सर जी, फोटो अच्छी आयी है ?
सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? मेरा सिर मरीज पर झुका हुआ है, मैं हाथ उठा कर रुकने का इशारा करता हूँ । फिर दोहराया जाता है, ” सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? ” यह आलोक हैं.. आलोक त्रिपाठी ! सामने आलोक जी खड़े हैं, मेरे सामने अपने नये मोबाइल सेट का स्क्रीन लहराते हुये.. उसमें है मेरी तस्वीर ! नोकिया 6500 या ऎसा ही कुछ.. शोरूम में अकेले जाने से घबड़ा रहे थे । आलोक.. मेरा Liaison Representative को आप लोग क्या कहवे करें हैं, मैं नहीं जानता.. मैं तो इन्हें गडबड़झाला प्रतिनिधि कहता हूँ, क्लिनिक और लैब का मल्टीपरपॅस पुर्जा ! और किसी कि हिम्मत न होती, पर यह पितृहीन बालक मेरे स्नेह और सानिध्य में कुछ अधिक लड़ैता हो गया है..” सर जी, देखिये फोटो ठीक आयी है ? पहली फोटो आपकी ही खींची है । कल शाम यह मोबाइल मैंने ही पसँद किया था.. मॉडल नहीं-किया 6300 ( अँग्रेज़ी नेम नोकिया 6300 या ऎसा ही कुछ…यह आप नोकिया इँडिया से जानें ) और यह मोबाइल इनको कल शाम ही दिलायी है !
मेरे चैम्बर में जब मैं मरीज़ में मशगूल होता हूँ, मुझे कोई दखलअँदाज़ी पसँद ( बल्कि बर्दाश्त ) नहीं है.. यहाँ पर पँडिताइन का भी दखल नहीं चलता । मैंनें देखा मुँह बाये हुये श्रीमान सामने खड़े हैं, पहली फोटो मेरी लेकर मुझे कृतार्थ करने की शाबासी दक्षिणा चाह रहे हैं, पँडित जी ! मुझे तिलमिलाहट तो ऎसी हो रही थी कि वह दक्षिणा पाकर गाल सहलाते हुये घर जायें, पर मैं सँभल गया ।
अधीनस्थ कर्मचारी या कनिष्ठों को सार्वजनिक रूप से डाँटना मेरी सोच के अनुसार अनुचित है ( बशर्ते कि वह मुझे इसके लिये बाध्य ही न कर रहा हो ), लिहाज़ा चुप रह जाना पड़ा । यह आपसी विश्वास को कमजोर करती है, साथ ही यह मरीज़ या दर्शक को आपके धूमिल अनुशासन का सँदेश देती है ।
किन्तु उसके उत्साह का पारावार न था,” सर जी इसे आप अपने इन्टरनेट पर लगा दीजियेगा,” वह पुनः अपना मोबाइल मेरे चेहरे पर चमकाने लगा । ’बड़ा बेहूदा लड़का है, यह तो…’ यह भुनभुनाते हुये मैं मोबाइल उसके हाथ से झपट लिया । मेरी आग्नेय दृष्टि ने समझिये कि मामला फौरी तौर पर रफ़ा-दफ़ा कर दिया ।
फोटोग्राफ़ी के मेरे शौक ने स्वयँ मुझे मॉडल बनने के अवसरों से वँचित ही रखा, गोया मैं कैमरे के पीछे मौज़ूद हुआ करता था । मन में उतावलापन जागा, देखें जरा… कैसी फोटो आयी है… पिछले एक वर्ष में शायद यह पहली फोटो हो । हा तात, फोटो तो अच्छी आयी थी, एकदम नेचुरल.. न बनाव-सिंगार, न पोज़-एँगल, रोज के पहनने के कपड़े… ( क्लिनिक में यह कपड़े ? इस विषय पर अब अपना गीत क्या गाऊँ, कभी बता दूँगा ) मन थोड़ा शान्त हुआ,” सही है यार ! कभी इसे किसी पोस्ट में सटा / लगा दूँगा ।
जैसा होता आया है, भले लोगों के कार्य निर्विघ्न कहाँ हो पाते हैं ? मेरा ही निट्ठल्ला चरित्र कोंचने लगा,” देयो देयो.. एक हफ़्ते में ही ’कुछ तो’ को दूसरी पोस्ट दे रहे हो, और उधर ? अब तुम सफ़ेदपोशी पर शान्ति-सँदेश ठेलोगे, सादगी पर अगर हाथ आ गयी तो उधार की कोई कविता-उविता भी ज़रूर पेलोगे, कनिष्ठों के सम्मान पर कुछ शब्द वमन करोगे और अनुशासन को शत-शत नमन करोगे… करो, करो !
मैं सन्न रह गया, ’हाय राम, यह निट्ठल्ला ब्लॉगरों के यह आम ढोंग कैसे जानता है, ज़रूर रातों में छुप छुप कर ब्लॉग-श्लॉग पढ़ने लग पड़ा होगा । मैंनें झिड़क दिया, ” चुप बे, मैं, इस आलेख को इस प्रकार से फोटो लिये जाने के पहले अनुमति लिये जाने के सामान्य शिष्टाचार की ओर ले जाने वाला हूं ।” निठ्ठल्ला चहक उठा, दिखा दिया न सफेदपोशों वाला पैतरा…. बात बदलने में गिरगिट, मुझको मायने मतलब न समझाओ । यह कहो कि ब्लॉगर पर ज्ञान की गँगा बहाने निकले हो.. ( चिढ़ाने के अँदाज़ में ), डाल लो बेटा, अपने डॉटाबेस में तुम भी ज्ञान का कुछ प्रकाश डाल ही लो !
