ताकि सनद रहे ..
बाबा.. बाबा…बाबा.. अरे अब बस भी करो, बाबा !
Jun 19th
सोचा था कि योगागुरु रामदेव यादव पर कुछ न लिखूँगा… चहुँ ओर बाबा का शोर, उफ़ ! तथाकथित बाबा को लेकर पूरे ब्लॉगजगत सहित, हमारा प्रगतिशील जुगाली समाज दो घड़ों में बँट गया है… यदि बाबा पर मैं कुछ लिख देता तो कितनी गालियाँ सुननी पड़तीं, कि खुद रामदेव भी शर्मा जाते । धनदौलत के अलावा यही सम्मोहित चेले-चपाटे तो उनकी पूँजी हैं, जिन्हें मिथ्या मान कर वह कभी भी त्याग सकते हैं । जान रहेगी तो हिन्दुस्तान में चेलों की कमी थोड़े ही है… बताइये भला सबकुछ सेट था.. आगे पढ़िये
एक पोस्ट , अनमनी सी
Feb 28th
मेरा एक प्रिय गीत हुआ करता है, " दिल ढूँढ़ता है फिर कभी फ़ुरसत के रात दिन चार पल " आज वह दो चार पल हासिल भी हुये तो सोचा कुछ ब्लागियाया जाय । बहुत से विषय और संदर्भ मन में घुमड़ रहे हैं, यह ‘ ये डाक्टर…’ श्रृंखला भी अधूरी सी छूटी जा रही है । चलो आज फ़ाइनल हो जाय ।
आपको यह जान कर ताज्जुब होगा कि मेरा यह सड़िल्ला ‘ कुछ तो है…. ‘ चोरी हो गया है । मैं तो अब तक एक-एक टिप्पणी किसी तरह सहेजता रहा और यहाँ किसी भाई ने पूरी की पूरी ब्लगिया ही बटोर कर अपनी ज़ेब के हवाले कर लिया । जी हाँ , मेरा स्वामित्व बोले तो मालिकाना हक़ किसी कद्रदान ने हड़प लिया यानि Administrative Rights छिन… आगे पढ़िये



