एक अस्वीकृत रचना
रोहित ने लिफाफा ला कर दिया । क्या है कहते-कहते मैं खोल कर देखता हूं । एक साथ नत्थी चार पन्ने हैं, सबसे उपर वाले पन्ने पर उपर लिखा हुआ है – अस्वीकृत रचना… उसके इर्द गिर्द बटा, घन के गणितीय निशान सहित कुछेक अंक बिखरे पड़े हैं । नीचे महीन हस्तलिपि में लिखा हुआ है अस्वी./वापस … एक स्लिप भी लगी हुई है, महोदय हमें खेद है कि हम आपकी कहानी न छाप सकेंगे । विशेषाँक के लिये कथानक में वासँतिक ग्लैमर वाँछित है । कृपया भविष्य में भी हमें इसी प्रकार अनुगृहीत करते रहें…
भवदीय इत्यादि इत्यादि
उस स्लिप पर एक लाइन से कहानी/लेख/संस्मरण/वृत्तांत/कविता/रूबाइयां/निबन्ध/लघुकथा/ अन्य ललित इत्यादि सजे हुए थे जिसमें कहानी को छोड़कर बाकी सब काट कर निरस्त कर दिये गये हैं ।
अर्थात् हे वत्स, हम आपकी कहानी न छाप सकेंगे । नीचे गड़बड़-सड़बड़ तरीके का एक अपठनीय हस्ताक्षर
मेरे मन में हठात एक गीत गूंज उठा – घूंघट के पट खोल ने तोहे पिया मिलेंगे । रोहितवे को अपनी तरफ देखते पाकर मैं निष्प्रयोजन हँस पड़ा ,’लिखा है कहानी न छाप पायेंगे जबकि यह कोई कहानी है ही नहीं ।
यह बोल चाल की भाषा में आफटरनून था, यानि लिखित भाषा का अपराह्न ।
उस अपराह्न राकेश कार धीमी करते हुए पूछता है, " सर यहां रोकना तो नही है ?
राकेश मेरी कार का अस्थायी ड्राइवर है । उस अपराह्न कार तेजी से भागती जा रही थी । लगभग आधा रास्ता तय हो गया है……कुण्डा आने को है । इलाहाबाद रायबरेली मार्ग पर बीचों बीच का कुण्डा कस्बानुमा मंडी है । हमलोग इलाहाबाद से डा. पाल से मिल कर लौट रहे हैं…रूटीन चेक-अप । उन्होंने कहा, ’ मैड्डम डाक्टर साहेब का सब टीक यै …. अब इनेको अबी रोगा नहीं है, आप सात्त आठ अफते बाद फिर से दीका लैना ।
हम परम आश्वस्ति से तृप्त मन लौट रहे हैं …. जिन्दा रहने की दावेदारी पर मोहर लग जाने की आश्वस्ति ! सामने वाली रेलवे क्रासिंग पार करने के बाद हम कुण्डा की हदों में होंगे। आकाश में घिरता पीलापन, ढलती सांझ, कई कई शादियों का निमंत्रण….. राकेश सहित हम सब जल्दी पहुंचने को व्यग्र हैं ।
हम सब यानि वाहन सारथि , मैं और मेरी पंडिताइन…
तभी राकेश कार धीमी करते हुए पूछता है, " सर यहां रोकना तो नही है ? उत्तर की अपेक्षा में पीछे को गरदन घुमाता है । डाइवर और मेम साहब ने एक दूसरे में न जाने क्या ताड़ लिया, क्योंकि दोनों ही चहेड़ी ! और इधर कार भी चाय की तलब में स्वतः ही रूक जाती है ।
बायें हाथ पर पंडित ढाबा है….ठंडा माने कोका कोला के सौजन्य से मिले बोर्ड पर मैले अक्षरों में लिखा है,पंडित रिफरेशमेन्ट ! बोर्ड के मैलेपन का आदर करते हए हमारे सहित सभी इसे पंडित ढाबा ही कहते हैं।
नमकीन, भजिया, मिर्च की पकौड़ी, मठरी, समोसा, चाय आदि अच्छी बनाता है । इलाहाबादी फ़्लेवर के समोसे और नमकीन का अँतिम पड़ाव । हरदम चहल-पहल रहती है, कुछ देशी मिठाइयां भी सजी रहती है । कुल मिलाकर यह कि इस मार्ग से आते-जाते यह हमारा परमानेन्ट रिफरेशमैन्ट अडडा था, 20 मिनट के लिये ।
एक लड़का इधर आ रहा है,इतने दिनों से देख रहा हूं, पहचान गया ढ़ाबे का यह लड़का हमेशा दौड़ कर आता है, हंसता और गुनगुना रहता है। । नाम नहीं जानता । जानने की कोशिश भी न की, वैसे आप भी या कोई और इसका नाम जान कर ही क्या करेंगे । वैसे तो भट्टी पर लगा हुआ दुबला पतला कारीगर भले इसे किसी गाली से नवाज़े, पर मैंनें ज्यादातर लोगों को इसे लड़के ही कह कर बुलाते सुना है ।
अपने हँसते हुये नूरानी चेहरे के विपरीत आज वह उदास और सहमा हुआ कनखियों से इधर-उधर देखता हुआ धीरे-धीरे इधर को आ रहा है,
आज कुछ बोला भी नहीं बस ऊँगलियों में कई गिलास फँसाये उसने अपना दाहिना हाथ खिड़की की ओर बढ़ा दिया ।
देखता हूं कि उसके बायें कुहनी पर मैली हल्दी-तेल सनी पटिटयां बंधी थी । पंडित ढाबे में गाना बज रहा है, घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे । ढाबे का वह लड़का, जो हर बार दौड़ कर आता, टेढ़ी कांपती टांगोंवाली मेज साफ करके पानी का जग और खाली गिलास रख कर एक लाइन गुनगुनाते हुये इधर आता था – घूंघट के पट खोल रे… लेकिन आज वह चुप था, अलबत्ता रेडियो दिलासा दे रहा था,’ तोहे पिया मिलेंगे ’ ।
आज चुप था वह । कुहनी पर मैली हल्दी-तेल सनी पटिटयां बंधी थी । चेहरा उतरा हुआ और बुझा-बुझा सा है ।
हर बार पंडिताइन इन लड़कों को 2-5 रूपये दे देती हैं । इसी लालच में और भी कुछ फुटकर मँडराने लगते हैं । पर आज एक बड़ा लड़का तत्परता से आकर मंडराने लगा है, सर इसको आर्डर मत दीजिएगा, महराज ने इसको निकाल दिया है । साला बहुत नुकसान करता है ।
मेरे वाले लड़के ने याचक भाव में उस बड़े लड़के को आँखों से बरजा.. और पुनः कार की खिड़की की ओर उन्मुख हुआ ।
इस बार पँडिताइन ने गौर किया तो पूछ बैठीं, यह क्या है ?
ज़ाहिर है इशारा कुहनी पर बँधी पट्टी की ओर था ।
लड़का चुप रहा फिर बोला, ’क्या ? ’
ये पटिटयां… काहे बात की हैं ?
समोसे ताजे निकल रहे हैं । चटनी अभी बनी नहीं । लड़के ने उन्हें कही और उलझाना चाहा ।
मैंने क्या पूछा है ? मेरी धर्मपत्नी ने एक-एक शब्द पर जोर डालते अपना सवाल दोहराया ।
कितना लायें… एक जगह. ? ड्राइवर का वहीं लगा दें ।
लेकिन यह क्या है ? पँडिताइन उसकी चकरघिन्नी से आज़िज़ हो गयीं ।
तेरा हाथ क्यों बंधा है ? कहते हुये उसकी बांह पर टहोका देना चाहा ।
लड़का छिटक गया ।
बोल न, क्या हुआ है ? उन्हें जैसे जिद सवार हो गयी ।
महराज ने पीटा है…
कौन महराज ?…
वही…
कौन वही ?
वही महराज जी…..लड़के ने मैली नारँगी टी-शर्ट में एक टीका-तिलकधारी की तरफ गरदन घुमा कर आँखों से इशारा किया
उस टीका-तिलक ने पैसे गिनते इधर एक उचटती दृष्टि डाली, और चीख पड़ा 6786 का आडर हो गया ? यह मेरी कार थी ।
उसने क्यों पीटा ?… पँडिताइन उत्सुक हो उठीं ।
एक गाहक का हिसाब पूरा नहीं हुआ । फिर हमसे एक गिलास भी चिटक गया था ।
तूने चोरी की थी ?
नहीं .. लेकिन वह माने ही नहीं ..
गिलास लापरवाही में तोड़ा था ?
नहीं, धुले गिलास में कमेश ने गरम चा नाय दिया था ।
तो फिर पिटा क्यों?
ये हमें बताया थोड़े ही, बस खींच कर मार दिया । कोई मेरे हाथ में थोड़े है, साहेब ।
निकाल भी दिया ।
उसकी मैली आँखें भीज आयी, " हाँ ।"
अब क्या करोगे ?
कुछ नहीं.. यहीं पड़े रहेंगे ।
फिर…. ? यह सब सुनते हुये मैं भी असहज हो चला था
कुछ नहीं… महराज जी पीटकर छोड़ देते हैं, फिर दुबारा काम पर लगा लेते हैं । वह पपड़ाये होंठों में मुस्कुरा उठा !
बड़ा वाला लड़का लपकता हुआ इधर को आया, एक छोटी पर्ची पकड़ायी, " उन्नीस रुपिया ।"
अच्छी तरह कार के अँदर झाँका, कोई गिलास बरतन तो नहीं छूटा है ?
पँडिताइन नें कुहनी पर पट्टी वाले लड़के को दो-दो के दो सिक्के दिये ।
कार चल पड़ती है। पंडिताइन और मैं दोनों ही एक दूसरे को देखते हैं, उनकी बेबस बुदबुदाहट फूटती है पता नहीं इनके मां-बाप इन्हें कैसे छोड़ देते है ? पर, मन बेचैन हो रहा था.. मारात्मक रोग से जीत जाने की गुनगुनाहट न जाने एक झटके में कहाँ हवा हो गयी थी । मै क्या जवाब देता….मन में चल रहा है सम्भवतः यह मासूम उनकी एक अस्वीकृत रचना के रूप में आया हो । यत्र तत्र बिखरे पतझड़ों में वासँतिक ग्लैमर… हुँह ! ज़रूर बेबस ने बोझिल मन से अपनी असहायता पर रोया गिड़गिड़ाया होगा ….. मालिक हम इसे पाल न पायेंगे, बस इसके पेट का जुगाड़ लगा दो । इधर सँपादक जी को चाहिये वासँतिक ग्लैमर… हुँह माई फुट ! हद है यार.. कहाँ पाऊँ, यत्र तत्र बिखरे पतझड़ों में वासँतिक ग्लैमर…
एफ. एम. रेडियो के जरिये कार में भी कमबख़्त हमारा पीछा करती हूई घुस आयी है…घूंघट के पट खोल रे…. हेंहें हिंया हिहेंगे… घूंघट के पट खोल हें…. होंहें हिंया हिहेंगे… ड्राइवर झूम रहा है…. होंहें हिंया हिहेंगे
ठीक इसी के बाद दूसरे एक और गाने का प्रवेश…..
आप भी सुनिये
| प्रिंट करें | आलेख टैमखोटीकार डॉ. अमर कुमार को June 12, 2011 समय 7:55 am, वर्गीकरण अकहानी, वर्गविहीन. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |




about 8 months ago
from Khushdeep Sehgal
to dramar21071@gmail.com
date 12 June 2011 08:29
डॉक्टर साहब,
टिप्पणी प्रकाशित नहीं हो रही, इसलिए ईृ-मेल कर रहा हूं-
जो खिल सके न वो फूल हम हैं,
तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं…
ये वो बचपन है, जिसे दुनिया में आने के चंद साल में ही बुढ़ापे में डायरेक्ट एंट्री मिल जाती है…
जय हिंद…
सादर
खुशदीप
about 8 months ago
यत्र तत्र बिखरे पतझड़ों में वासँतिक ग्लैमर… हुँह !