सच में बड़ा ज़ाहिल है, सो मैं ढ़ीला पड़ता हूं, वरना यह तो श्मशान तक पीछा करते हुए लड़ने वाला जीव है । अतः कुछ आजिजी से बोला, “जानते नहीं कि मोबाइल कैमरे का सबसे अधिक दुरूपयोग भारत और फिलीपीन्स में होता है ?” हे राम, बड़ा कलही है, मेरा यह चरित्र… इसे बस कोई बहाना चाहिये… सो ऐंठ कर कहता है, “फिलीपीन्स तक भागे चले जा रहे हो यहां अपने अधोभाग में अवस्थित तोंद पर निगाह नहीं जा रही है डाक्टर साहब ।” यदि आपने यह कहावत सुनी है….. जाट रे जाट तेरे सिर पर खाट, तेली रे तेली तेरे सिर पर कोल्हू…. तो आपको अटपटा नहीं लगेगा क्योंकि, यह वही मसल हुई ! बात कहां से उठायी और इसने आख़िर में लाकर मेरी तोंद पर पटक दी, अब विश्वास हो गया, ज़रूर यह रातों में छुप छुप कर ब्लॉग-श्लॉग पढ़ने लग पड़ा होगा । उसने जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली, ” यह भी ब्लागिंग की देन है बेटा, कुर्सी तोड़ो और तोंद बटोरो।
चुप, असाहित्यिक एलिमेन्ट ! साहित्य रचने में यह स्वतः आ जाता है । यह है तभी आपकी पूछ है, फुरसतिया को देख, समीर भाई, गुरू ज्ञानदत्त जी, सतीश सक्सेना, भाई अरविन्द मिसिर जी, पँडित दिनेश राय द्विवेदी ( एन्टीसिपेटरी सॉरी सर ! ) अपने कुश को देख, और तो और स्वयं भाई शिव कुमार मिश्र जी भी तोंदग्रसित हैं (, डा. अनुराग का नहीं जानता वह क्योंकि वह अभी तक अपनी शादी के ग्रुप फोटो की कटिंग से ही अब तक काम चला रहे हैं । )
पूरा कटहा है क्या….. कटकटा कर बोला तो इसे कम करो, इस तोंद जनित वायु विकार की वजह से ही ब्लागिंग में इतनी अस्वस्थता फैल रही है । ( देखा न, आखिर इसने मुझे मूल विषय से भटका ही दिया ) इधर जनाबे अली अपनी रौ में चालू थे, इसी तोंद की वजह से तुम्हारी हिन्दी ब्लागिंग अलसाई रहती है, अगर रोज थके मांदे दस लाइन की पोस्ट ठेल भी दिया तो कौन सा एहसान कर दिया ? तुम अपने को रहस्यवादी, छायावादी इत्यादि कहला कर इतराते हो, कारण कि तुम स्वयँ ही अपनी तोंद कुरते में छिपाते हो । तुम ही लोग ब्लागिंग में संकीर्णता लाते हो, पेट जितना बड़ा, दिमान उतना ही छोटा होता जाता है । अब मुझे मजा आने लगा तोंद का रूपक तो मजेदार है । बोल ले बेटा मैं पोस्ट में आज इसी को चेप दूंगा । दिमाग की सोचने की जहमत न करनी पड़ेगी । यह सोचता हुआ मैं हंस पड़ा । उसने पुनः मुझे पढ़ लिया, ” देखा.. पोस्ट लिखने के नाम पर अपना दिमाग खर्च न होने की सँभावना से कितने खुश हो रहे हो । अरे.. दिमागीन खाया कर, न मिले तो दूसरे का दिमाग चाटा कर, दिमागी करत न सही पर दिमाग तो खुला रख, स्वच्छ हवा आने दे । तेरे तोंद का वायु विकार, वैचारिक विकार बन कर ब्लागिंग को गठिया ग्रस्त कर रही है !
मैंनें मौज ले ली, आँख मार कर बोला जो आज्ञा मेरे टनकू पिया ! वह बिफर गया । आँय बाँय शाँय बकने लगा कि अपनी उपरोक्त फोटो दिखाने के बहाने मैं अपनी तोंद का आतंक फैलाना चाहता हूं, भूल जाऊँ अपनी तोंद की अकड़ । इसमें आकार है तो क्या, ताकत नहीं है । हमने उससे पीछा छुड़ाया, अच्छा श्रीमन.. आपकी ब्लागिंग में तोंद पर शोध से मैं प्रसन्न हुआ । इसे तत्काल हटाता हूँ, इन्टरनेट से हटा तो नहीं सकता.. टिवटर पर तो यह समायेगा नहीं । ब्लागर की तोंद का मामला है, कब टूल पकड़ ले, कोई भरोसा नहीं सो फेसबुक पर इसका एक प्रोफाइल बना लेता हूं । तोंद श्री वहीं उलझे रहेंगे, और एक नया प्रयोगवाद रहेगा । देखा आपने, निट्ठल्ले ( निट्ठल्लों ) की करतूत… खामख्वाह के तोंद जनित झमेले में मूल विषय फोटो के लिए अनुमति से आलेख भटक गया। रात गयी बात गयी ।
अब लीजिये, शरदपवार भये अमर कुमार : यहाँ कुछ यही बानगी है, आज मैंने स्वयं से अनुमति लेकर, अपने वेवकैम से अपना ही फोटो अपने हाथों खींचा है । जिसमें कुछ कलाकारी करने का असफल प्रयास भी शामिल है । अस्थायी रूप से मेरा थोबड़ा बिगड़ गया तो क्या, मैं गर्व से यह तो पूछ ही सकता हूं । सर जी, फोटो ठीक आयी है ?
| प्रिंट करें | आलेख टैमखोटीकार डॉ. अमर कुमार को April 7, 2011 समय 10:42 pm, वर्गीकरण बेतक़ल्लुफ़. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |




about 10 months ago
फोटो बेहतरीन आई है…और हमारी दुआयें हैं ..बरसों बेहतरीन आती रहेगी…बाकी के एडजस्टमेन्ट तो होते रहेंगे…फोटोशॉप है ना!!
about 10 months ago
फोटोशॉप नहीं है, दादा… बड़ा मँहगा है, इस बार लेते आना… मैं पाइरेटेड वर्ज़न इस्तेमाल करने से बचता हूँ ।
आभार आपका !
about 10 months ago
फोटू अच्छी वाली ही है। तोंद से तो जन्म का साथ है। अपुन का छह माह का फोटू भी ऐसा ही है। चौथी क्लास में परेड में हमको रोड रोलर कहा जाता था। तब से रोड़ ही कूट रहे हैं। आजकल दिन में अदालत परिसर के रोड़ कूटते हैं, रात को की बोर्ड की कुंजियाँ। वेबकेम से चार पाँच प्रयास के बाद फोटू अच्छा आने लगता है। कभी अपुन का दिखाते हैं।
about 10 months ago
देखने में तो ऎसे नहीं लगते.. अलबत्ता आपका भोजन प्रेम
जगज़ाहिर है !
about 10 months ago
शुभ्र वस्त्रों में गजब फोटो आई है । सर श्रद्धा से नतमस्तक हुआ जाता है । मेरा आभार कहियेगा उस महान फोटोग्राफर को , जिसने इस दीदार का मौका उपलब्ध कराया।
about 10 months ago
नतमस्तक होने से बचा करो.. सरवाइकल स्पॉन्डिलाइटिस का ख़तरा बढ़ जायेगा !
about 10 months ago
ये भाई !

