Archive for November, 2007
कभी कभी मेरे दिल में यह ख़्याल आता है
Nov 24th
यह बलम, सजन, सैंया वगैरह वगैरह किस ग्रह के प्राणी हैं ? बचपन में यह शब्द सहज लगते थे या कि मैं ही चुगद था कि ज़्यादा दिमाग लगाने से परहेज़ करता था,अरे होगा जैसा भाव मुझे दबोचे रहता था । ठूंस के खाओ और मस्त रहो । नर और नारी अलग अलग जीव होते हैं ,यह एहसास हुआ तो कुछेक वर्ष तो विस्मय में ही कट गये , समाधान करने वाला कोई विश्वस्त सुपात्र इर्द गिर्द मिलने में नहीं आ रहा था । फिर भी मादा का महत्व आगे पढ़िये
एक विनम्र क्षमायाचना
Nov 23rd
स्वांतःसुखाय किया जाने वाला कर्म किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता । किंवा कुछेक यहां कुछ नया देखने की राह तकते रहे हों, इसअपराधबोध से उबरने के प्रयोजन से यह क्षमायाचना निवेदित है । मेरे अंकोपरि संगणक के कठोरचकती के परचकरी के छर्रे कदाचित चुम्बकीय अतिभार से यदाकदा थम जा रहे थे एवं उसके क्षीण होने पर ही पुनः गतिशील हो पाते, फलस्वरूप संगणक महाशय चलते चलते ठहर जाते थे । यह त्रुटि उत्पादकजनित होने से स्थानीय संगणक तकनीशियनों के सुधार प्रयासों से परे थी ।अस्तु आश्वस्ति अवधि को लेकर एक लघु लड़ाई पर विजयोपरांत ही नयी कठोरचकती का प्रतिस्थारान्तरण संभव हो सका । यह अपरिहार्य अवधि ही मेरी यहाँ से अनुपस्थिति का आगे पढ़िये
तो बोलोगे कि बोलता है…..
Nov 11th
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् हमारा सनातनी दर्शन है, आओ तुम भी डुबकी लगा लो, कौन रोकता है ? सत्य वचन महाराज , हम भी सौगंध लिये हैं, “मंईं कूश्श नईं बोलूंगा , बहूत मेम श्शाब अउर शाबलोग हंय, बश ऊन्हीं को देखूँगा ।” और आगे सुनिये, ” ई लोछमीज्जी तो हरेक शाल आता हय अमारे शाबलोग के पाश, कलि रातु को तो मेमश्शाब कलब मे छौबीश हाज़ार जीता अउर लाके तिज़्जोरी को ताला मार दिया, दशगो रुपिया हमको बी बक्शीश दिया, शोत्ती बोलता हय शाब, शाब को गाडी से उतार कर बीश्तर पर ले गया, नईं तो गीर जाता ।” मैं थोड़ा विचलित हुआ, मेरी सौगंध भी रोक रही थी, ‘तू बोलेगा तो बोलेंगे, बोलता है । पण ई धरम सिंग गुरंग तीन दिनों से मस्तिष्क में डोल रहा है आगे पढ़िये
क्या आप बतायेंगे, आपके दफ़्तर में कितने गंज़े हैं ?
Nov 2nd
….और फिर शहर में कितने होंगे एवं इसी अनुपात से आपके जिले में इनकी संख्या कितनी होगी ? फिर तो पूरे प्रदेश में इनकी जनसंख्या का आकलन करना आपके लिये बहुत ही सुगम होगा । तो अब एक छोटी सी सहायता और, जरा यह जानकारी भी एकत्रित कर लें कि इनमें से अधिकांश का रूझान किधर है, कंघा पार्टी की तरफ़ या आईना पार्टी की तरफ़ ? हंसिये,हंसिये…किंतु यह कोई भंग की तरंग नही है, यह मश्शकत तो हमारे मीडियाकर्मी पहले से ही कर रहे हैं । हां, उनके इस वर्गीकरण का खाका कुछ अपनी ही तरह का होता है । अगड़े, पिछड़े, सवर्ण, जनजाति, मुस्लिम,हिंदू ,सिक्ख… आगे पढ़िये



