एक साफ सुथरे दिमाग की
ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये
Oct 4th
ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ?? क्यूँ ??
क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा जैसे आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है । पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये । यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत ही जुड़े रहे, परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी… आगे पढ़िये
क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट – हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब
Sep 28th
माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.
Apr 23rd
आज कट-पेस्टीय तकनीक से एक लँबी पोस्ट लिखने का जुगाड़ लग गया ! हमारे क्लास टीचर श्री अनूप शुक्ल जी कहते हैं.. वह हमरा लिखा बूझ नहीं पाते ! गुरु, आप कभी ऎसे अनाड़ी तो न थे.. ही ही तो.. कट-पेस्टीय तकनीक से लँबी पोस्ट का जुगाड़..क्या मैं छायावादी कहलाऊँगा यदि मैं इसकी तुलना भारतीय राजनीतिज्ञ से करूँ, तो ? हमें टिप्पणी चाहिये.. और उन्हें वोट ! हमने भी जहाँ अलाव जलती देखी, लपक कर हाथ सेंक लिये, बस फ़र्क़ इतना है, कि वह पहले आग लगा देते हैं, बाद में हाथ सेंकते हैं हाँ, अलबत्ता मुद्दे उठाने की कट पेस्ट में हम दोनों ही ईमानदार हैं, वह मुद्दों की वोट वैल्यू हेरते फिरते हैं, और हम कमेन्ट… आगे पढ़िये
भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !
Jan 5th
पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008
हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! " यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही… आगे पढ़िये
सनद रहे कि यह नकल है..
Dec 7th
अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ? यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे.. इस पोस्ट के मूल लेखक को… नहीं पहचाना ? कोई बात नहीं., फिर तो.. यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया । ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे। ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि आगे पढ़िये
अमर कुमार का ई-कचरा
Nov 15th
आज शनिवार है या समझिये कि था… वैसे तो इतने दिनों गायब रहा ही, पर आज है मेरी साप्ताहिक छुट्टी, और यही दिन तो असल छुट्टी में शुमार है, सो अपने मेल इनबाक्स का थोड़ा बहुत ज़ायज़ा वगैरह लिया ही था, कि एक हितैषी का मेल देखा.. वैसे तो इनका लगाई-बुझाई करने जैसा व्यक्तित्व नहीं है, पर इन्होंने श्री ई-स्वामी जी के किसी साइड एफ़ेक्ट पोस्ट का जिक्र कर, इशारा दिया कि मैं अपना भी पक्ष रखूँ ! अब मैं अपना भेजा तो अंबाला में छोड़ आया हूँ, गुड़ाई-निराई व सिंचाई के लिये, क्या करूँ ? पक्ष धरी धरी.. या न धरी !
लेकिन अपना पक्षवा काहे रखूँ, भाई.. ई कोनो… आगे पढ़िये




कई दोहराव की गवाह एक लम्बी टिप्पणी
Apr 15th
टाइमखोटीकार डॉ. अमर कुमार वर्ग एक साफ सुथरे दिमाग की
12 टिप्पणियाँ
टिप्पणी नहीं, यह सच्चा वाकया है, जो 1992 में मेरे साथ गुज़री थी । सँयोग की बात है यह 3 ब्लॉगपोस्टों पर दोहराई गयी । पहली बार श्री ज्ञानदत्त पाड़ेय की पोस्ट पर दूसरी बार का मुझे ठीक से स्मरण नहीं, और आज तीसरी बार श्री अफ़लातून जी के पोस्ट पर यही टिप्पणी माकूल लगी ।
जब पहले पहले शयनयान चला था, बडी अफ़रातफ़री थी नियम कायदा स्पष्ट नही था ( वैसे अभी भी कहा है,अपनी अपनी व्याख्याये है ) तो शिमला से एक अधिवेशन से एम०बी०बी०एस० लौट रहा था , अम्बाला से इस शयनयान मे शयन करता हुआ सफ़र कर रहा था बीबी बच्चे आरक्षण दर्प से यात्रा सुख ले रहे थे, कभी नीचे कभी ऊपर आगे पढ़िये