कभी कभी मेरे दिल में…
सेवा में श्री सतीश पँचम, द्वारा blog-post_24.html, सफ़ेदघर, मुम्बई
May 27th
दो दिन पहले भाई सतीश पँचम जी का आलेख पढ़ा, वास्तव में कमज़ोर हूँ या समझिये अपनी मानवीय कमज़ोरियों के चलते मॉडरेशन की तलवार देख अक्सरहाँ आगे बढ़ लेता हूँ.. ऎसे विषयों पर जहाँ सँवाद-परिसँवादों का त्वरित आदान प्रदान सँभव न हो, मन उदिघ्न हो जाता है । उनके आलेख की सच्चाई से सहमत होते हुये भी कुछ न कह पाने की मन में मलिनता व्याप्त थी । अस्तु प्रेषित है यह बिलम्बित टिप्पणी…. सच है, स्टीफन हॉकिंग के विचारों को उनके वैज्ञानिक भ्रम का अपरिपक्व दर्शन कहा जा सकता है । अपनी शारीरिक हालत को विज्ञान की वैसाखियों पर टिका कर वह अपने अँदर के डर को मार रहे हैं । ईश्वर के अस्तित्व को ललकारना उनके कुँठा के आवेग को दर्शाता है.. यदि हालत… आगे पढ़िये
गुमशुदा मेलों की तलाश में
Mar 23rd
ऎसा नहीं है कि, मुर्गा बाँग न दे तो सवेरा ही न हो ! होगा, अवश्य होगा और होता ही रहा है । तो फिर, दिन को मुर्गे की बाँग से जोड़ने का सबब ? मनुष्य को अपनी जागृतावधि तय करने लिये शायद एक डिमार्केशन लाइन की ज़रूरत महसूस हुई होगी, इस प्रारँभ-बिन्दु पर उसने मुर्गे के उद्घोष को पकड़ लिया । भले ही अब तक सभ्यतायें उसे हलाल करती आयी हैं, पर मुर्गा अपने मार्ग से कभी न हटा । जैसे उसने इसे अपने कर्तव्य से ही जोड़ लिया हो, इससे बेपरवाह कि नाशुक्रगुज़ार कौमें उसकी बलि को पचा कर भूल भी सकती है, वह इन कौमों को जगाने का काम बेखौफ़ करता आया ।
पता नहीं क्यों ?
Jul 21st
लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ… पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, ” पता नहीं क्यों ? “ यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?
कभी कभी मेरे दिल में..
Apr 29th
…. यह ख़्याल आता है कि, ब्लागिंग में मुआ ब्लागर आख़िर करता क्या है … क्या केवल यही तो नहीं, कि " रमैया तोर दुल्हिन लूटै बजार " ? शायद ऎसा नहीं ही होगा.. काहे कि सदियन पाछै कबीरौ पलटि के ठोकिं गये रहें,
" हम तुम तुम हम और न कोई । तुमहि पुरुष हम ही तोर जोई ॥ " ब्लागर के जोई का कोई सगा सम्बन्धी क्यों न हो ? सो, ब्लागस्पाट की मेहरारू और पाठकों की भौजाई बने बिना ब्लागिंग करना दिनों दिन जैसे दुष्कर होता जा रहा है.. ( छिमा करो, माता ! ) … आगे पढ़िये
हे पार्थ ! दो कप चाय पर.. लिखता रह तू ब्लाग
Apr 18th
पिछले शनिवार को कुछ.. और इस शनिवार को इनपर इतने लहालोट हुये जा रहे हो.. तुम भी उमा भारती हो क्या .. ? या फिर इनसे कोई सौदा सेट हो गया है ? भईया, ई पंडितइनिया हमका जिये न देई.. लेयो टोंकि दिहिन ! भगवान इनका मुँह चीरते समय कुछ ज़्यादा ही उदार हो गया होगा ?वईसे दखीए त बतिया सधरणै है, लेकीन पंडिताइन दुल्हिन के ई बात हमयै हिरदै पर सोझे धक्क से लग गेया , एतना बड़ा ज़ुलुम सोच … ?
हमको भी यह 16 मई के बाद वालों की बिरादरी का समझती हैं काऽ.. हौ ? आजकल ई राजनीतिए पढ़ती हैं.. अटकलें बेलती हैं, सकल जग राजनीति फटि पड़ रही है, यहू का करें.. विकल्प होय तो बताओ… आगे पढ़िये
घी के लड्डू, टेढ़े ही सही …
Nov 23rd
आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये, XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े आगे पढ़िये
बिग बी अपने कबीले के हैं…. क्या सच्ची में ?
Nov 4th
डिसक्लेमर: बड़े मूड से एक पोस्ट लिखने का मन बनाकर आया था, चंद घंटे पहले ही आज की चिट्ठाचर्चा पर एक लम्बा कमेन्ट ठोक कर आया था । सहसा मन उचट गया,सो मन हुआ कि थोड़ी मस्ती की जाय, पर बिना पुख़्ता किये कुछ भी पोस्ट करने में झिझक होती है, पता नहीं कौन लण्ठ भड़क जाय, या पोस्ट का ही संदर्भ सहित व्याख्या करनी पड़ जाये.. सो अपनी आज की टिप्पणी ही उठा कर यहाँ नकल-चिप्पी तकनीक से जड़ डाला । जो पढ़े उसका भला, और जो न पढ़े उसका कभी न सोचो भला !



