ये डाक्टर…. वाह डाक्टर !
क्रम – दो * अब आप उपभोक्ता मात्र हैं
सेन्चुरीज़ एगो रहीम बाबा कहिन 
निज कर क्रिया ‘रहीम’ कहि, सुधि भावी के हाथ ।
पांसे अपने हाथ में, पर दाँव न अपने हाथ ॥
काश उनके समय में ही मुआ उपभोक्ता संरक्षण लागू हो गया होता, तो एक सशक्त पैरोकार डाक्टरों के पक्ष में होता । ख़ुदा आपसब को उम्रदराज़ करे ताकि आने वाले अगले दस बारह साल की स्थिति कैसी हो सकती है, आप स्वयं देख लें । ट्रेज़ेडी है या कामेडी, मुझसे परिभाषित नहीं हो पा रहा है ।
2007 – बच्चे का बाप गिड़गिड़ा उठता है, ” मुझ से जो भी बन पड़ेगा, आपकी सेवा करुँगा डाक्टर साहब । जितना भी लगे लगाऊँगा, मेरे लाल को ठीक कर दीजिये । मेरे घर का यह इकलौता चिराग है, साहब । ” डाक्टर मुआयना करता है, आँख, जीभ, पेट इत्यादि इत्यादि देख मर्ज़ की थाह लेता है , नुस्ख़ा वगैरह लिखता है । ” केस सीरियस है, दवा ले आइये और दो दो घंटे पर देते रहिये, पॆट की सिंकाई तारपीन से करते रहिये, फिर कल हाल बताइये ।” कातर हो बाप पूछता है, ” बच्चा ठीक तो हो जायेगा न साहब ? ” सांत्वना में डाक्टर पीठ थपथपाता है, ” भगवान मालिक है, उसकी इच्छा । अभी कुछ कहना उचित नहीं, भरोसा रखिये । सब ठीक ही होगा ।” बाप अपनी भिंची मुट्ठी डाक्टर की तरफ़ बढ़ाता है, डाक्टर ना-ना करते हुये भी उसको अपनी ज़ेब में फ़ीस ठूँसने का पूरा मौका देता है । पुकार लगाता है, “नेक्स्ट ” यानि अब दफ़ा हो लो, कल आना ।
2017 – ‘ओए डाक्टर, मेरा इक्केल्ले का छोरा बिम्मार है, इसको नूमोनिया बतावे हैं । तू भी इक बारि देख ले और और ठीक ठीक बतईयो कि चंगा करने के क्या लेगा । पूरी फ़ीस पेशगी लेले लेकिन छोरा कल शाम तक सही कर दे । परसों इसका जनमदिन मनना चाहिये । तू भी चा पानी को आ जईयो लेकिन ठीक न हुआ तो मैं छोरण वाला नाहिं, सिद्धै कोरट में घसीट लूँगा तेरे को !” डाक्टर साहब सिर से पैर तक मुआयना करते हैं, ‘कुछ खास नहीं चौधरी जी, सर्दी लग गयी है । और वह कांपते हाथों से मन ही मन हनुमान चालिसा का रीविज़न करते हुये कुछ लिख लाख के एक पर्चा बढ़ा देते हैं, दवा लिख दी है, दो दो घंटे पर देते रहिये । आगे भगवान ही मेरा मालिक !’
दोनों ही स्थितियाँ अतिरंजित चित्र प्रस्तुत करती हैं लेकिन डाक्टर मरीज़ के पवित्र एवं विश्वास से लबरेज़ रिश्तों में सेंध तो लग ही गयी है । नुकसान तो अंत्वोगत्वा रोगी का ही ज़्यादा है, भले ही कोई डाक्टर की निष्ठा पर चिल्ल-पों मचाये । गंभीर केस या इमर्ज़ेंसी में डाक्टर अपनी सेवा देने को बाध्य नहीं होंगे । हिप्पोक्रेट शपथ की दुहाई मत दो, भाई ! कोर्ट में हिप्पोक्रेट खड़े होने तो आयेंगे नहीं, तो उनको क्यों घसीट रहे हो ,इस उपभोक्ता संरक्षण से उनका क्या लेना देना । सेवा भाव जा रहा है, तेल लेने । पहले अपनी जान बचाओ फिर मरीज़ की सोचो । मरीज़ या कोई भी नश्वर मानव एक दिन काल कलवित होगा ही, कम से कम डाक्टर के दरवाज़े तो उपभोक्ता बन के न ही मरे । मरे तो अपनी मौत से पहले मेरे कागज़ पत्तर मज़बूत करता जाय, ताकि टेस्ट रिपोर्ट साबित कर दें कि मरने में ही इस मरीज़, समाज और देश की भलाई थी तो कोर्ट से राहत तो मिल जायेगी, भला !
लापरवाही की सज़ा तो मिलनी ही चाहिये, हर किसी को । चाहे वह डाक्टर ही क्यों न हो । बाँयी आँख में समलबाई, दाँयी आँख बाहर ! ट्युमर बाहर तो तौलिया अंदर ! किंतु ऎसी स्थितियों के निपटारे के लिये अनेक कानूनी रास्ते हैं, आपराधिक एवं MCI से निर्धारित धारायें सब पर एक समान लागू होती हैं । फिर मूलभूत स्वास्थ्य सुविधायें नगण्य स्तर पर मुहैय्या कराने वाले देश में ऎसा अनोखा एक्सपेरिमेन्ट क्यों ? संडास की सड़ाँध कहीं इत्र की शीशी उड़ेलने से जायेगी ?
मन में सेवा भाव एक अलग मुद्दा है, किंतु उसके होते हुये भी कोई फोकट में तो ईलाज़ करने से रहा। अच्छी खासी रकम और समय लगता है, उसके अखाड़े में उतरने तक । उसका स्टार पीरियड 15-20 वर्ष में ही सिमट जाता है, सरकार द्वारा जायज़ ठहरायी गयी कैपिटेशन फ़ी भी हज़ार-पाँच सौ की नहीं है, फिर इसका रिटर्न कैसे मिलेगा । लूट कर ? कदापि नहीं, बशर्ते इस राशि को यदि आप लूट समझने के पूर्वाग्रह से पीड़ित न हों । कोई ज़रूरी नहीं कि यह पूरी की पूरी पूँजी ससुर जी से ही वसूल हो जाय, कितना दे देंगे ? माँ बाप का ऋण चुकाना है, बच्चों के लिये ‘चार पैसे’ जोड़्ने हैं । स्वास्थ्य बीमा योजनायें क्यों नहीं लागू की जाती , मारूति इंश्योरेंस की तरह मरीज़ जमा करो – मरीज वापस ले जाओ । खर्चा इंश्योरेंस वाले निपटेंगे । ऎसी भी मायोपिया क्या है, कि आपके चश्मे से हरदम पश्चिम ही दिखे । अपना घर, अपनी सीमायें देख कर ही कोई सीमारेखा निर्धारित करो ।
……….क्रमशः
| प्रिंट करें | आलेख टैमखोटीकार डॉ. अमर कुमार को January 26, 2008 समय 8:37 pm, वर्गीकरण Uncategorized. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |




about 4 years ago
बहुत सशक्त पोस्ट डाक्टर जी। मेरे ख्याल से आप अपने प्रोफेशन से रिलेटेड लिख रहे हैं, उसमें एक अलग ही जान है।