बिना क्रम

*   लागा चुनरी में दाग 

अमरकिसको खबर हे अमर                                                          

इससे पहले कि अपने कुछ यक्षप्रश्न  ( बेहूदे सही ) उठाता , खुद अपना ही दामन दागदार दिखने लगा । हमारी बिरादरी में शामिल कहलाने वाले एक कोई अमित भाई ( डा० ? ) साहब  गुर्दा बोले तो किडनी प्रत्यारोपण के धंधे ( व्यवसाय ) में संलिप्त पाये गये । गैरकानूनी के लेबल पर चल रहा यह धंधा छोड़छाड़ भारत महान से भाग खड़े हुये । वाह, क्या बात है ?

एक जिम्मेदार पुलिसतंत्र के ठीक नाक के नीचे एक गैरजिम्मेदार डाक्टर पूरी जिम्मेदारी से अनैतिक अंग प्रत्यारोपण का धंधा चला रहा था । भला कैसे भाई ?                                                    हमारी पुलिस तो इतनी सतर्क है कि वह चोरी – डकैती की योजना बनाते समय ही लोगों को गिरफ़्तार कर लेती है । अख़बार नहीं पढ़ते, आप ? कम से कम समाचारपत्रों में तो यही पढ़ने को मिलता है, ‘ तीन जुआरी रंगेहाथ जुआ खेलते पकड़े गये… गैरलाइसेंसी असलहे के साथ युवक बंदी.. चोरी की योजना बनाते हुये दो नक़बजन पुलिस ग़िरफ़्त में.. ! ’

अब इतनी मुस्तैद पुलिस प्रशासन के एक पाश हलके में डाक्टर अमित साहब इतने टीमझाम के साथ कोई पाकेटमारी तो कर नहीं रहे थे ! बाकायदा तीन-चार अदद गुर्दे एक मानव शरीर से उखाड़ कर दूसरे के ज़िस्म में रोप रहे थे । फिर अचानक ऎसा क्या हुआ कि जीवनदान का कार्य अंज़ाम देना छोड़, अपना टंडीला छोड़्छाड़ चोर सिपाही खेलने लगे, वह भी इंटरनेशनल स्तर पर ? अब यह विचारणीय है कि उनकी मिलीभगत टोली का कौन भगत पार्टी छोड़, पुलिसपार्टी में शामिल हो गया । हम तो वही जान पाये हैं जितना हमें बताया गया है । चल्लो जी, मान लो हृदय परिवर्तन हो गया होगा । यह हृदयपरिवर्तन कोई राजनीति वालों का पेटेंन्ट थोड़े ही है ?

” ना जी ना, ये हिरदय परीवरतन वगैरा कुच्छ ना है, बदकिसमत की सैटिंग गड़बड़ा गई है अभी, नाट्क कर रहे हैं, स्साले ! सौदा नहीं पट रैय्या था, सुरसा की तरह मूँ फाड़ दिया, बस्स इतना ई समझ लो । ” बड़ा बेबाक बयान है तेरा तो, चौधरी ? अपने कम्प्यूटर के इंटरनेट पर छाप दूँ, यह ? सारी दुनिया देखेगी । “  ओए मैं के डरता किसी से ? तू अप्पणी सोच, छाप दे जो तेरे में हिम्मत हो, बच्चा बच्चा जाणता यू तो ! ग़ल्त बात नहीं करता मैं, छाप दे , छाप दे , दुणिया देक्खेगी तो मेरा क्या उखाड़ लेगी ? “  बड़ी साँप छछूँदर की हालत हो गयी मेरी, चुप मार गया ।

मैं गैरजिम्मेदार ब्लागिंग से परहेज़ करता हूँ, मित्रों । जब तक सर्वर से हटाया ही न जाय, जो कि आम तौर पर कम ही होता है तो हमारे द्वारा अद्द्यनित बोले तो अपलोडित एक एक शब्द शाश्वत हो जाता है । हिंदी ब्लागिंग का शैशव है तो क्या, है तो आने वाले कल की धरोहर ! अब करूँ क्या ?    ई अमितवा के पकड़े जाने तक जरा चुप करके बैठो तो, नहीं तो तुम ही पकड़े जाओगे ,बेकार में !   मैं इस बंगालन ( मेरी पत्नी, और कोई दूसरा नहीं भई ) के नसीहतों से आज़िज़ रहता हूँ  ।              हरदम धुपुड़-पुकुड़ , डरपोक शिरोमणि ! फिर भी पंगा कौन ले , लिहाज़ा खाली पीली बैठा अपना कुंजीपटल मतलब कम्प्यूटर महाशय का कीबोर्ड खुज़लाता रहता था ।

अब अमित पकड़े जा चुके हैं, मीडिया उनको किडनी किंग, किडनी डान और पता नहीं किन कि्न विभूषणों से नवाज़ कर तृप्त हो चुकी है । न्यूज़ चैनल भी जब तक अमित ताज़ा माल थे, अपनी अपनी हाँक लगा कर, अब दूसरे गार्डेन फ़्रेश एक्स्क्लुसिव बाइट के फ़िराक में , ‘ छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी ‘ गुनगुना रहे हैं । ऎसे में मुझे वृतृष्णा सी हो रही है । क्या मैं फ़िल्मी पुलिस की तरह अवतरित होना चाहता हूँ ? लो यह डाक्टर साहब अब पधारे हैं !  ना जी ना !

