Archive for October, 2007
हम छोड़ चले इस महफ़िल को….
Oct 30th
भला बताईये तो, यह डाल्फिनें यहां क्या कर रही हैं ? धूप सेंक रही हैं, ना जी ना ! तो फिर…यह फोटोग्राफ़ है,उन डालफिनों का,जो समुद्रतट पर हठात आकर तड़्प तड़प कर आत्महत्या करने को बाध्य सी हुईं हैं ।नज़ारा है अरब की खाड़ी का,जहां इन्होंने सामूहिक ‘ हाराकिरी – बोले तो आत्महत्या ‘ की है । कारण ? ज़ाहिर है यह प्रेम में निराशा से तो नहीं ही किया होगा |( इस पर तो हमारा कापीराईट है ! ) तो फिर ? रहस्यमय तरीके से….अकारण । फ़िलहाल, पोस्टमार्टम हो चुका है और ‘ जांच चालू आहे… आगे पढ़िये
बदलता कलेवर !
Oct 30th
इंटरनेट ( अंतरजाल ? ) पर निरंतर किये जाने वाले प्रयोगों एवं HTML कोड में थोड़ी फेर बदल का परिणाम है, इस पेज़ का बदलता कलेवर !मेरे साथ मेरे Clinic Assistant ( आरोग्यशाला अनुचर, या कुछ ऎसा ही ) कैफ़ खान के सुझाव एवं सहायता उल्लेखनीय है, चूंकि एक Theme ( कथ्य ) को लेकर Webzine ( अन्तरजाल पत्रिका ! ) की मेरी परिकल्पना है । अतएव इस सोच की निर्मम आलोचना एवं कोमल सुझाव दोनों का ही का सदैव स्वागत रहेगा | इनको ’नियरे राखिये ’ का ’कुटी छ्वाय ’ तैयार है यहां !’ चलते चलते एक बात का जिक्र मैं अवश्य करना चाहुंगा कि भाषा को क्लिष्ट बनाकर आम मानस को विलगायें नही, बल्कि सरल, सुगम्य, स्वरुप… आगे पढ़िये
पहले मेरी भी तो सुनिये, सुनीता जी !
Oct 27th
सुनीता जी, बहुत बहुत धन्यवाद ! इस वेबपेज़ में सह्भागिता के लिये . किंतु एक पेंच दिख रहा है. जैसा कि मेरा मानना है कि ब्लागसाईट की एक ‘ थीम ‘ होनी चाहिये , ताकि आगंतुक को यह पता रहे कि यहां क्या मिलेगा , मनोहर कहानियां या हंस ( वैसे मै दोनों ही पढ़ता हूं, किंतु मूड के हिसाब से, एक समय में एक ही ! )इस जगह यानि आपके सामने खुले पेज़ पर माज़रा कुछ और ही दिख रहा होगा . आपने महसूस भी किया होगा कि अपने इर्द गिर्द व्याप्त विसंगतियों को इंगित करना हर पढ़े लिखे शहरी का कर्तव्य है, यदि हम मुर्दा कौम में शुमार नहीं होना चाहते हैं, तो ! आप किसी भी मुद्दे को यह कह कर खारिज़ नहीं कर सकते, ” छोड़ो… आगे पढ़िये
दिल्ली में बंदरो ने मचाया आतंक
Oct 26th
दिल्ली के बंदरो से भगवान बचाये…मगर जब भगवान बचाये बोले तो बचाने के लिये भगवान अपने पास ही बुला लेता है…जैसे कि कुछ समय पहले सुना था मेयर साहब बंदर से बचने की खातिर छत से ही कूद गये…अब बंदर भी क्या करें मुझे लगता है बंदरो ने सोचा है कब तक बंदर बन कर रहा जाये…थौड़ा विकास बंदरो का भी हो ही जाये…डी.टी.सी वाले तक डर गये है परेशान है उनके आतंक से….और मैने तो सूना है उन्होने एम.सी.डी वालो को साफ़ कह दिया है की अगर बंदर नही हटाये तो वो आंदोलन पर उतर आयेंगे…एम.सी.डी. वालो ने भी मरता क्या न करता वाला काम किया है एम. सी.डी… आगे पढ़िये
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान…..
Oct 23rd
…..कितना बदल गया इंसान !क्षमा करें ,आज भी मेरे पास कोई गुदगुदाने वाला चटपटा मसाला नहीं है . शायद यह मेरा व्यक्तिगत दोष ही हैकि घर से बाहर निकलते ही ‘कबिरा खड़ा बज़ार में..’ जैसे मुझे ललकारने लगता है .गणपति की दशा तो दिखला ही चुका हू , आप भी न उबर पाये होंगे ( इसकी संभावना भी निकटभविष्य में कम ही दिखती है ) कि मां अपने नौ दिवसीय दौरे पर मायके आ गयीं, अकालबोधन ही सही . इस मर्त्यलोक में माटी और लुगदी के विग्रह ही उनको रास आते हैं, सो सबका मुज़रा लेने वहीं विराजती हैं … आगे पढ़िये



