ऎसा नहीं है कि, मुर्गा बाँग न दे तो सवेरा ही न हो ! होगा, अवश्य होगा और होता ही रहा है । तो फिर, दिन को मुर्गे की बाँग से जोड़ने का सबब ? मनुष्य को अपनी जागृतावधि तय करने लिये शायद एक डिमार्केशन लाइन की ज़रूरत महसूस हुई होगी, इस प्रारँभ-बिन्दु पर उसने मुर्गे के उद्घोष को पकड़ लिया । भले ही अब तक सभ्यतायें उसे हलाल करती आयी हैं, पर मुर्गा अपने मार्ग से कभी न हटा । जैसे उसने इसे अपने कर्तव्य से ही जोड़ लिया हो, इससे बेपरवाह कि नाशुक्रगुज़ार कौमें उसकी बलि को पचा कर भूल भी सकती है, वह इन कौमों को जगाने का काम बेखौफ़ करता आया ।

Bhagat-Singhजाती फगुनहट की इस सुबह बिस्तर में अलसाते हुये, मैं न जाने कौन सा दर्शन अविष्कृत कर रहा हूँ । शायद यह बीती रात देखा हुआ सपना न जाने दुःस्वप्न है कि मेरे मन में चल रहे परिदृश्य का सत्य ? पर कुछ तो था जो मुझे डिस्टर्ब किये जा रहा है । गुनगुनाती अलसाती सभ्यताओं का दर्शन शायद इसी सुविधाप्रद स्थितियों में पनपता हो, कुछ कह नहीं सकता । पर यह मुझे डिस्टर्ब किये जा रहा है । आज शायद सरदार भगत सिंह जी का कुछ है । क्या यह कहाँ याद रहता है, अख़बार आयेगा.. देख लिया जायेगा ।

पर भगवान जाने सच था कि सपना पर कुछ तो था । सुबह-सुबह भारत माता ने स्वाधीन भारत की एक चवन्नी पकड़ायी । मैने अचकचा कर कहा – यह क्या माते ? क्षीण स्वर में सकुचाते हुये बोलीं, ” जा मेरे लाल जा मेरे सपूत आज मेला घूम आना । इस शस्य श्यामला मातरम् के मिजाज की कोई चाह नहीं सो मैने भी प्रतिवाद न किया । माता को इतना उदास पर इतना हुल्सित कभी न देखा था, उनके अँतर में चल रहे मँथन को समझने का प्रयास करता हुआ, मैंने आज़ाद भारत की यह लोकताँत्रिक चवन्नी पकड़ तो ली पर यह पूछने से न चूका कि माता कौन सा मेला ? आज तो बहुत से मेले लगे होंगे होली मेला, नववर्ष आगमन मेला, किसान मेला, कार-लोन मेला, शिकयत निस्तारण मेला इत्यादि । वह एकदम से अनमनी हो गयी मुह फेर कर बोली बस बता दिया न बस…. मेला तो मेला.. जा देख कहीं हमारे वीर सपूतों को फूल-मालाओं से ढाँक रखा होगा, मेले की चहल पहल भी होगी वहाँ !
शाम तक टहलता फिरा.. सच्ची में मेले तो बहुतेरे थे लेकिन उन लक-दक मेलों में ऎसी चवन्नी ले जाकर मैं भला क्या करूँगा ? अब तो हमारे लोकतँत्र का यह पहला सिक्का, चवन्नी फेर दी जाती है, लोकताँत्रिक प्रतीकें तो अब देखने की चीज रह गयी है । सवर्ण-दलित समागम मेला.. जन्मभूमि-गोरक्षा मेला.. क्षत्रिय स्वाभिमान मेला और भी न जाने कहाँ कहाँ क्या चल रहा होगा ।
मुझे एक झुल्ल सवार हो गयी, माते के सठियायेपन पर… अगर हो भी तो क्या इन मेलों में गणताँत्रिक चवन्नी की कोई वक़त भी है ? माता भी ना.. बस जब देखो मुझे सँकट में डाल देती हैं । फिर भी अपनी बँद मुट्ठी में इसकी गर्मी को महसूस करके एक इतमिनान था कि इन मेलों में इस चवन्नी का कोई मोल तो होगा ही होगा । मन में सँशय भी उभरता कि वैसे सुनते तो यह है कि स्वाधीन भारत वाली इस चवन्नी का जमाना जाता रहा अब तो नयी चलन के पैसों का बोल बाला है । घर से चलते समय ही पंडिताइन ने टोक अलग लगा दी कि.. वैसे तो कहने की बात है कि यह सिक्का हमारा गौरव है, लेकिन जाओ खुद ही देख आओ कि, स्वाधीन भारत में खोखा पेटी की ही पूछ है । चल भई निठल्ले तुममे यह चवन्नी संजोने की औकात नहीं .. मेला कहां हेरता है? लौट आया।

