वनगमन से लौट आने की व्यथाकथा जारी रहेगी, इससे पहले वहाँ मिला एक महत्वपूर्ण स्कूप बता देना राष्ट्रहित में है ! इसलिये आमोद प्रमोद की इस दुनिया में ’ देशहित ’ का एक ब्रेक लेने की अनुमति चाहूँगा ! अईयो साईं आला रे आला ने बहुसंख्यक राष्ट्रीय पशुवत जनता को दूसरे पायदान पर और अल्पसंख्यक होते जाते राष्ट्रीय पशु बाघ की प्राथमिकता को ऊपर क्या रख दिया.. फर्रोसै देश में मज़ाकिया एस. एम. एस. का सैलाब आया हुआ है ! हरदम जलते रहेंगे, मुये !
वन में आनन फ़ानन देश को बरबाद करने में माहिर निट्ठल्लों के दस्ते ज़ोश में आ गये है ! आ गये तो आ गये, आप?
वही तो ? मैं यूँ ही निट्ठल्ला बैठा हुआ बिनावज़ह कुड़कुड़ाया करता हूँ ! हमारा घर है, हम चाहे तो इसमें आग लगा दें, तुम्हें क्या ? घर के चिराग़ यूँ ही गुल हुआ करें, शहर में तो रोशनी आयेगी ! अरे ? यह तो एक मिसरा तैयार हो गया !
सुबह सात बजे के आसपास आँख खुलती है… दूर से आती हुई चिरपरिचित गीत की लाइनें कानों में पड़ती हैं.. ” ऎ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानीऽऽ.. मन में गुनता हूँ, अच्छा…. तो आज अगस्त की पन्द्रहवीं तारीख़ है । मन में कोई हुलस उत्पन्न होने के बज़ाये एक ख़ीज़ भर जाती है । दूसरे ही क्षण.. मन में एक कौतुक ज़ागता है, ठीक ही तो कह रहीं हैं, लता दीदी.. ज़रा आँखों में भर लो पानीऽऽ.. अहाहा, सत्य वचन दीदी, आदेश क्यों ? आँखों में जरा सा क्यों पूरा पानी भर लिया, लेकिन वह अफ़साने याद न दिलाओ, हुमायूँ जब घायल हुये हों तब घायल हुये रहे होंगे.. हम्मैं क्या, ऊपर वाले ( दिल्ली वालों ) की दया से आज पूरा देश घायल पड़ा कराह रहा है ! ► आगे पढ़िये ►
8 comments
जितेन्द़ भगत says:
April 4, 2009 at 1:58 PM (UTC 5.5)
म्ास्त है अंदाजेबयॉं।
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Arvind Mishra says:
April 4, 2009 at 3:08 PM (UTC 5.5)
बढियां फेटा है गुरू !
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Udan Tashtari says:
April 4, 2009 at 3:34 PM (UTC 5.5)
सटीक दिया!!
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रौशन says:
April 4, 2009 at 3:59 PM (UTC 5.5)
मस्त कार्टून है
लिखा कुछ ज़ियादा समझ में नहीं आया
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डा० अमर कुमार says:
April 4, 2009 at 6:49 PM (UTC 5.5)
Dear Roshan..
an attempt has been tried to make a satirical comment over present Election Scenerio !
alaa re alaa = Advani
bagh vs bahusankhyak = more priorities to priviledged than downtrodden
chiragh vs roshni= sacrifycing our sons at the cost of dreams to lead the world,
i.e. No electricity but a Nuclear Power
Insecure citizens.. victim of riots .. anarchy ets. at the cost of …. no issues, you know !
I liked you frank comment, which is rare at blogger
welcome !
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राज भाटिय़ा says:
April 4, 2009 at 7:42 PM (UTC 5.5)
अरे बाबा यह आखरी बार ही हो, साले मर खप जाये, बाकी दुनिया को चेन से रहने दे..
धन्यवाद अमर जी अच्छा आईडिया लाये है आप.्लेकिन आज आप ने दो लाईनो मै ओर कर्टून मै ही बहुत कुछ कह दिया
धन्यवाद
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विवेक सिंह says:
April 5, 2009 at 2:42 AM (UTC 5.5)
लगता है उर्दू और हिन्दी मैच नहीं कर रही बोर्ड पर !
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डॉ .अनुराग says:
April 5, 2009 at 6:38 AM (UTC 5.5)
जय हो गुरुवर
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