षष्ठं कात्यायनी च सप्तमं कालरात्री ‘, और इस दुर्लभ संधिबेला में , ऎसे पोस्ट से कहीं अनर्थ तो न हो जाये , कुछ तो माँ से डरो, यह कोई और नहीं, पंडिताइन की भयातुर शंका है । इस पावन नवरात्रि की महिमा, आजकल तो घर घर गायी जा रही होगी, और तुम ? तुम ऎसा करोगे, मैं सोच भी नहीं सकती, छिःह !! यह लेडीज़ लोग, आख़िर क्यों मौके बेमौके अपनी फ़्री टीका मीमांसा प्रस्तुत किया करती हैं ? याकि यह सौभाग्य केवल मुझे ही प्राप्त है ?
सोच तो मैं भी रहा हूँ ! जो बंदा सन 1968-69 के दौर से ही… आगे पढ़िये
नंगे सच की माया
Apr 8th
क्षमा करें या छोड़िये क्षमा नहीं माँगता, ज़रा आप ही सहायता कर दें ! जरा बतायें कि इस पोस्ट का उचित शीर्षक क्या होना चाहिये था , नंगे सच की माया या माया का नंगा सच ? जो भी हो, आपके दिये शीर्षक में एकठो नंगा अवश्य होना चाहिये, वरना आपको भी मज़ा नहीं आयेगा ! वैसे राजनीति पर कुछ कहने से मैं बचता हूँ । एक बार संविद वाले चौधरी के बहकावे में, मै ‘ अंग्रेज़ी हटाओ ‘ में कूद पड़ा था, अज़ब थ्रिल था, काले से साइनबोर्ड पोतने का ! लेकिन इस बात पर, मेरे बाबा ने अपने इस चहेते पोते को धुन दिया था, पूरे समय उनके मुँह से इतना ही निकलता था, "भले खानदान के लड़के का बेट्चो ( किसी विशेष संबोधन का संक्षिप्त उच्चारण, जो आगे पढ़िये