माता जैसे थकान के मारे ऊँघ रही हो एक दम चिहुंक पड़ी अधीर होते हुये पूछा। देखाग, ” मेला देखा… खूब गहमा गहमी रही होगी न ? फिर जाने कहाँ खो गयीं, ” भला ऐसे मेले भी कोई भुला सकता है ?” मैं अपनी नालायकी पर जैसे शर्मिन्दा होता हुआ सा बोला माता आज भीड तो हर ओर थी वीक एण्ड की गहमा गहमी भी थी पर तुमने किस मेले के लिए कहा था न तो मुझे मिला और न किसी को पता था।
मां का चेहरा एक दम स्याह हो गया अंगली पर गिनती हुयी अस्फुट स्वर में बोली कि यह 72-82 वर्ष ही तो हुये होंगे इतना तो समय नहीं बीता कि लोग भूलने लगे। अच्छा एक काम करियो अगर वतन चाचा दिखें तो उनसे पूछ लेना उनको जरूर मालूम होगा। मां यह कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही है मैंने कौतुक से सिर उठाया। मन में चल रहा था कि क्या इनको किसी डाक्टर को दिखाने की आवश्यकता है। यह अर्नगल प्रलाप सामान्य तो नहीं हो सकता मैं सिर झुकाये मुड़ पड़ा वतन चाचा से पूछूंगा वह किसी ऐसे डाक्टर को जरूर जानते होंगे।

वह आगे वाली चौमुहानी के एक कोने खांसते खंखारते हुये बरामद हुये। उनको यह सही हालत में शायद की कभी दिखते हो। साठा तो पाठा होता हे यह इतने जर्जर क्यों दिख रहे है। यह सब सोचता हुआ उनकी ओर बढ़ा और उनको सारी बातें बताई। मन में संशय था कि इनकेा तो खुद ही डाक्टर की जरूरत है यह माता के लिये क्या बतायेंगे। लेकिन मेरे मुंह से यह शब्द सुन के अचानक वह चैतन्य हो गये। जवानों को भी मात कर देने वाली अंदाज में उठ कर हंसे। बोले कि तू परेशान मत हो तू जाके टी0 वी देख। आज वीकेण्ड पर अपनी बीबी से थोड़ा इश्क ही फरमा ले। उस बेचारी की उम्मीदों को लेकर तू कहां मेला वेला ढूंढ़ता फिर रहा है। मैं बकलोलो जैसा मुंह फाड़े उनकी ओर देखता रहा उन्होंने आगे बढ़ गर्मजोशी से मेरी पीठ पर एक धौल जमाया कि अरे कुछ सिरफिरे मेरी खातिर आज अपनी कुर्बानी दे गये थे वह उनको ही याद कर रही होंगी

उनकी गर्मजोशी में छिपे तँज़ को भांप मैं एकदम सर्द हो गया उनके धौल की धमक या अपने शर्मिन्दगी की सर्दी की वजह से मैं जैसे नींद से जागा । अरे, मैं तो वाकई सो रहा था, चलो इसी बहाने जाग तो गया..देखें आज क्या क्या करना है, घड़ी देखी 6.50 हो रहे थे, कोई सिरफिरा तेज तेज साइकिल चलाता हुआ गुनगुनाता हुआ जा रहा था
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगें हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।
मेरा निट्ठल्ला चरित्र कोंचता है, ” यह सच है, पर तुम चाहे जैसे भी सपने देखा करो.. परवाह किसे है ? मैं शर्म से गड़ा जाता हूँ कि शहर में शहर में विकास का अँधड़ इतना भी तेज नहीं, कि कि ऎसे सिरफिरे सपनों का तँबू ही उखड़ जाये ? ” निट्ठल्ले ने फिर कोंचा, ” तुम्हारी ड्यूटी उन्नति की राह पर लगी है, तू यहाँ खड़ा खड़ा क्या सोच रहा है ? अब तू बेफालतू की हसरतें अपने ही पास रखा कर, चल जा अपना रास्ता नाप !” अब मेरे अँदर का भला आदमी भड़क जाता है.. कैसी ड्यूटी बे..?
यह आये दिन को छेड़ अच्छी नहीं खंजरे कातिल !
बता कब फैसला उनके हमारे दरमियां होगा ।।
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेगें हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।
इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी अपना आसमां होगा ।।

जय शहीद- भगत सिंह अमर रहें- जय हिंद