मैं तो मुद्दे को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रहा हूँ, अभी बहुत साँस बाकी है ! ऎसा भी नहीं है कि मैं अनर्गल प्रलाप कर रहा हूँ, एक अपराधी के वास्ते ( आखिर इन महाशय को डाक्टर बोला ही क्यों जाय, भला ? ) क्या आपको वृतृष्णा नहीं हो रही ? तो फिर ?

फिर क्या ?  लिंक लगाइये और देखिये कितने पेज़ खुलते जाते हैं । शायद आपका सिस्टम ही हैंग करने लगे ! यह रिस्क न लें, यह काम आसान करने में थोड़ी बहुत सहायता तो  मैं कर ही सकता हूँ। आप बस केवल एक नज़र इधर भी दौड़ायें ।

अंग प्रत्यारोपण के अपने लचर कानून को देखें । सरकार गिराने से ज़्यादा ज़रूरी एक मज़बूत कानून बनाना है कि कुछ और ? अपने उस विकृत आर्थिक तंत्र में झाँकें, जो कुछेक हज़ार रुपये के लिये तरसते आदमी को पच्चास हज़ार परोस कर कहाँ तक ख़तरा मोल लेने को मज़बूर कर सकता है ? ‘ हल्ला-बोल ‘ में वह बेबस लड़की ( नाम नहीं, मुझे तो सिर्फ़ किरदार ही याद रहता भाई ) वकील साहब की फ़ीस भरने वास्ते अपना गुर्दा स्वेच्छा से बेच आती है, बिना किसी धोखे और अमित के ! गुर्दा बेचने का फ़ैसला लेना बड़े दिल-गुर्दे वाले का काम है । क्या एक षड़यंत्र का पर्दाफ़ाश करने  और  पैसा-पावर-पब्लिक की तिकड़ी से लोहा लेने को ऎसे ही विकल्प दिखाये जायेंगे ? ‘ साहेब ‘ का बेरोज़गार युवा अनिल कपूर अपनी बहन का दहेज़ भरने को अपना गुर्दा बेच आता है । यह कौन  षड़यंत्र चल रहा है , या यह षड़यंत्र कौन चला रहा है ? यह आप जानो । मेडिकल टूरिज़्म ? किसके दिमाग की उपज़ है ? अपनी मायोपिया तो बस इतना ही देख रही है कि ख़रीदार हैं, तो मार्केट भी है, मार्केट है तो तिज़ारत की गरज़ से व्यवसायी भी पैदा होंगे । इनको कुचलने का स्वांग क्यों ? आख़िर इसी मार्केट के लिये ही तो आप मेडिकल टूरिज़्म का तामझाम फैलाय रहे हो अउर नहीं तो क्या कोनो गुर्दा मैन्युफ्रैक्चरिंग युनिट धरी है, इहाँ ?

का कर लोगे भाई ( बतर्ज़ फुरसतिया गुरु ) ? जब कुछ कर ही नहीं रहे हो तो चुपचाप घर में बैठो । अख़बार बाँचो, बोरियत से जंभाई लइकै टी०वी० पर थोड़ा बहुत तमाशा देख लेयो अउर सो जाओ ।  कुछेक लोग बुद्धिजीवी कहात हैं, बड़ी इज़्ज़त है, कालम वालम भी लिक्खै को पाय जात हैं । थोड़ी देर को कव्वारौर मचा के दूसरा मुंडेर तलाशेंगे । हम सब मोटी चमड़ी के इंडियन हैं, हमको कोई भी कष्ट ज़्यादा देर नहीं सताता । मध्यम वर्ग आँसू सूखते ही अपने काम में लग जायेगा । नवज़वान तो लैक्टोज़न , अमूलस्प्रे वगैरह ही पीकर बड़ा हो रहा है, बेचारा माँ के दूध की लाज़ का मर्म क्या समझेगा ? माँ के दूध पीने के पाप से बरी है वह ( शायद हम भी ! ), अलबत्ता हर बंदे ने अपनी बीबी का दूध अवश्य ही पिया है ( यह ध्रुवसत्य है महाराज ! ), नहीं पिया है तो पियेंगे ! चुपचाप पी लो और अच्छे बच्चे की तरह निन्नी कर लो, कल सुबह फिर ज़िन्दगी की पाठशाला में समय से पहुँचना है ! यह सब तो चलता ही रहेगा …

आपसे भी आग्रह है कि इस ब्लाग को कत्तई सीरियसली न लें ।                      कम से कम मैंने तो सीरियसली नहीं लिखा है कि हम एक भ्रष्ट समाज़ की भ्रष्ट व्यवस्था में एक निंतांत भ्रष्ट जीवन जी रहे हैं, वरना  मेरे भगवान जी नाराज़ हो जायेंगे ! जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये …..