जनवरी-फरवरी 2008 से ड्राफ्टिया मोड में पड़े इस आलेख का आज अहिल्या-उद्धार हो रहा है.. शीर्षक था पीरन के पीर भये जुलहे  कबीर ! पोस्टो के तत्कालीन रुझान को देखते हुये कबीर साहब नेपथ्य में हो लिये । क्योंकि तब मुझसे टिप्पणियों में पूछा जाने लगा था कि आप काहे डॉक्टर हैं । मन में पलता अपराधबोध आज शमित होने को है, दर्ज़ा सात में पाठ्यपुस्तक में कबीर को पढ़ा और वह मन को भा गये… वाह, क्या बेबाकी का ग्लैमर था… काँकर पाथर जोड़ि के मसजिद लियो बनायपाथर पूजैं हरि मिलैं ता मैं पूजूँ पहाड़ । तब तक किसी को इस तरह डपटते न सुना, न देखा, न पढ़ा था । दुबारा वह हाई स्कूल के कोर्स में अवतरित हुये… फिर क्या था मैं स्थानीय रँधावा लाइब्रेरी में उपलब्ध सभी कुछ पढ़ गया । कुछ समझा और बहुत कुछ नहीं समझा, पंडित सुन्दरलाल से पूछने गया  तो उन्होंने पीठ पर बाँह मोड़ कर ताबड़तोड़ घूँसे रसीद कर दिये.. हाँफते और सुस्ताते हुये बोले, अरे समझता क्यों नहीं.. पहले  बोर्ड निकाल ले फिर एमे-बिये की बात करना । अविश्वनीय किन्तु सत्य इस आलेख में लगभग आधा भाग मेरे इन्टरमीडियेट ( 1968-69 ) के निबन्ध कापी से लिया गया है, जिसे पँडित गयाप्रसाद मिश्र ने ’उत्तम’ से नवाज़ा था । सहेजने के मामले में बड़ा होनहार रहा.. इस हद तक कि मैंनें  अपने स्व. पिता जी की जन्म-कुँडली भी सहेज कर रख छोड़ी है । पर कबीर मुझे दौड़ाते ही रहे … अपने ब्लॉगिंग कैरियर से क्रमबद्ध अवसान की इस बेला इसे पोस्ट करने का विशेष प्रयोजन है । क्योंकि आज 15 जून कबीर जयन्ती है ।kabir-ke-dohe7

कबीर के बारे में कहा जाता है कि वे कवि थे, समाज सुधारक थे । वस्तुत: कबीर अपने जीवनकाल में ही जो ‘गागर में सागर’  जैसे दोहों के    वज़ह से वह स्वयँ ही एक अलग दर्शन बन गये थे ।
भगत कबीर को हमने सन्त कबीर के रुप में जाना है, सन्त भी कविता करने वाले, समाज की विषमताओं पर व्यंग्य करने वाले । कबीर जैसे सन्त मध्यकाल की विषम व अंधकारमय समय में अपने ज्ञान का आलोक लेकर आए थे । कबीर का काल विधर्मी शासकों का काल था, जिनके पास बात-बात पर निर्दोष पर अत्याचार करने और कर वसूलने के सिवा कोई काम न था, । मुगलों का हिन्दुओं पर तो प्रकोप था ही, उस पर हिन्दु धर्म के ठेकेदार भी अपना उल्लू सीधा कर रहे थे । बेचारी जनता मुगल शासकों के प्रकोप व अपने धार्मिक अन्धविश्वासों के बीच पिसी जा रही थी । ब्राह्मण , ज़मींदार और चाटुकार लोगों का अपना वर्ग था, जो मुगलों से  बना कर रखते थे और निम्न वर्ग का धर्म व शासन के नाम पर शोषण करते थे । ऐसे में कबीर ने इस  प्रवृत्ति व धार्मिक कट्टरता के उन्मूलन का बीडा उठाया  ।

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उन्होंने पण्डितों के प्रपंच से खुलकर पूछा है उनमें शूद्रों से भला कौनसी श्रेष्ठता है ?
”काहे को कीजै पाण्डे छोति बिचारा ।
छोतहि ते उपजा संसारा ।।
हमारै कैसे लहू, तुम्हारे कैसे दूध ।
तुम्ह कैसे ब्राह्मण पांडे हम कैसे सूद ।।

छोति छोति करत तुम्हही जाय ।
तौं ग्रभवास काहे को आए ।।”
तो दूसरी ओर मुसलमानों की अजान आदि पर भी व्यंग्य किया है।
” कंकड पाथर जोड क़े मसजिद ली चिनाय।
चढ क़र मुल्ला बांग दे क्या बहिरा हुआ खुदाय।।”