मेरे तोंद नहीं है ,…..
और जो थोड़ी बहुत ब्लागिंग की कृपा से है उसे अगले १० दिन में घटाने जा रहा हूँ ! इन बड़े लोगों में मुझ गरीब को क्यों शामिल कर लिया …मैं तो आपको बड़ा भाई कहता हूँ
पहले समझा, कुछ तारीफ़ वारीफ़ करने के लिए नाम लिखा है फिर अगली लाइन में ही यह तोंद
सुबह सुबह सारा मज़ा ख़राब कर दिया , अभी भी पद्मासन पर बैठा ब्लोगिंग कर रहा हूँ ! सारी पर्सनालिटी का कचरा कर दिया…
हमसे भला कौन गलती हो गयी ! कुछ एडिट करो न बड़े भाई ! :-))
….जारी
about 10 months ago
@ अब लीजिये, शरदपवार भये अमर कुमार….
लाख लाख शुक्र है …अब आप स्वस्थ हैं और नियमित कार्य में व्यस्त हो गए हैं ! ईश्वर आप जैसा जीवट हम सबको दे …आप उदाहरण हैं हम सबके लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए ! दुश्वारियों में भी मस्त जीवन जीना, कैंसर जैसी भयानक बीमारी का दारुण कष्ट भुला, औरों को हँसाना ….यह केवल आप कर सकते हो ! ईश्वर आपको शतायु करे …
प्रणाम बड़े भाई !
about 10 months ago
सर जी ,
एक गुस्ताखी की है आपसे बिना पूंछे आपकी फोटो चोरी करने की …आजकल आपसे बिना पूंछे ही काम करने का मन करता है इस पोस्ट के हीरो की तरह
http://satish-saxena.blogspot.com/2011/04/blog-post_08.html
about 10 months ago
मेरा बेटा सात खून माफ़ की DVD लाया है, साथ देखने की जिद कर रहा है.. वह देख लूँ फिर सोचूँगा कि आपकी गुस्ताख़ी का क्या किया जाये !
about 10 months ago
गुरुवर
पोस्ट पढ़ ली…….महसूस हुआ दो एक दफे और पढना परीगा…..कोई लोचा नई……बस आनंद की बात है…..थोरा बचालिया है……बाद के
लिए……..
फोटू के बारे आपने बता रखा है…..बर्ना पवार समझने की भूल होती ही…
जन्म मिथिला में……ये पढ़ कर……मन किलक गया…….आप जल्दी मानेंगे थोरे ही……..बट अपुन लगे रहेंगे मानाने में………..
पाई लागूं.
about 10 months ago
हमर जनम के ठाम खाँटी लक्ष्मीसागर रेलवे कॉलोनी, दरभँगा भेलई, झा जी….. आऽ हमर पुश्तैनी गाम रीगा टीशन के उत्तर उफ़रौलिया जिल्ला सीतामढ़ी भेलई, से जानब !
about 10 months ago
बालक के अपन गाम-ठाम के जानकारी देलियैक – गुरुवर. बच्चा किलकित-पुलकित-च-प्रमुदित भेल……
अपनेक स्वास्थ्य के हेतु ईश्वर स मंगल कामना करैत छी…..
हार्दिक प्रणाम.
about 10 months ago
बहुत cute है, पोस्ट भी और … :]
शुभ-कामनाएँ आपके अच्छे स्वाथ्य और जीवन के लिए|
about 10 months ago
और … मैं ?

