Archive for January, 2008
ये डाक्टर…. वाह डाक्टर !
Jan 26th
क्रम – दो * अब आप उपभोक्ता मात्र हैंसेन्चुरीज़ एगो रहीम बाबा कहिन निज कर क्रिया ‘रहीम’ कहि, सुधि भावी के हाथ ।पांसे अपने हाथ में, पर दाँव न अपने हाथ ॥
काश उनके समय में ही मुआ उपभोक्ता संरक्षण लागू हो गया होता, तो एक सशक्त पैरोकार डाक्टरों के पक्ष में होता । ख़ुदा आपसब को उम्रदराज़ करे ताकि आने वाले अगले दस बारह साल की स्थिति कैसी हो सकती है, आप स्वयं देख लें । ट्रेज़ेडी है या कामेडी, मुझसे परिभाषित नहीं हो पा रहा है ।
2007 – बच्चे का बाप गिड़गिड़ा उठता है, ” मुझ से जो भी बन पड़ेगा, आपकी सेवा करुँगा डाक्टर साहब । जितना आगे पढ़िये
पोंगल खिचड़ी मिक्स
Jan 13th
चौंक तो नहीं गये, यह कौन सा व्यंजन ? हमारे भारतदेश का यह सांस्कृतिक बोनान्ज़ा है ! राष्ट्रीय त्योहार सरकारी स्तर पर अवश्य मनाये जाते हैं किंतु यह त्योहार संपूर्ण देश में एक निश्चित तिथि पर ( 14 या 15 जनवरी को ) किसी न किसी रूप में अवश्य मनाया जाता है और एक तरह से उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ता भी है । तो, स्वीकार करे मेरी …..मकर संक्रान्ति शुभकामनाएंसमय कब कहाँ से चला था, यह भले ही अनुसंधान का विषय हो किंतु सृष्टि जब से भी चल रही हो, तभी से सबकुछ समय के चक्र के साथ ही चलता रहा है और आगे पढ़िये
गरीब मुल्क के अमीर पालनहार
Jan 6th
परदा उठने के पहलेआपको मज़बूर नहीं कर सकता कि आप मुझे यहाँ झेलें किंतु मेरी मज़बूरी है कि बहुत ज़ब्त करने के बाद ही मज़बूर होकर इस पन्ने पर आता हूँ ।
कहीं से आवाज़ आयी है, बल्कि कुछ गैर- ब्लागर बिरादरी के मित्रों ने भी इंगित किया है, कि मैं आखिर पाज़िटिव क्यों नहीं देख पाता ? बिल्कुल सही है मित्रों, आप सभीजन की यह टिप्पणी एवं कुछेक कटाक्ष दोनों ही अपनी अपनी सीमाओं में मुझे शिरोधार्य हैं । किंतु मैं इस पन्ने पर एक ख़ास अंतर्वस्तु ( थीम ) लेकर ही आता हूँ, ठीक उसी प्रकार जैसे की हर शरीर का अपना अलग व्यक्तित्व होता है आगे पढ़िये
ऎई क्या बोलता तू…
Jan 4th
अब इस मंज़र को देख कर कोई बोल भी क्या सकता है ?हुण तौ कुझ बोलणा ई नईं, पता नहीं यह किन मापदंडों का उल्लंघन कर रहे हैं ? ट्रैफ़िक रूल, चाइल्ड सेफ़्टी के प्रति उदासीनता, बेरोज़गारी का बेज़ार विकल्प, बेशकीमती होते जारहे पेट्रोल की बचत, अभिभावकों की सस्ता परिवहन तलाशने की मज़बूरी या फिर कुछ और ही ?यह तो ज़ाहिर सी बात है, बच्चे तो स्कूल के लिये ही ढोये जा रहे हैं, न कि यह कोई सर्कस का स्टंट दिखा रहे हैं । तो मैं ही क्यों हिला जा रहा ?हमको तो अपने बचपन में यह भी नहीं नसीब था, तीन माइल पैदल चल कर पाठशाला पहुँचना आगे पढ़िये
हें..हें…हेंहें, अजी मैनें कहा….
Jan 2nd
भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !
मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है,
” थैंक यू , सेम टू यू ! ”
यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस भेष में कोई असरदार आदमी ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई… आगे पढ़िये