कबीर ने दोनों धर्मों की कुप्रथाओं की ओर ध्यान खींच कर दोनों धर्मों के बीच सामन्जस्य करवाने की शुरुआत की थी । दोनों जातियों के दोषों को समान रूप से उजागर किया । उन्होंने दोनों के मध्य सँतुलन बनाते हुये यह फटकार लगायी ।
” ना जाने तेरा साहिब कैसा है।
मसजिद भीतर मुल्ला पुकारै, क्या साहिब तेरा बहिरा है?
चिंउटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहिब सुनता है।
पंडित होय के आसन मारै लम्बी माला जपता है।
अन्दर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।”
दोनों मतों के दोष प्रकट करने में कबीर ने पूर्ण निष्पक्षता से काम लिया है । उन्होंने हिन्दुओं की पत्थर पूजा पर भी कटाक्ष किया है _
” हम भी पाहन पूजते होते बन के रोज।
सतगुरु की किरपा भयी, डारया सिर थै बोझ।।”
तो योगियों की हठसाधना में भी कबीर ने कुछ शब्दों की अर्थ भ्रान्ति को दूर किया है।
” सहज सहज सब ही कहैं, सहज न चीन्हे कोय।
जो कबीर विषया तजै, सहज कहीजै सोय ।।”

लगे हाथ उन्होंनें धर्म के नाम पर जनता को चरा रहे योगियों और उनकी ऎय्याशियों को " योगभ्रष्टता" की सँज्ञा दी है । योगभ्रष्ट अर्थात योग के द्वारा इन्द्रियों को साधकर साधना के अंतिम सोपान तक पहुंच कर लक्ष्य से विमुख हो जाना, अथवा अपने लक्ष्य की अंतिम सीढ़ी से गिर जाना । इस तथ्य को  ‘विश्वामित्र-मेनका प्रसंग’ से भली भांति समझा जा सकता है । कबीर के अनुसार जीवात्मा व परमात्मा का मिलन ही वास्तविक योग है ।
"इस तन का दीवा करौं, वाती मेल्यूँ जीव ।
लोही सींचीं तेल ज्यूँ कब मुख देखौं पीव ॥"

उनके तीखे प्रहारों में विद्रोह, हीनता तथा वैमनस्य का भाव नहीं है । उनकी कटु उक्तियों में  स्वयं की आत्मा को तमाम विषमताओं के बीच शुध्द रखने का एक आत्मविश्वास है । यहाँ वे सुर नर मुनि की आत्मिक शुध्दता को चुनौती देते  हैं।
” सो चादर सुर नर मुनि ओढि, ओढि क़ै मैली कीनी चदरिया ।
दास कबीर जतन से ओढि, ज्यों कि त्यों धर दीनी चदरिया ।”

उन्होंने समस्त धर्मों के आडम्बरों का परदा खोल समस्त साधनाओं और सर्वधर्म का सार लेकर जनता को धर्म का अनोखा व सहज रूप दिखाया जो सर्वग्राह्य व सर्वसुखकारी था। जैन, वैष्णव धर्म जिससे कि स्वयं कबीर प्रभावित थे, के दोषों को भी कबीर ने नहीं छोडा।
” बैस्नों भय तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक ।
छापा तिलक बनाई कर, दग्ध्या लोक अनेक ।।”

साथ ही पूजा, तीर्थ, व्रत आदि का भी कबीर ने खुल कर विरोध किया।
”पूजा, सेवा, नेम, व्रत गुडियन का सा खेल ।
जब लग पिउ परसै, तब लग संसय मेल ।।”

मन को नियंत्रित रखने पर कबीर ने बहुत बल दिया है। कबीर जानते थे कि समस्त इन्द्रियों का संचालक आकर्षणों में रमने वाला यह मन ही है यदि इसे वश में कर लिया तो फिर सब कुछ जीत लिया ।
” कबीर मारुं मन कूं, टूक टूक व्है जाई ।
विष की झारी बोई करि, लुणत महा पछताई ।”
समाजसुधार या भाषणबाजी की प्रवृत्ति फक्कड कवि कबीर में नहीं थी किंतु वे समाज की गन्दगियों को साफ करना अवश्य चाहते रहे होंगे । यह प्रवृत्ति उनको सुधारकों की श्रेणी में ला खडा करती है । kabir 3

कहने का अर्थ यह कि समाजसुधारक बनने की आकांक्षा के बिना कबीर को अपने आप ही सुधारक का गरिमामय पद उनकी इसी प्रवृत्ति के चलते प्राप्त हुआ, क्यॊंकि तत्कालीन समाज  के दुःख़ से पीडित हो वह उसकी सहायता मात्र के लिए उठे । जनता के दुःख़ और उसकी वेदना से फूट कर ही उनके काव्य में जनता के दुःख़ और उसकी वेदना से फूटा आक्रोश दिखता है । मिथ्याडम्बरों के प्रति प्रतिक्रिया उनका जन्मजात गुण था । वे हर तथ्य को आत्मा व विवेक की कसौटी पर परखते थे ।  गूढ़ सत्य को सहज ढंग से वर्णित करने में कबीर का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं हुआ है ।  आज इस बेला ऎसे अनोखे फक्कड़ संत का मेरा श्रद्धावनत स्मरण ।
डॉ. अमर कुमार, 15 जून 2011