अस्विकृ्तरचना को बिम्ब बना कर कमाल की कहानी लिखी है। शुभकामनायें।
about 8 months ago
आपका अंदाज़े बयां जुदा है…
सटीक और मारक…
आभार
about 8 months ago
मेहरबानी कद्रदानों की !
about 8 months ago
`कहानी’ स्वीकृत कर ली गई है
बहुत मार्मिक संस्मरण के लिए आभार डॉक्टर साहब॥
about 8 months ago
तो… इन सब के पीछे आपका हाथ था…
about 8 months ago
रचना सचमुच दिल को छू जाने वाली है। और हां, कमेंट बॉक्स के ऊपर मैटर की सेटिंग भी लाजवाब कर गयी।
———
हॉट मॉडल केली ब्रुक…
लूट कर ले जाएगी मेरे पसीने का मज़ा।
about 8 months ago
कई बार ये मासूम किसी अस्वीकृत रचना से नहीं आते….बल्कि एक वजनी लिफाफा होते हैं….
पैसे की लालच में इनके माता-पिता…इस तरह के ढाबा…होटलों वगैरह में इन्हें लगा देते हैं…होटल मालिक की गाली-गलौज..मार-पीट और पता नहीं क्या…क्या..तो ये बच्चे झेलते हैं लेकिन सही समय पर इनके पिता….पैसे अपनी जेब के हवाले करने नमूदार हो जाते हैं.
विक्षुब्ध हो गया,मन
about 8 months ago
सच है.. कई बार मुझे इनके विरोध का सामना करना है । उसके लिये यह देख लेना चाहिये कि लड़के की इच्छा क्या है ।
about 8 months ago
जाने कैसे अनजान रही अब तक इस ब्लॉग से. कई बार कोशिश के बाद भी आपके ब्लॉग का लिंक नहीं मिल सका और आज भटकते हुए पहुँच ही गई .काफी कुछ है पढ़ने को इत्मीनान से आयेंगे अब.
about 8 months ago
चलिये… देर आये दुरुस्त आयद !
वैसे आपने खोया कुछ भी नहीं है… यहाँ सब गड़बड़ शड़बड़ ही है ।
about 8 months ago
मन दुखी हो गया….पढ़ कर … याद आ गया किस तरह हर बार भीख माँगते बच्चों को साथ चलने को कहते कि हमारे घर चलो…पढ़्ने भेजेंगे…लेकिन वे नकार जाते…अनाथाश्रम में जाकर ही संतुष्टि पा लेते बस… .
about 8 months ago
मीनाक्षी जी, पहले बच्चे की मँशा और उसमें छिपी प्रतिभा को टटोल लेना चाहिये, वरना सिर मुड़ाते ओले पड़ने की कहावत चरितार्थ हो जाती है ।
कई अनाथालयों को देखा है, मुझे वह सुनियोजित शोषण के अड्डे लगते हैं ।
about 8 months ago
क्या कहें !
कितने बचपन ऐसे हैं जिन्हें मालूम ही नहीं कि बचपन क्या होता है.
about 8 months ago
दोषी कौन ?
about 8 months ago
गरीबी, बेबसी भी बिकती है लेकिन जब उसपर मुलम्मा चढ़ा हो। स्लमडॉग मिलिनेयर हो या भीख के लालच में अपंगता को बढ़ा चढ़ाकर उसे एनकैश करना, गलैमर तो मांगता ही है। जो वास्तविक हकदार है, वो तो महाराज जैसों से मार ही खायेगा और रोटी खाने के लिये फ़िर वही मंडरायेगा।
about 8 months ago
बिकती नहीं है, सँजय जी !
वरन बलात खरीदी जाती है, सहज और सस्ते में उपलब्ध जान खरीदार स्वतः पैदा हो जाते हैं । केवल बहिष्कार ही इसका निराकरण हो सकता है ।<
about 8 months ago
@यत्र तत्र बिखरे पतझड़ों में वासँतिक ग्लैमर
असहज ही हूँ, कहने को वास्तव में कुछ नहीं है।
about 8 months ago
डाक् साहिब, रस्मि की कै पोस्ट पढ़त रहेन, हुवाँ से हियाँ कै लिंक मिला, चला आयेन। पढ़ि के बड़ा नीक लाग। यादन मा बीती-बदरिया घुमरै लागि!!
about 8 months ago
सुधार :
@ रस्मि की कै >> रस्मी *जी कै .. सादर!