ज़वाब कोई ज़रूरी तो नहीं, फिर भी ?
RECAP: बिग-बी अपने कबीले में होने की खोजबीन से उपजे एक प्रतिक्रियात्मक पोस्ट के आगे…
अपने चहेते मंच चिट्ठाचर्चा से सूत व निट्ठल्ले की कपास को लेकर एक बेवज़ह लट्ठम-लट्ठा हो चली । नतीज़तन जुलाहे की लट्ठम-लट्ठा की प्रामाणिकता पर चंद सवाल उठे व ख़ारिज़ भी कर दिये गये । यह एक अप्रिय प्रसंग है, जो टाला जा सकता था, किन्तु… ? बहुत सारे किन्तु, जब एक प्रश्न बन कर खड़े होते हैं, तो ज़वाब माँगने लग पड़ते हैं, लिहाज़ा.. मन में यह चल रहा था कि क्या ज़वाब से मुँह मोड़ लिया जाय या अपने ब्लागिया-सिकंदर को पोरस की सीख याद दिलायी जाय, जो भी हो यह तो पूछा ही जा सकता है कि, ज़वाब देना क्या ज़रूरी है ?
पर यह ज़नाब क्या कह रहे हैं “ जब संविधान बना, तो सबसे ज्यादा अहमियत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दी गयी। अगर आप किसी की आलोचना (गलत आलोचना नहीं, बल्कि सही) को सहन नहीं कर पाते हैं, तो आपको दूसरे की आलोचना करने का भी हक नहीं है। विचारों की दुनिया में आप तभी तक जिंदा रह सकते हैं,जब तक आप दूसरे लोगों के विचारों का सम्मान करते हैं।”
सो, मेरे साहज्य को निरूत्तर करता हुआ वर्तमान स्थियों का अपना ही अलग थलग उत्तर है.. क्योंकि,
हाँ और नहीं… इस तराजू के दो पलड़े हैं….
पहले हाँ से शुरु करते हैं
वह इसलिये कि मुझे ही क्या शायद किसीको भी दंभ नहीं सुहाता
वह इसलिये कि यहाँ साँस रोके रोके दम घुटने को हैं
वह इसलिये कि हम विवादप्रिय ब्लागिंग के रहनुमा नहीं हैं
वह इसलिये कि यह स्वतंत्र ब्लागिंग है, पराधीन लेखन नहीं
वह इसलिये कि अन्य बहुत से कारण हैं, जो अकारण बताये नहीं जाते और..
वह इसलिये भी कि गुबार अभी थमता दिख नहीं रहा है
“इधर इंटरनेट पर बिखरे ज्ञान के डबरों में हर-हर गंगे करते लोग उधर इन्टरनेट की गटर-गंगा मे मनचाहा उत्सर्जित करने की स्वछंदता का मजा लेते लोग. ये जो पूछ जाएं कम, वो जो लिख जाएं कम!
मामला खतरनाक होता है जब बंदर के हाथ तलवार लग जाए या आदमी के हाथ की-बोर्ड! कॉमेडी ऑफ़ एरर्स – त्रुटियों का हास्य – गलतियों पर गलतियां और उस पर गलतियां.. पढने-सुनने वाला हंसते हंसते जब कुढ जाए तो ब्लाग लिख मारे.”
स्वतंत्र ब्लागिंग बनाम तमाम असहमतियाँ
बयान नम्बर एक बकौल स्वामी “मालूम है यार! मगर "." पूर्ण-विराम का काम भी करता है और दशमलव का भी, कम कोड मे काम हो रहा है. हम <Edi tor> नही बना रहे यार, हम जनता को सार्वजनिक शौचालय बना के दे रहे हैं ताकी वो <Internet> पे जब चहे फटा फट हग सकें … " आपको <Internet> पे कुछ हगना है? <HUG> का प्रयोग कीजिये और खुश हो जाईये!" टिन्ग-टिडि न्ग. आप हिन्दि अन्ग्रेज़ी कि खिचडी ऐसे "<" ">" मे लिख के कर सकते हो – वो ज्यदा महत्वपूर्ण है.”
