डॉ. अमर कुमार
इस ब्लॉग के टाइमखोटीकार...डॉ. अमर कुमार, जन्म मिथिला में, बचपन वैशाली में, प्रारँभिक शिक्षा कोसी क्षेत्र से, माध्यमिक शिक्षा एवँ जीवन से मुठभेड़ का प्रारँभ बैसवारा ( रायबरेली ) से, चिकित्सा स्नातक कानपुर मेडिकल कॉलेज़, सँप्रति निज चिकित्सा व्यवसाय व शौकिया लेखन रायबरेली में ही ! अभिरुचि : लालित्य से रिश्ता रखने वाले हर क्षेत्र में टाँग अड़ाना, अतार्किक परपँराओं को तोड़ना, हर प्रकार का पठन ( भाषा का बँधन नहीं ) आम मान्यताओं के अनुसार खिसकेला कोटि का ब्लॉगर ( 'चलने दीजिये.. क्या कीजियेगा' जैसे लोगों के हिसाब से यदि गलत को गलत कहना गलत है, तो.... )
Posts by डॉ. अमर कुमार
बाबा.. बाबा…बाबा.. अरे अब बस भी करो, बाबा !
Jun 19th
सोचा था कि योगागुरु रामदेव यादव पर कुछ न लिखूँगा… चहुँ ओर बाबा का शोर, उफ़ ! तथाकथित बाबा को लेकर पूरे ब्लॉगजगत सहित, हमारा प्रगतिशील जुगाली समाज दो घड़ों में बँट गया है… यदि बाबा पर मैं कुछ लिख देता तो कितनी गालियाँ सुननी पड़तीं, कि खुद रामदेव भी शर्मा जाते । धनदौलत के अलावा यही सम्मोहित चेले-चपाटे तो उनकी पूँजी हैं, जिन्हें मिथ्या मान कर वह कभी भी त्याग सकते हैं । जान रहेगी तो हिन्दुस्तान में चेलों की कमी थोड़े ही है… बताइये भला सबकुछ सेट था.. आगे पढ़िये
पीरन के पीर…. भये जुलहे कबीर
Jun 15th
जनवरी-फरवरी 2008 से ड्राफ्टिया मोड में पड़े इस आलेख का आज अहिल्या-उद्धार हो रहा है.. शीर्षक था पीरन के पीर भये जुलहे कबीर ! पोस्टो के तत्कालीन रुझान को देखते हुये कबीर साहब नेपथ्य में हो लिये । क्योंकि तब मुझसे टिप्पणियों में पूछा जाने लगा था कि आप काहे डॉक्टर हैं । मन में पलता अपराधबोध आज शमित होने को है, दर्ज़ा सात में पाठ्यपुस्तक में कबीर को पढ़ा और वह मन को भा गये… वाह, क्या बेबाकी का ग्लैमर था… काँकर पाथर जोड़ि के मसजिद लियो बनाय… पाथर पूजैं हरि मिलैं ता मैं पूजूँ पहाड़ । तब तक किसी को इस तरह डपटते न सुना, न देखा, न पढ़ा था । दुबारा वह हाई स्कूल के कोर्स में अवतरित हुये… फिर क्या था मैं… आगे पढ़िये
एक अस्वीकृत रचना
Jun 12th
रोहित ने लिफाफा ला कर दिया । क्या है कहते-कहते मैं खोल कर देखता हूं । एक साथ नत्थी चार पन्ने हैं, सबसे उपर वाले पन्ने पर उपर लिखा हुआ है – अस्वीकृत रचना… उसके इर्द गिर्द बटा, घन के गणितीय निशान सहित कुछेक अंक बिखरे पड़े हैं । नीचे महीन हस्तलिपि में लिखा हुआ है अस्वी./वापस … एक स्लिप भी लगी हुई है, महोदय हमें खेद है कि हम आपकी कहानी न छाप सकेंगे । विशेषाँक के लिये कथानक में वासँतिक ग्लैमर वाँछित है । कृपया भविष्य में भी हमें इसी प्रकार अनुगृहीत करते रहें… भवदीय इत्यादि इत्यादि उस स्लिप पर एक लाइन से कहानी/लेख/संस्मरण/वृत्तांत/कविता/रूबाइयां/निबन्ध/लघुकथा/ अन्य ललित इत्यादि सजे हुए थे जिसमें… आगे पढ़िये
सेवा में श्री सतीश पँचम, द्वारा blog-post_24.html, सफ़ेदघर, मुम्बई
May 27th
दो दिन पहले भाई सतीश पँचम जी का आलेख पढ़ा, वास्तव में कमज़ोर हूँ या समझिये अपनी मानवीय कमज़ोरियों के चलते मॉडरेशन की तलवार देख अक्सरहाँ आगे बढ़ लेता हूँ.. ऎसे विषयों पर जहाँ सँवाद-परिसँवादों का त्वरित आदान प्रदान सँभव न हो, मन उदिघ्न हो जाता है । उनके आलेख की सच्चाई से सहमत होते हुये भी कुछ न कह पाने की मन में मलिनता व्याप्त थी । अस्तु प्रेषित है यह बिलम्बित टिप्पणी…. सच है, स्टीफन हॉकिंग के विचारों को उनके वैज्ञानिक भ्रम का अपरिपक्व दर्शन कहा जा सकता है । अपनी शारीरिक हालत को विज्ञान की वैसाखियों पर टिका कर वह अपने अँदर के डर को मार रहे हैं । ईश्वर के अस्तित्व को ललकारना उनके कुँठा के आवेग को दर्शाता है.. यदि हालत… आगे पढ़िये
अलविदा दोस्तों !
