जनवरी-फरवरी 2008 से ड्राफ्टिया मोड में पड़े इस आलेख का आज अहिल्या-उद्धार हो रहा है.. शीर्षक था पीरन के पीर भये जुलहे  कबीर ! पोस्टो के तत्कालीन रुझान को देखते हुये कबीर साहब नेपथ्य में हो लिये । क्योंकि तब मुझसे टिप्पणियों में पूछा जाने लगा था कि आप काहे डॉक्टर हैं । मन में पलता अपराधबोध आज शमित होने को है, दर्ज़ा सात में पाठ्यपुस्तक में कबीर को पढ़ा और वह मन को भा गये… वाह, क्या बेबाकी का ग्लैमर था… काँकर पाथर जोड़ि के मसजिद लियो बनाय… पाथर पूजैं हरि मिलैं ता मैं पूजूँ पहाड़ । तब तक किसी को इस तरह डपटते न सुना, न देखा, न पढ़ा था । दुबारा वह हाई स्कूल के कोर्स में अवतरित हुये… फिर क्या था मैं… आगे पढ़िये