तो स्वामी जी मैं आया भले देर से किन्तु हगने की प्रेरणा तो 2005 में ही आपसे प्राप्त कर ली थी, सो आज तलक हग रहा हूँ !
अब किसीको बदबू आये तो भी कोई चारा नहीं है, इस ‘लिखेला ठेलेला’ के पास !
साथ ही एक आशंकित मन जो यह बयान करता या कहता है कि
“जो हो सो हो – गेन्द अब पराये पाले मे है, जिसको जमे उपयोग करो ! हिंदी ब्लॅग वालो से निवेदन है – हिन्दी मे जवाब देने के इस टूल को ब्लॅग मे भी घुसेडने की प्रक्रिया पे विचार हो सके तो वाह – अपन इस गेम मे नये हैं मदद करो यार लोग – ये कट-पेस्ट कि झन्झट खतम हो!”
और आपने उदारतापूर्वक माँ बहन करने की छूट देदी वह अलग “एक तरफ़ तुरन्त हिन्दी की सेवा का दौरा … दूसरी तरफ़ अपने बनाए हुए टूल के इस्तेमाल की खुशी. मध्यम-मार्ग – अपन ने भी एक ठीक-ठाक सा टूल उतारा इन्टर्नेट से और बदले में अपना टूल दुरुस्त कर के हरम … मतलब फ़ोरम वालों को कोड देने की प्लानिंग – पूराने अड्डे है अपने आना-जाना लगा रहता है उधर जनता देवनागरी में मां-बहन करती रहे और क्या चाहिये जिस फ़ोरम वाले को हिन्दी लिखने कि सुविधा देना है अपने कोड कि लिन्क हाज़िर है. हिन्दी पेलने का दौरा कितना घातक हो सकता है इसका सटीक प्रमाण – पेलो और पेलने के टूल बना के दो – आखिर मेरे अन्दर का लेखक, कलाकार और शिल्पी अपना सही सन्तुलन पा ही गया – ढिंग – टिडिंग! “
साथ ही एक क्षोभ भी दिख रहा है “ Nahee yaar …. tune try kiya kya software –
भइ, मैंने ट्राई कर लिया इस को. युनिकोड नही देता! मैंने दूसरी युनिकोड फोन्ट के साथ टेस्ट किया – अपने काम की चीज़ नही है! हम को इन्टर्नेट पे लिखना है सीधे-सीधे … मेरि गान्ड क्यों जलेगी? वो १५ दिन का एव ेल्युएशन दे रहा है फिर पैसे मांग रहा है – तु पैसे दे और खरीद ले यार! हर बात लिख ले क्यों समझनी पदती है तेरे को … उपरवाले ने अच्छा-भला दिमाग दिया तेरे को, कितनी बार बोला, गन्डमस्ती करने मे जितना दिमा ग लगाता है उतना काम कि चीज़ मे लगा – लाईप बन्न जयेगी तेरी!”
लेकिन अंतिम बाजी आलोक व श्रीष जी के हाथ लगी, खैर.. छोड़िये यह बीते वक़्त की बाते हैं
किसी ज़माने में भदेस को लेकर आपकी ज़द्दोज़हद से मैं भी द्रवित हुआ था, इस आलेख पर..
ई-स्वामी से ई-पेलवान हो जाऊं ?
“आजकल हिंदी ब्लाग्स पढते हुए मेरे ज्ञानचक्षुओं में नए नए ब्रांड का गुलाबजल पडता जा रहा है. मुझे तो लगता था संस्कृत रामायण की तुलना में तुलसी की रामायण भदेस है क्योंकी वे सर्वसुलभ भाषा में हैं, कबीर और रहीम के दोहे उच्चकोटी का भदेस हैं क्योंकी वे जितने जटिल विषय पर हैं समझने-समझाने और बोलने में उतने ही आसान. श्लोकों और ऋचाओं की तुलना में भक्तिगीत भदेस है.. हीरें-काफ़ीयां-कव्वालियां भदेस हैं.
मुझे नही पता था की भाषा तब तक भदेस नही होती जब तक वो बुजुर्गों के सामने बोलने लायक ही ना बचे. बच्चों महिलाओं के सामने सम्मान खोने लायक ही बचे. क्या हम पर अपने पाठकों को ये फ़ील गुड देने का जिम्मा नही है की मै आपकी रिस्पेक्ट कन्ना चा रिया हूं! अपना ना सही अपने भदेस का तो सम्मान करो यार!
टेंशन मे नींद नही आ रही बाबा!
हिंदी के ब्लाग पढने के बाद हाल ही में मुझे एहसास तो हुआ है की मेरा ब्लाग भी सांप्रदायिक है चूंकी इसके नाम ई-स्वामी में ’स्वामी’ शब्द आता है जो जनरली हिंदू स्वामियों के लिये प्रयोग मे आता है. अब हर एक के पास नाम का मतलब निकालने की ना तो अक्ल है ना समय है. जाहिर तौर पर इस बात से कोई सरोकार नही होना चाहिये की मेरी सोच क्या है – नाम के आधार पर ही पूर्वाग्रह बनाए जाने चाहिए…..
वैसे तो अपने ब्लाग का नाम ‘ई-बुद्धा’ ‘ई-ज्ञानी’ या ’ई-उस्ताद’ भी हो सकता था लेकिन हुआ नहीं – इतने समझदार होते हम तो हिंदी ब्लागिंग करते? फ़िर सिख संप्रदाय में ज्ञानी शब्द धर्म के ज्ञान रखने वाले के लिये भी प्रयोग होता है इसलिये भी मामला थोडा लोचे वाला है. स्वयं-भू स्वामी होने के लिये ज्ञानी होने की कोई कंडिशन नही ना थी तो रख लिये नाम!
चूंकी नाम से अगर मेरे सांप्रदायिक होने का प्रमाण बन सकता है तो देसी शैली में उस प्रमाण को मिटाना जरूरी है. डर के मारे कभी कभी लगता है कोई रेडिकल स्टेप ले लूं .. लेकिन अब अचानक “ई-मौलवी” हो जाऊं, तो भी, नया लफ़डा तब भी हो सकता है! (क्या करूं यार कुछ समझ नही आ रिया!) “
खैर,इन मुर्दे आलेखों को कुरेदने से क्या लाभ ?
लेखक हो या ब्लागर, उसके शब्द ही उसकी सोच के प्रतिबिंब बन कर, यहाँ उसका प्रतिनिधित्व करते हैं.. जैसे कि यह प्रतिक्रिया, जो हमारे विज्ञान में भी साइड इफ़ेक्ट ही कहलाती है !
” डॉ. अमर को बिग बी उनके अपने कबीले के नहीं लगते, यानी मैं भी उन्हें अपने कबीले का नहीं लगता (बिग बी और मैं एक ही कबीले के हैं).वैसे बिग बी और मैं, डॉ. अमर को अपने कबीले के लग भी नहीं सकते.. हम अपनी उदारता और ओढी हुई इन्क्लूसिवनेस के चलते आम आदमी के करीब होना चाहें ना, तो भी नहीं!
देखिये, डॉ अमर एक आम आदमी हैं, हम जैसे कोई सेलिब्रिटी तो हैं नहीं… यही वजह है!….
