dataone इस निकम्मेपनी और बेशर्मी के माहौल में आपको खेद है ,

तो हुआ करे , कद्दू से !

रुकावट की वजह आपका जाती मामला है, देखीऎ, हम तो नौकरी कर रहे हैं । 2007 ब्राडबैन्ड वर्ष के रूप में प्रचारित किया जा रहा है/था । साल तो खालिये जारहा है, थोड़ा हनक दिया जाये, ई लोग बूझें तो कि हम इंडिया का प्रीमियम सर्विस दे रहे हैं । पब्लिक में कोई पहचानबे नहीं करता है, साला इन्ट्रोडक्सन देना पड़े तो बेकार है, ई नौकरिया !

भारत के महान कार्यशैली के हिसाब से तो सामान्य सी बात है, भाई देखीऎ, हमारा आपसे कोनो दुश्मनई नहीं न है, बिभाग जब पूछेगा कि साल भर में आपका विजिलेन्स एक्टिवीटी रजिस्टर में का एंट्री है, तो हम भी तो कुछ दिखायेंगे की नेहीं ? बात बहुत जायज है, मैं मुरीद हो गया साहू जी का, सच है अगर सब कुछ स्मूथली चलेगा तो इस तंत्र को कौन पहचानेगा और साल-दू साल में कोनों पार्लियामेंट में सवाले दाग दे कि स्मूथ चलने वाला सिस्टम सब तो सफ़ेद हाथी है, तौ सरकार क्या जवाब देगी ?

thumbnail5तो डंडवा हमही को पड़ा । आपको जाहिर हो गया होगा कि डाटावन वालों की वक्रदृष्टि इधर को हो गयी । ब्राडबैन्ड वाले हैं तो भला बैन्ड न सही तुरही भी न बजायें ? आखिर विजिलेंस रजिस्टर में दिखाना तो पड़ेगा के केतने कस्टमर लोगन का ब्राड किया गया ?

कस्टमर को ‘ कष्ट से मर ‘ का खुलासा होते रहना चाहिये के नेहीं ?

सो , भूमिका के रूप में दो-तीन महीनों से हर बिल में कुछ न कुछ बकाये का संदर्भ अवश्य चस्पा रहने लगा । साथ में एक scapegoat (सारथी जी, हिंदी शब्द सुझाइये ) , हां तो, स्केपगोट भी नत्थी रहता है / था कि Old bills not paid (if paid, inform details) फिर कुछ बिल नम्बर वगैरह. भाई, भैंसिया मेरी है तो का हुआ, लठिया तो गौरमिन्ट आपे को पकड़ाये है ! दिखाये देते हैं , देख लेयो । जून , जुलाई, सावन ,भादों आते जाते रहे किंतु बिल का चरित्र नहीं बदला । बदलना भी नहीं चाहिये वैसे तो, क्योंकि ज़्यादातर सरकारी तंत्र अंग्रेज़ लाट बहादुर के ज़माने से ही नहीं बदला । लेकिन इस विभाग का अस्तित्व तो अभी आया है, यहां हर काम कम्प्युटर से होता है, नया महकमा , नये ताज़े ताज़े लोग, हवा की नयी बयार आनी चाहिये अउर ई ससुर खसरा-खतौनी मांग रहे हैं , ज़मा किया तो रसीद देखाओ । ई कनेक्टिंग पीपुल कनेक्सन नहीं ज़ागीर बांटे हैं। का करें भाई, गंगाजल की सीसी अउर गीता का गुटका लेजाकर पूरा नाटक फईला दें अफिसिया में ! दिमाग में एक घंटी यह भी बज रही थी, थोड़ा ब्लागरी पर भी ध्यान दो , नया नया प्यार हुआ है , हिम्मत मरदां, लाईन मारते रहो, वरना लोग यही समझेंगे कि कमेन्ट नहीं पाया तो सरक गया, तुम भी नवजात छद्म-ब्लागरों में गिन लिये जाओगे ।

लेकिन मन को भरोसा दिया ,आजकल ई-पंडित श्रीश जी भी तो अंतर्ध्यान हैं, तउन हमार कउन औकात ? टोह लिया और पता लगा कि वह भी ब्राडबैन्ड से त्रस्त हैं तो हमारे दिमाग का माडम भी पिंग-पिंग करने लगा । एक संभावना निकली, यह ’ बाहर बैठा लड़का ‘ एंट्री पर विभाग के किसी मुफ़्तखोर से फ़ीस वसूलने की हिमाकत कर बैठा होगा । इस लड़के से( आलोक नाम है ) सर जी की कड़की नहीं देखी जाती, कोई फ़ीस न दे या मैं न लूं तो रुआंसा हो जाता है । लो भुगतो अब !

