परदा उठने के पहले
आपको मज़बूर नहीं कर सकता कि आप मुझे यहाँ झेलें किंतु मेरी मज़बूरी है कि बहुत ज़ब्त करने के बाद ही मज़बूर होकर इस पन्ने पर आता हूँ ।

कहीं से आवाज़ आयी है, बल्कि कुछ गैर- ब्लागर बिरादरी के मित्रों ने भी इंगित किया है, कि मैं आखिर पाज़िटिव क्यों नहीं देख पाता ? बिल्कुल सही है मित्रों, आप सभीजन की यह टिप्पणी एवं कुछेक कटाक्ष दोनों ही अपनी अपनी सीमाओं में मुझे शिरोधार्य हैं ।
किंतु
मैं इस पन्ने पर एक ख़ास अंतर्वस्तु ( थीम ) लेकर ही आता हूँ, ठीक उसी प्रकार जैसे की हर शरीर का अपना अलग व्यक्तित्व होता है, जिससे कि वह पहचाना जाता है । और मैं इसे जीवित भी रखना चाहता हूँ । चिकित्सकों को संवेदनहीन प्रजातियों में शुमार किये बावज़ूद भी, अपने जीवन के आरंभिक दिनों से ही लेखन के प्रति रुझान होने से इतना कर पाता हूँ, यही मेरे लिये प्रर्याप्त है और यहाँ पर गैरपेशेवर लेखन की भरमार है जो कि मेरे लिये एक बहुत बड़ा संतोष है ।

यहाँ
पर कम से कम प्रबंधन और संपादक के दबाव के बिना विचाराभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है ! ब्लागिंग की तकनीक समाज को बदलने का कितना सशक्त माध्यम है, यह आप सब भलीभाँति जानते हैं, और हमसब इसके साझी माने जायेंगे, यह भी निर्विवाद सत्य है । जान बर्नर का weblog मात्र बीस वर्षों में विश्वदर्शन की कितनी खिड़कियाँ खोल देगा, स्वयं उन्होंने भी कल्पना न की होगी , उनकी रोबोट विज़डम परिकल्पना अब पूरी तरह से ह्युमैन इंटेलेक्ट प्लेटफार्म में तब्दील हो चुकी है । ज़रूरी नहीं कि केवल ‘ हल्लाबोल ‘ एवं गुदगुदात्मक लेखन ही इस अनमोल तक्नीक में सिमट कर रह जायें । और भी ग़म हैं ज़माने में, ब्लागिंग के सिवा !

ऎसा
नहीं है कि लालित्य मुझे लउकता ही नहीं, यत्र तत्र सर्वत्र ‘जित देखूँ तित लाल’, किंतु सुंदरता के साथ कुरूपता, अच्छाई-बुराई, स्याह-सफ़ेद इत्यादि नितांत तुलनात्मक अवधारणायें हैं एवं एक दूसरे के पूरक भी ! बगैर स्याह के सफ़ेद परिभाषित ही नहीं हो सकता । यदि स्याह हमें न डराता होता तो
आज़ दुनिया रोशनी से नहायी न होती । सोच सकारात्मक अवश्य होनी चाहिये किंतु विसंगत सत्य को नकार कर, कदापि नहीं । सुंदरम शायद सत्यम और शिव से छन कर ही दृष्टिगोचर होता पाता है ( यह मेरी निजी सोच है, क्योंकि दर्शन का ’द’ तो मुझसे बहुत दूर है ) । हम आगे बढ़ ही नहीं पायेंगे, यदि रास्ते के पत्थरों पर हमारी दृष्टि नहीं जाती । केवल सुंदरम को निहारते रहकर चहुँ ओर व्याप्त विसंगत व्यवस्था, आहत मन की कुंठा, धर्माधीशों के अनोखे ढोंग और जनसेवा में निहित कपितय जनों का निहित कुटिल स्वार्थ हम देखना ही न चाहें, तो बहुत ही आसान है यह तो…

” मूँदहूँ आँख, कतऊ कुछ नाहिं “, फिलहाल इस शुतुरमुर्गी सोच से मैं इस पन्ने पर तो कन्विन्स नहीं ही हूँ, सिनिकल न सही पर बँदा कोई अवधूत भी नहीं ! इति सादर ।