मेरी पिछली पोस्ट में मैंने बिग बी को अपने कबीले का कहा! अगर कोई भी ७०+ आई.क्यू. वाला, लेख को पढेगा तो समझ लेगा की लेख में ‘कबीला’ एक प्रोवर्बियल/एब्स्ट्रैक्ट टर्म की तरह प्रयोग किया गया है. डॉ. अमरजी चिढ गए.. मुझे उनसे सहानुभूति नहीं हो पा रही है है क्योंकि मुझे तो बस अपने कबीले की सेलेब्रिटीज़ से ही सहानुभूती होती है! सोचा डॉ. अमर जैसे आम लोगों कों उन हालातों का अंदाज़ा होगा – जो की स्पष्ट तौर पे उन्हें नहीं था! दन्न से कम्यूनिस्टों की माफ़िक विरोध दर्ज कर दिया …असंतुष्टों की माफ़िक अमिताभजी द्वारा मात्र हिंदी में ही लिखने की मांग भी अपने ब्लाग पर धर दी! आपकी टैग है “अपन तो बस लिखेला और ठेलेला” ये कैसे चलेला? अमिताभ बच्चन जब अपना ब्लाग हिन्दी में लिखते हैं तो वे ईस्वामी को अपने कबीले के आदमी लगते हैं”
क्या सच्ची में… एक सोच का पुनःनिरीक्षण है ( मैंने मूल लेख को पढ़ने की ज़हमत भी नहीं की ) मुझे भान था कि साढ़े चार साल से हिन्दिनी चलाने वाले से मुझे बहुत कुछ सीखना है, सो यह मेरा अपना मत है, यह किसी स्वामी का विरोध नहीं था बल्कि इससे मिलता जुलता कोई नाम तक उस आलेख के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया है, बहुतों ने पढ़ा होगा इसे !
पर साइड-इफ़ेक्ट में इसके उलट किन्हीं डा. अमर को परिलक्षित करके ही उन्होंने अपने शब्दों को नाहक ही जाया किया है, अरे बंधु 50 माइनस आई क्यू ही सही, पर चासर की अंग्रेज़ी इतिहास में भी कबीले के संदर्भ को लेकर CLAN का प्रयोग है, जो बिरादरी के रूप में परिभाषित हुआ है.. यह ज्ञान क्या केवल आपको ही प्राप्त है ? ARIN व मोडरेशन की सुरक्षा में यदि आप अपने निजी शौचालय में यह दोहराते पाये जाते हैं कि..हम को इन्टर्नेट पे लिखना है सीधे-सीधे … मेरि गान्ड क्यों जलेगी ? अभिनव का सोना हो, या अमिताभ का ब्लाग यदि आपको सहसा अपने लगने लगते हैं, तो मैं क्यों आपको याद दिलाऊँ कि.. उपरवाले ने अच्छा-भला दिमाग दिया तेरे को, कितनी बार बोला, गन्डमस्ती करने मे जितना दिमा ग लगाता है उतना काम कि चीज़ मे लगा – लाईप बन्न जयेगी तेरी!
दन्न से कम्यूनिस्ट होने का अर्थ जानते हैं, आप ? अब मैं किस पर तरस खाऊँ, अपने आप पर ? पर तरस खाने के संदर्भ में अपने के साथ हमेशा आप को भी क्यों लपेटा जाता है, इस पर गौर करियेगा ! रही बात आम आदमी की.. तो मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि मैं आम आदमी हूँ, और आम आदमी के रूप में ही पहचान बनाये रखना चाहता हूँ, मैं आम आदमी इसलिये भी हूँ, क्योंकि झाबुआ के हाटों में घूम कर आम आदमियों को जंगल से बीन कर लायी चिरौंजी के बदले तौल में नमक दाल लेते देखा है, इसी वर्ष अप्रैल में 0.3 डालर ( Rs.15) के एवज़ में 12 घंटे की मज़दूरी करती झारखंड की औरतों से रूबरू हुआ हूँ, और अभी हालिया मिज़ोरम यात्रा में कलकता के साहूकारों को मात्र 2 रूपये किलो के भाव से शिमला मिर्च ( Capsicum-for your reference) ख़रीद कर ट्रक लोड करवाते देखा है । सो आपका गाली के रूप में आम आदमी का प्रयोग किये जाना तो बेकार गया कि नहीं ? यदि नहीं, तो बात ख़तम ! फिर भी याद दिलाना चाहूँगा कि.. वह आम ही हैं, जो अपने टाँगों के बीच से किसी ख़ास को निकालते हैं । यदि दो पीढ़ी पीछे जा सको, तो पूर्वजों को लोटे से चाय सुड़क सुड़क कर पीते देख पाओगे ! जब यही बिग-बी साइकिल पर कटरा से सब्ज़ियाँ लाते देखे जाते थे, या जब वह अपनी आवाज़ के चलते रेडियो एनाउंसर के तौर पर भी अस्वीकार कर दिये गये थे, तब आप किस कबीले में शुमार होते थे ? तब भी आप कबीला ढ़ूँढ़ ही लेंगे, नान सेलेब्रिटी होने का !