चलो फोन करते हैं, टी०डी०एम० की स्टेनों को फोन किया, जैसा कि रिवाज़ है, थोड़ी फ़र्ज़ी बातें कीं, ” ऎसे ही, मैंने सोचा हाल-चाल ले लिया जाये, और आप कैसी हैं ” इत्यादि, इत्यादि । मुद्दे पर आया, तो लेखा विभाग से सम्पर्क करके देखें, यानि वह भी आश्वस्त नहीं थीं । खैर चलिये, कर लेंगे ।

लेखा विभाग ! शायद पूरी सृष्टि का लेखा-जोखा बनाने में व्यस्त था,सिवाय अपने विभाग के । ट्रिं-ट्रिं, ट्रिं-ट्रिं, ट्रिं-ट्रिं, ट्रिं-ट्रिं का संगीत इधर मेरे कानों को छेद रहा था और उधर भैंस पगुरा रही थी। अचानक कुछ खड़-खड़ हुई,”हल्लोहः…कौन 3690 ? अच्छाहः ( एक संतोष, आया ऊंट पहाड़ के नीचे) हां हां, हां हां, हां…तो डाक्टर साहब, हम लोग क्या कर सकते हैं ? (अचानक स्वर एक मुरकी लेकर अवरोह से आरोह की ओर ) बिलवा तो कम्प्युटर से आता है, तो ठीकै होगा, ऊ काहे गलत बनायेगा !” और हम हड़क गये । गोया कम्प्युटर महोदय विभाग के आल-माईटी हों, और विधना के विधान को कौन टाल सकता है, हम इतना भी नहीं जानते।हड़कना या हड़क गये सरीखा लगना वक्त की नज़ाकत थी, सो हड़क गये! हड़का लो, हड़का लो..हम हड़क.. हड़क केऽऽ भी, तुम्हारे गीत…गायेंगे ! मैं अनायास ही गुनगुना पड़ा । महकमा ही ऎसा है !

तो हड़क-हड़क के भी उनके गीत गाने को मज़बूर यह आम आदमी , निरुपाय हो एक हिमाकत कर बैठा ( अरज़ी लेना या न लेना उनकी मर्ज़ी होती है, लिहाज़ा) एक टेलीग्राम भेज़ दिया,”प्लीज़ इन्फ़ार्म डिटेल्स आफ़ आउटस्टैंडिंग एमाउन्ट्स, बीईंग मेन्शन्ड इन बिल्स”। मेरी लाला बुद्धि आश्वस्त ! चौथे दिन अचानक मेरा फोन जैसे एनिस्थिसिया से जागा,

‘हल्लोः..3690 ? लीजिये साहेब से बात करिये”

” कहां से ?” अबे अपने मुंह से, और नहीं तो कहां से ? ( बड़ा बेतुका सवाल होता है, यह !)

“कौन, डाक्टर साहेब बोल रहे हैं?” नहीं उनकी भटकती रूह !

अरे कहिये का ? ई आपका ऎक टेलीगिराम है, इहां ! तो का मतलब है,ई टेलीगिरमवा का ?”

हमको बार-बार बताये जा रहे बकायों की डिटेल चाहिए, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके .

“स्थिती तो स्पश्टै है, डाक्टर साहेब । आप रसिदिया भेज कर देखवा कै आपौ स्पश्ट कई लियें”

यह कवायद कितनी बार होगी ? जून, जुलाई से यह सिलसिला चल ही रहा है ।

“अच्छा तो देखवा चुकै हैं, किसको देखाया नमवा बतायेंगे ?”

नाम ? यह तो ध्यान ही नहीं है । रन आउट करने सा संतोष उधर से, लेकिन मर्सी दे दी ।

“अच्छा हटाइये,एक बार कोनों लड़कवा को भेज दीजिये हमरे पास । हम सुलटा देंगे सब्ब ।”

आप कौन हैं, वह क्या जानेगा ?

“हम बरीश्ठ लेखाधीकारि बोल रहा हूं, आर-यल साहु”

देखिये साहू जी, कोई नहीं जायेगा यहांसे । आप हमें डिटेल भेज दें, बस ।

“अरे नाराज काहे होते हैं, कोई हमरा काम थोड़ो है ? ई तो रुटीन है इहां !”