about 10 months ago
फोटुआ तो बड़ी गजब आयी है. जय हो आपके तोंदनामा की

about 10 months ago
अब तुम हिन्दी ब्लॉगिंग में तोंद का महत्व पर एक थीसिस लिख डालो !
about 10 months ago
हा हा हा ! ये सही कहा आपने. और शीर्षक होगा, “डॉ. अमर कुमार की तोंद के माध्यम से हिन्दी ब्लॉगिंग में तोंद के महत्त्व का अवलोकन”

about 10 months ago
तोंद बोलेतो छोटा दिमाग

about 10 months ago
कोई शक ?
about 10 months ago
कैसे नादां है वो, गम से अनजान है जो,
रंज ना होता अगर, क्या खुशी की थी कदर,
दर्द खुद ही मसीहा दोस्तों,
दर्द से भी दवा का दोस्तों काम लिया जाता है,
आ बता दें के तुझे कैसे जिया जाता है…
डॉ अमर कुमार- इस कुमार का अमरत्व कालजयी है…
long live Doctor Sahib…
(आज सबसे पहला काम आपके ब्लाग को अपनी ब्लाग लिस्ट से जोड़ने का किया है )
जय हिंद…
about 10 months ago
तू तो पागल है… मेरे गीत गाया करता है आज तक मेरा ब्लॉग-एड्रेस तक नहीं पता ! खुश रह…>
about 10 months ago
its good to see you blogging , your comments have been there but some how for me this is your first post after a long time
hope you have a happy life
regds
about 10 months ago
Thanks Rachna, I thought you were angry with me. It is pleasant to see you active, albeit I could not comment there due to my reservations. Regards !
about 10 months ago
डॉ अमर
i had sent my good wishes thru kush and i think he told be that he conveyed the same to you
I really dont know why you think i am angry with you . I blog , i comment and i refute comments but beyond that i am neither a enemy or friend of blogger
yet i believe in human relationships which are beyond my bloging
and i dont blog to get comments either
about 10 months ago
Yes Kush told me so.. I withdraw if I offended in anyway !
about 10 months ago
आंसूं ही बस अपने होते हैं
इसीलिये तो लोग अकेले मे रोते हैं
about 10 months ago
वाह! बहुत खूब!
about 10 months ago
बहुत खूब!

अब जल्दी से चकाचक हो जाया जाये। शुभकामनायें।
about 10 months ago
गुड पोस्ट सर जी ….आज भी आप के लिखे हुए पोस्टो को पढ़कर दिल खुश हो जाता है और आपसे माफ़ी की गुज़ारिश करता हु की मैंने आपसे बोला था की दीदी के लिए सामान लेकर मुंबई जाऊँगा लेकिन कुछ कारन वश मुझे डायरेक्ट मुंबई नहीं जाना हुआ सो अपने चेले को माफ़ करे जैसे आपने आलोक त्रिपाठी को माफ़ किया….ओर आपको सूचित करता हु की आपकी दुआओं और ज्ञान के कारन आज मैं अरब जैसे देश में नौकरी कर रहा हु…..
about 10 months ago
قیف یار، تُم اِتنے دُور رہ کر کر بھی مُجھے یاد رکھتے ہو، یہی میری نِیامت ہے ۔ تُمنے میہنت کی اِس مُکام پر پہُںچے دیکھ کر کھُشی ہوتی ہے۔۔ اَپنا خ یال رکھنا، تُمّیں ایک نیک اِںسان کی ساری کھُوبِیاں ہیں
about 10 months ago
डॉ साहब , कुर्ते का राज़ तो यहीं समझ आ रहा है । बढे हुए वेट और पेट को छुपाने का अच्छा तरीका है ।
विपरीत परिस्थितियों में भी मनोबल बनाये रखना एक साहसिक कार्य है । डॉ अमर कुमार बेशक आप एक जीवट व्यक्ति हैं। दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य के लिए हार्दिक शुभकामनायें ।
about 10 months ago
नही डॉ. दराल,
इसकी कहानी मेरे सनक से जुड़ी है… आसनसोल में एक प्रख्यात सर्ज़न मिले डॉक्टर मज़ूमदार.. पर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही जम मैंनें उन्हें रोजमर्रा के बँगाली पोशाक में अपना OPD चलाते देखा.. यहाँ तक कि गर्मियों में वह फतुही ( आधे बाँह की बँडी ) तक पहनते थे ।
दूसरा वाकया तब हुआ जब में तीन हफ़्ते के लिये पर्यटन हेतु दक्षिण भारत के दौरे पर था, मेरे बेटे को ऑस्टियोमाइलाइटिस इलियम हो गया, कोच्चि के पास कोई शहर था, नाम नहीं याद आ रहा.. डॉ. थॉमस का नाम सुना, उनके पास गया.. एक बिल्कुल साधारण आदमी जो कि आधी बाँह के बुश्शर्ट और सफ़ेद लुँगी में था.. बताया कि वही डॉ. थॉमस हैं, और पूरे तवज़्ज़ो के साथ बच्चे की देखभाल की । धन्यवाद ज्ञापन की रौ में मैंनें उनके कपड़े को लेकर अपने कन्फ़्यूज़न का जिक्र कर दिया… उन्होंने बिना बुरा माने हँस कर कहा कि, ” If what is in the name.. is true, so I ask people what is in the dress ? I feel more comfort in working with my traditional dress !” यह 1992 का किस्सा है.. तब से मैंनें बिना झिझक भारतीय पहनावा अपना लिया । अलबत्ता.. पैंट कमीज़ से भी कोई परहेज़ नहीं है… तोंद का इससे कुछ लेना देना नहीं !
about 10 months ago
चकाचक फोटू है जी. आज के जामने में तोंद का आतंक है डॉक्टर साब. और ये आतंक हर जगह फ़ैल रहा है. हम अपने तक फैलने के पहले ही टीका लगाने की कोशिश कर रहा हूँ