यह तिवारी जी तो बड़े सुलझे माने जाते हैं,फिर भला क्यों ऎसी बेतुकी हाँकने की ज़ुर्रत कर बैठे
जरा बानगी लेंगे ? चलो, यह लेख इतना बड़ा हो रहा है, तो यह भी आज यहीं समेट दिया जाय
“…..अब ये ईस्वामी क्या हैं.. मैं नहीं जानता.. वे सनक, सनन्दन, सनातन हैं या सनत्कुमार.. हो सकता है कुछ लोग जानते हों.. मैं नहीं जानता.. हाँ उनके हाल के एक डर के बारें में ज़रूर जान गया हूँ.. उन्हे डर है कि साम्प्रदायिकता के इस (ऑफ़ कोर्स आर्टीफ़ीशिएल) हल्ले में उन्हें साम्प्रदायिक समझ लिया जायेगा.. इस पर मेरा जवाब उन्हे यह है..
साम्प्रदायिकता के मसले पर आप न ही बोलते तो कम से कम हमें आप के बारे में भम बना रहता.. पर बोल के आप ने खुद ही अपना कचरा कर लिया.. अब तो पोल खुल गई कि आप की समझ भी उतनी ही संवेदनहीन है जितनी एक बहुसंख्यक समुदाय के किसी खाते पीते व्यक्ति की होती है.. क्या समस्या है.. क्यों गला फाड़ रहे हो? थोड़ी शांति रहने दो.. हर चीज़ में साम्प्रदायिकता साम्प्रदायिकता.. हद कर रखी है तुम लोगों ने.. छी.. कब तक इस तरह का ज़हर फैलाओगे..आदि आदि.. इस प्रकार के विचार आप के नारद समुदाय में कूट कूट के भरे हैं.. “
लगता है, अभय जी को कुछ और गहरे उतरते हुये भी देखना पड़ेगा, आख़िर वह क्यों बाध्य हुये यह लिखने को, कि…
“ समझ रहे हैं..? नहीं.. आप को ये नहीं समझ में आएगा.. क्योंकि आप बहुसंख्यक संवेदनहीनता के शिकार है.. और फिर देश से बाहर भी हैं..आप अपने सपने को भयानक कह रहे हैं.. माफ़ करें आप नहीं जानते कि भय क्या होता है और भयानक क्या होता है..
आप लोगों ने एक समय में देश से बाहर रह कर अपनी ज़मीन से अपनी भाषा से जुड़े रहने के लिए एक सचेत कोशिश के तहत एक सार्थक मंच बनाया.. हम आप के उस योगदान को समझते हैं.. उसकी एक वक्त तक एक भूमिका थी.. पर हर चीज़ की तरह उस भूमिका की भी एक सीमा है.. पिछले कुछ महीनों में आप के इस मंच से जो लोग जुड़े वे अलग ज़मीन और पृष्ठभूमि से आते हैं.. आप उनकी ज़रूरत और जज़्बे को नहीं समझते.. वे विदेशी ज़मीन पर अपनी भाषा को जिलाये रखने की चिंता से ग्रस्त नहीं है.. उनका आकाश दूसरा है.. आप की खिड़कियों से वो नज़र नहीं आयेगा..
आप अभी भी नारद को एक किटी पार्टी समझ रहे हैं..जबकि इस में आजकल बहुत सारे भूखे नंगे अवर्ण अछूत आप की पार्टी स्पॉयल करने घुस आए हैं.. आप के पास दो ही रास्ते हैं या तो अपनी समझ को परिमार्जित कीजिये और इस मंच को शुद्ध व्यावसायिक स्तर पर दुबारा खड़ा कीजिये.. या अछूतों अवर्णों को बाहर कर के अपने घर के दरवाजे और कस के बंद कीजिये.. और चालू रखिये अपनी किटी पार्टी को..”
जो भी हो, मुझे क्या ? बड़े उदार हैं आप, आपने तो कृपापूर्वक उनको टिप्पणी भी दे दी…
“…….व्यक्ति, उसकी छवि, उसके व्यक्तिगत सरोकार, उसके ब्लाग, ब्लाग की एक पोस्ट और उसके अन्य इन्टरनेट सरोकारों को ऐसे मनघडंत सुविधाजनक कनेक्शन्स में जोड कर देखा जाना और फ़िर तुरत-फ़ुरत राय प्रकाशित किया जाना कितना सही है? ऐसे जजमेंटल लेखन का क्या मूल्य हो उस पर प्रतिक्रिया ही क्यों करूं? प्रतिक्रिया इसलिये की अब तक मैं आपका प्रतिक्रिया करने जितना पूरा सम्मान करता हूं भई ! नज़र-अंदाज़ नही करता ! “
अब स्वामी जी लाख टके का सवाल … Sorry Sorry Sorry, लेट मी बी मोर क्लीयर, So, pondering over a million dollar question कि आपकी यह नीति अभी की हालिया साइड-इफ़ेक्ट लिखते समय, आखिर किस अंतरिक्ष में बिला गयी थी ? इन्फ्लेटेड अहं को ठेस पहुँच गयी क्या.. वह भी इंडिया से सीधे अमरीका ? अरे धत्त, ऎछा नेंईं करते !
मैं तो आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुधरने के प्रयास में लगा ही हूँ, अब सार्वजनिक शौचालय की छोड़िये, जो बीत गया वह लौटेगा नहीं..आप चाहें तो भी नहीं लौटा सकते, सबजन मिलि के अब आगे की सुधि लेय…. सो, कृपया यह तो बता दें कि आपको किस नाकामयाब सुधारगृह ने शरण दी थी ? स्वामी लोग तो वैसे भी राग-द्वेष से दूर रहते हैं, सो यह सब तज हम अकिंचनों का पथप्रदर्शन करते रहें, बट इन अ हेल्दी वे ! सबको दर्द होता है ! हम तो जपने को तैयार हैं.. अहं ई-स्वामी शरणम गच्छामि, और यदि आप चाहेंगे तो, जयकारा भी लगाया जायेगा, जय हो ई-स्वामी !![]()
| यह पोस्ट लिखने की मज़बूरी आप समझते हैं, न ? आप तो साढ़े चार वर्षीय ब्लागर ठहरे, नहीं ? सो अहंवाद, महंतवाद या मठाधीशी वगैरह से एक आम ब्लागर को कितनी तक़लीफ़ होती है, अब आपसे बेहतर कौन समझता है ? वह कहते हैं न कि, पसंद अपनी अपनी.. ख़्याल अपना अपना.. शायद इसी ज़द्दोज़हद में नारद भी आक्सीजन माँग गये । सो, बचा खुचा हिन्दी ब्लागिंग साबूत रहने दीजिये । लिखेला-ठेलेला वाले आम मनुष्यों के लिये आपके पास क्लिक करने को एक माउस तो होगा ही ? ऎसे में उसे प्रयोग कर लिया करें, बात खत्म ! आपके आदेशानुसार आपका पुराना लिखा ही तो पढ़ रहा हूँ, वही यहाँ दिखाया भी है,पाठक यदि इसमें स्वादानुसार नमक मिर्च डाल कर पढ़ें,तो भला कोई बताये कि मेरा क्या दोष ? चरित्र-विच्छेदन या व्यक्तित्व-संधान मेरा शगल नहीं है ! इसको हनन भी न कहें, क्योंकि एक एक शब्द आपका ही है ! |
| प्रिंट करें | आलेख टैमखोटीकार डॉ. अमर कुमार को November 21, 2008 समय 12:11 pm, वर्गीकरण Uncategorized. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |




about 3 years ago
एक तिहाई आलेख में बडा मजा आया. शैली तो गजब की है. उसके बाद आलेख की लम्बाई के कारण थकावट आने लगी. अंतिंम पेराग्राफ आते आते सो गये, अत: आज कोई टिप्पणी नहीं दूँगा!