May 16th
आज लिखने को मत कहना …. होश उड़े हुये हैं, आँखें थकी हुई हैं, दिलबुझा पड़ा है…. जायें तो जायें कहाँ । बड़ा अच्छा रि्टर्न – गिफ़्ट दिया है…शातिर तूने । हमने तुमको जिताया , बदले में तुमने हमको मूताया । तुम्हें ममता की छाँव दिलायी.. तो तुमने पीछे से जूता टिकाया । गज़्ज़ब है, भाई गज़्ज़ब है !
इसी हफ़्ते भारतीय मुग़ालता आयोग ( पढ़ें योजना आयोग ) की रिपोर्ट पढ़ के सकते में था… कि, उन्होंनें सीधा आँकड़ा बैठा दिया कि यदि कोई भारतीय अपने दैनिक ज़रूरतों के क्रय विक्रय में रु. 589 प्रतिमाह, तक… आगे पढ़िये
© चुनरी में दाग…./ नया सँशोधित सँस्करण 2011
May 10th
खबर है, एक जिम्मेदार पुलिसतंत्र के ठीक नाक के नीचे एक गैरजिम्मेदार डाक्टर पूरी जिम्मेदारी से अनैतिक अंग प्रत्यारोपण का धंधा चला रहा था । भला कैसे भाई ? हमारी पुलिस तो इतनी सतर्क है कि वह चोरी – डकैती की योजना बनाते समय ही लोगों को गिरफ़्तार कर लेती है । अख़बार नहीं पढ़ते, आप ? कम से कम समाचारपत्रों में तो यही पढ़ने को मिलता है, ‘ तीन जुआरी रंगेहाथ जुआ खेलते पकड़े गये… गैरलाइसेंसी असलहे के साथ युवक बंदी.. चोरी की योजना बनाते हुये दो नक़बजन पुलिस ग़िरफ़्त में.. ! ’ अब एक महानगर की इतनी मुस्तैद पुलिस प्रशासन के एक पॉश हलके में डाक्टर साहब इतने टीमझाम के साथ कोई पाकेटमारी तो कर नहीं रहे थे ! बाकायदा तीन-चार अदद गुर्दे एक मानव आगे पढ़िये
प्रार्थनाओं के पँख पर सवार
May 1st
अरविन्द जी के विविधभारती ्पर बज रहा है…शर्म आती है मगर आज यह कहना होगा ! सो हम भी कहिये दे रहे रॅहे हैं । यह खुशदीप का मक्खन नहीं, मेरा ज़ेनुईन कैरेक्टर है.. कविरत्न भूलेलाल ’भुलक्क’ बड़ी मन्नतों के बाद मुद्दतों में एक कवि-सम्मेलन में न्योता मिला । समय कम था, फ़्लाईट से जाने का भौकाल ही कुछ और… बैठ लिये.. बोर्ड कर लिये भाई । जेब-वेब चेक किया टिकट-ऊकट है कि नहीं.. सब सलामत अपनी जगह पर मौज़ूद, इतमिनान की साँस लेकर पसर कर बैठ गये । प्रातः बेला थी, ईश्वर की असीम अनुकम्पा है, मुद्दतों बाद एक बुकिंग मिली है.. मगन होकर श्रीरामच्न्द्र कृपालु भज मन.. गुनगुनाने लगे । एकदम से जियरा धक्क… हाय रे हनुमान-चालीसा तो रखा नहीं.. क्या आगे पढ़िये