प्लीज़, मैं बतकही करने के मूड में नहीं हूं, आप डिटेल भेजें, मैं तंग आ गया हूं इस लफ़ड़े से।

“जब आपै सहयोग नहिं करिएगा, तौ इहां से का सहयोग होगा ?”

यह क्या मज़ाक है साहूजी, हर महीने एक आदमी जाकर आपके पास शपथ ले कि पैसा भर दिया है, इस बार गीता, कुर्रान या गंगाजल क्या भेजूं कि आपके अभिलेख में सनद रहे !

“आप सम्मानित हैं, हम्मैं गंगाजी-उंगाजी का हउल नहिंए दीजिए, हम भि ईलाहाबादै के हंय अउर आपसे जादा गंगाजी देखें हंय । कोनो लड़का भेजे में का मुस्किल हय आपको ?”

इस बतकही से उबन हो रही थी कि एकाएक कमजोर फ़ील्डिंग के एक विन्दु पर दृष्टि गयी और मैं झपट पड़ा ( जेहि भांति चले, रघुपति के बाना) एक बात बतायें साहूजी, आपके विभाग की तुग़लकी नीति तो बिल अदा न होने की दशा में 48 घंटे की भी मोहलत नहीं देता और संबन्ध विच्छेद कर लेता है । फिर मेरा फोन भी, ब्राडबैंड भी इतने सारे बकाये के बावजूद चालू कैसे है ? तलाक नहीं दिया, ठीक ! लेकिन हरजायी तो न बनाओ , और बुलाते हो अग्निपरिक्षा को !

वह बाउन्ड्री पर कैच हो जाने से आशंकित सरीखे दो पल को दम साधे रहे, फिर संभल गये, “कइसे चालू हय अउर कइसे चालू नहिं हय, हम का बतायें ? ई तो आप बतवा टेक्निकल में ले जा रहे हंय । हम्से आप सिरिफ़ अकाऊन्ट का बात करिए अउर जादा हम नहिं जानते।”

बड़ी मोटी खाल है, यह तो ! घाघ का परनाती, जरूर बाबू से प्रोमोट हो के आया है, एकदम घिसा माल !
‘इलाहाबादी, महाफ़सादी-खावैं जूता, होवैं राजी’,* लिहाज़ा फोन काट दिया ।

अब वह शायद शेर हो गये थे या बिना दुआ-सलाम के मेरे फोन काट देने से अपमानित हो गये हों, बता नहीं सकता किंतु गली के मुहाने तक दौड़ा-दौड़ा कर भौंकने वाले कुत्ते के अंदाज में मेरा फोन लगातार चीखने लग पड़ा । मैं उससे ध्यान हटा आगे की रणनीति सोचने लगा । फलस्वरूप 30 नवंम्बर को अदा किये जाने वाले बिल मैंने जानबूझ कर नहीं दिये और 3 दिसम्बर की रात में माडम फुक-फुक, फुक-फुक हो गया , इसके पीछे क्या है, जानता तो था फिर भी सुबह उनसे फोन कर लेना मुनासिब लगा । फोन किया-नान पेमेन्ट में काटा गया है । तो ठीक !

यही मौका था, तड़ाक से ‘सूचना के अधिकार के तहत’ कवर-नोटित डाक द्वारा बिलिंग प्रक्रिया की जानकारी मांगी । जवाब तैयार हो रहा होगा, किंतु मेरा कनेक्सन चालू हो गया है ,और अपनी मंशा साफ़ रखने की गरज़ से कनेक्सन चालू होते ही बिल का भुगतान तत्काल कर दिया । विभाग हैरान है कि यह कौन सा पैंतरा है ? जैसे कि मैं पेशेवर पैंतरेबाज़ होऊं !

फिलहाल ‘कुछ तो है …’ , यह आप भी सोच रहे होंगे – भले ही न स्वीकारें !

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* यह बचपन में बनारस में सुना करता था, शायद बनारसी ईर्ष्यावश कहते हों या किसी की भी टोपी उछाल देने के अपने बेलौस अंदाज़ के चलते, यह तो नहीं जानता किंतु प्रसंगवश ही यहां उल्लेख आया है, सनद रहे कि किसी भी व्यक्ति-विशेष को परिलक्षित नहीं !