सस्नेह — शास्त्री
about 3 years ago
mujhe abhi ek din aur lagega aapki post ko chaak karne men(galat mat samajhiye, padhne me), main ise dobara padhna chahta hoon, ek-do shabd mujhe g…… achche nahi lage, achcha hota ki aap g**** kar de dete, baaki to hamesha ki tarah hi amar-vaani hai (a-mar-sing-vani nahi).
about 3 years ago
डा.साहब संयोग है कि आपकी पोस्ट पर किया कमेंट अभी गायब हो गया। लम्बा कमेंट था शायद इसलिये नेट ने उठाया नहीं। यह भी संयोग है कि आपकी पूरी पोस्ट में वर्णित सारी घटनाओं से मैं वाकिफ़ हूं। संदर्भ से कटी चीजें अक्सर गलत अर्थ भी देती हैं। स्वामी जी के शुरुआती दिनों से मैं उनके भाषा में क्रमिक परिवर्तन देखने का साक्षी हूं। अब वैसे झगड़े नहीं दिखते जो कभी हुये हैं शुरुआती दिनों में इंटरनेट पर हिंदी ब्लागिंग के लिये सुविधायें बनाने के लिये।
सब बातें विस्तार से लिखने के लिये बहुत समय चाहिये।
यह संयोग है कि मैं आपको और ई-स्वामी दोनों , किसी से भी न मिलने के बावजूद, बहुत अच्छी तरह समझता हूं। मैं यही कहना चाहता कि बिग बी का तो पता नहीं लेकिन ई-स्वामी और डा.अमर कुमार एक ही कबीले के आदमी हैं।
यह पोस्ट बहुतों के पल्ले नहीं पड़ेगी। तमाम संदर्भ दूसरे भी हैं।
आप ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैजनिया टाइप धांसू पोस्ट लिखिये। कहां आप इस चिरकुटई में टाइम खोटा कर रहे हैं। स्वामी भी देखें कि ऐसी मेल क्यों लिखते हैं कि सबका समय बरबाद हो।
about 3 years ago
भदेसपन की आइँस्टानी सापेक्षता पसंद आई।
एक साथी ब्लागर ने दूसरे ब्लागर की पोस्ट पर टिप्पणी कर तीसरे साथी ब्लागर से पूछा कि टिप्पणी कैसी लगी? तीसरे ने कहा बड़ी भद्दी है।
पहला नाराज हो गया। उसे आइंस्टानी भदेसपन समझ ही नहीं आया।
about 3 years ago
मेरे तो सिर के ऊपर से गुजर गया,शुरु किया पढ़ना पर सन्दर्भ समझ न आने के कारण छोड़ना पड़ा।
about 3 years ago
चलिए जनाब हम भी इन मुर्दे अलेखो को नही कुरेदते, बस चुप चाप टिपण्णी देते है ओर चलते बनते है, अभी आधी पोस्ट ही पढ पाया हू, आधी कल शाम को,
धन्यवाद कल का भी आज ही
about 3 years ago
कुछ लोगों का पता नहीं चलता कि आखिर चाहते क्या हैं ? कभी तो कहते हैं कि चार लाइन की पोस्ट लिखकर लोग छ: छ: लाइन की पचास टिप्प्णियाँ चाहते हैं पर जब लम्बा देखते हैं तो उससे भी डरते हैं . आपका लेख मैंने पूरा मन लगा कर याद कर लिया है
about 3 years ago
मैं एक क़तरा हूं, समुंदर में अपना वजूद क्यों खोऊँ-:)