about 10 months ago
सर, सबसे पहले मेरी नमस्कार स्वीकार करें,
आपके ब्लॉग पर वाया सक्सेना जी आना हुआ. उनका धन्यवाद. हमेशा आपकी रंग बिरंगी टिप्पणिया ही पढ़ी थी आज पोस्ट भी पढ़ी. बहुत आनंद आया. आपकी टिप्पणियों की ही तरह आपके लेखन का अंदाज भी बड़ा बेफिक्र सा है. कभी सतीश पंचम जी ने एक टिपण्णी में आपकी बहुभाषी काबिलियत की प्रशंसा की थी. आज उसका एक प्रत्यक्ष उदहारण श्री कैफ खान को दिए आपके जवाब में भी दिख गया.
अंत में एक बात जरुर कहना चाहता हूँ की आपकी चुलबुली और रंग बिरंगी टिप्पणियां पढ़ कर कभी सोचा न था की आपका ब्लॉग इतना ब्लैक एंड व्हाइट होगा.
साहब ये ब्लॉग इतना ब्लैक एंड व्हाइट क्यों है ?
about 10 months ago
दुनिया ही ऎसी है !
about 10 months ago
सतीश सक्सेना जी को भी पढ़ा, फोटो लाजवाब.
about 10 months ago
नमस्कार अमरजी…सतीशजी की पोस्ट पढ़कर बिना टिप्पणी किए इधर चले आए … चिट्ठाचर्चा में आप सवाल पूछते पूछते रह गए… यहाँ हमारे सवाल का जवाब मिल गया…
बेटा भी ऐसे ही करता है…फेसबुक की वॉल पर उसने लिखा …..”The only hell you really suffer in this life is the one you create in your mind.”
लेकिन माँ का दिल जो है…उसका क्या…….. अपने बच्चे के हिस्से का सारा दर्द समेट लेना चाहती है…… जब नहीं होता तो कभी रो देती है तो कभी रोते रोते हँस पड़ती है …
आप जल्दी स्वस्थ हों..यही कामना करती हूँ…
about 10 months ago
तभी तो कहते हैं दिल तो बच्चा है, जी

about 10 months ago
थैंक्स सर जी, आपने उर्दू में लिखा बेहद ही साफ़ ओर बेहतरीन लहजे में लिखा…आप जैसे गुरुजनों का आशीर्वाद है की मैं कुछ बन सका वर्ना मेरी हस्ती की क्या थी..इसी तरह अपने आशीर्वाद को बनाये…फकत आपका निठल्ला चेला…कैफ

about 6 months ago
cvsyj
about 6 months ago
वकी वकी
about 6 months ago
अकेला चला था जानिबे मंजिल और कारवां बनता चला गया

ऐसी शख्सियत की हिम्मत को सलाम….. आप हमेशा हमारे दिलों में “अमर” रहेंगे …. अल्लाह आपको जन्नत दे
अमीन……
about 6 months ago
कोई दुनिया का यूँ जाता नहीं जैसे तुम गए….