Archive for December, 2007
वर्ष की अंतिम बेला पर..
Dec 31st
कुछ तो ऎसा होगा ही..कि जिस घड़ी दुनिया नाच गा रही होगी, यह सिरफिरा अपना कुछ तो है पकड़े बैठा है !
दो तीन दिन से मन बड़ा खिन्न हो चला है, लगता है कि हम गलत दिशा की तरफ़ मुड़ते जा रहे हैं । अनायास अज़दक की पोस्ट से टकराने का संयोग हो गया । कुछ उनका लहज़ा भी बहुद सुखद नहीं कहा जासकता और एक टीप्पणीकार ने तो हद ही कर दी । आप स्वयं देख लें । हमारे एग्रीगेटर बंधु भी अपनी जनसंख्या बढ़ाने ली दौड़ में, अच्छे बुरे सबको समेटे पड़े हैं \ हाँलाकि मेरे तो दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं आगे पढ़िये
मेरी पड़ोसन. . . बेनज़ीर !
Dec 29th
आज दिन भर मन में उदासी छायी रही,बेनज़ीर नहीं रहीं । अल-क़ायदा के दहशतगर्दों ने ऎसा क्यों किया होगा, यह तो वक़्त ही बतायेगा , लेकिन सच है कि बेनज़ीर तो अब हमारे कायनात से ज़ुदा कर दी गयीं ।
‘ पूरब की बेटी ‘ उनका तख़्ख़लुस क्यों पड़ा, बता नहीं सकता । मेरे लिये तो वह बहन-बेटी से कुछ अलग ही थीं । ग़र चाय की प्याली में बवंडर न उठाने का इतमिनान आप सब बिरादरान दें, तो इसकी वज़ह भी ज़ाहिर की जा सकती है । खैर मैं जां-बख़्सी के भरोसे पर आगे यह खुलासा भी कर दूँगा ।
जैसा कि रस्म है कि हर मरहूम शख़्सियत के लिये हमेशा उसकी नेकी और… आगे पढ़िये
हे , डोल्ला रे, डोला रे….डोला…
Dec 24th
तो क्या सतयुग-त्रेता में भी समर्थन से ही सत्ता चला करती थी ? बात बेसिर- पैर की नहीं है, जनाब . आई एम सीरीयस ! अपने धार्मिक आख्यानों को पढ़ने में अक्सर महाराज इन्द्रदेव के सिंहासन डोलने का संदर्भ वर्णित है, बचपन में दो-तीन चुनाव देखे जरूर थे, लेकिन तो जनता ‘तू ही रे…तू ही रे….तेरे बिना कैसे जियुं ‘ ही कांग्रेस के लिये गाती रहती थी । हां कुछ सिरफिरे अलबत्ता स्वतंत्र पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट वगैरह की डफ़ बजाते दिख जाते थे । जब चौधरी साहब की संविद आयी ,तब से यदा-कदा इस प्रसंग पर ठिठक जाता था कि मिलीजुली सरकार तो हमें अधुनातन से ही मिली भयी है और शंका समाधान के प्रस्तुत करते ही… आगे पढ़िये
रुकावट के लिये खेद है…..तो हुआ करे !
Dec 23rd
इस निकम्मेपनी और बेशर्मी के माहौल में आपको खेद है ,
तो हुआ करे , कद्दू से !
रुकावट की वजह आपका जाती मामला है, देखीऎ, हम तो नौकरी कर रहे हैं । 2007 ब्राडबैन्ड वर्ष के रूप में प्रचारित किया जा रहा है/था । साल तो खालिये जारहा है, थोड़ा हनक दिया जाये, ई लोग बूझें तो कि हम इंडिया का प्रीमियम सर्विस दे रहे हैं । पब्लिक में कोई पहचानबे नहीं करता है, साला इन्ट्रोडक्सन देना पड़े तो बेकार है, ई नौकरिया !
भारत के महान कार्यशैली के हिसाब से तो सामान्य सी बात है, भाई देखीऎ, हमारा आपसे कोनो दुश्मनई नहीं न… आगे पढ़िये
रुकावट के लिये खेद है…
Dec 15th
तकनीकी खराबियों के कारण - रुकावट के लिये खेद है !हम शीघ्र ही हाज़िर होंगे,विशेष रिपोर्ट एवं विवरण के साथएक शीतयुद्ध जारी है, ऊँट के करवट बदलने की प्रतीक्षा करें
Subscribe to कुछ तो है,जो कि…..
आगे पढ़ियेमोची बनाम सुनार
Dec 3rd
मोची..मोची ना रहा….,सुनार .. सुनार ना रहा…. माया अब मुझे तो , तुझ पर एतबार ना रहा…. एतबार ना रहा
बताया था न कि सुबह सुबह कोई गीत ज़ुबान पर सवार हो जाता है, और आप उसे गुनगुनाने पर मज़बूर हो जाते हैं । तो, यह आज का गीत है, याकि आजके दौर का गीत है। इसमें पैरोडी दिख रही है आपको, तो दिखा करे । किसी की बनायी चीज़ को बिगाड़ने का सुख अलग ही तरह का होता है। और ऎसी पैरोडी में तो दिमाग तक नहीं लगाना पड़ा, अचानक बन गया स्वतः स्वस्फूर्त । कोई गीतकार भले ही हो, किंतु इतनी सारी पैरोडी को जीते जीते आगे पढ़िये
अथ मनुष्य योनिः
Dec 2nd
आज तेरी याद आ रही है, विंध्याचल ।
हाईस्कूल में मेरे एक सहपाठी हुआ करते थे,विंध्याचल सिंह । महा के मुरहे और खखेड़ी जीव थे, यमदूत से भी पंगा ले लें, कोई ताज्जुब नहीं । अनजाने में ही उन्होंने एक जिज्ञासा मन में छोड़ दी, जो यदा-कदा सुलग उठती है । कोई खास नहीं किंतु निट्ठल्ले चिंतन में दिमाग की वर्जिस हो जाती है ।
हिंदी तृतीय प्रश्नपत्र की तैयारी चल रही थी, छप्पर में कक्षायें लगती थीं । हमारे हिंदी अध्यापक पंडित पूर्णेंद्र मिश्र बड़े मनोयोग से व्याख्यायें लिखवा रहे थे । झुके हुये 45-50 अदद सिर धड़ाधड़ अपनी कापियों पर नोट टांचे जा रहे थे । उनकी किंचित अटपटाती, गुलगुलाती… आगे पढ़िये



