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डा. अमर कुमार

Author's details

Name: डा. अमर कुमार Dr. Amar Kumar
Date registered: January 1, 2010
URL: http://amarhindi.com
AIM: amarindia1
Jabber / Google Talk: dramar21071@gmail.com
Yahoo! IM: dramar21071@yahoo.com

Biography

जी मैं डा. अमर कुमार, जो बैठे ठाले बन बैठा ब्लॉगिया ! न लेखक रहे, न कलाकार.. पेशे की पशोपेश से अलहदा बुद्धिजीवी गोत्र के दिखने की भी एक मज़बूरी है, इस धर्म का पहला भ्रम तो यही है.. कि गाहे बगाहे, बात बेबात पक्क से अपनी राय टपका देना । बेमौसम टर्राना.. अपनी टर्र टर्र पर टर्र होकर विचरना, यहाँ तो मौके हैं मौज़ लेने के, भले सामने फ़ौज़ खड़ी हो...अपने को ख़लास करने के सैकड़ों बहाने हैं ! दुआ करिये कि टर्राने का निज-धर्म निभाते हुये अपनी ख़लिश यहीं कटती चली जाये.. यह खोटीलाल जब भी लिखेगा तो खरा ही लिखेगा

Latest posts

  1. आँखों में भरे पानी का कौतुक — August 15, 2010
  2. वह ताउम्र अज़ीब आदमी ही रहे — July 9, 2010
  3. नज़रिये का नज़रिया — July 6, 2010
  4. जात न पूछ साधो की — July 1, 2010
  5. ये कहानी है दिये की और तूफ़ान की — June 7, 2010

Most commented posts

  1. नारी – नितम्बों तक की अंतर्यात्रा — 54 comments
  2. ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये — 39 comments
  3. जैसा देश वैसा भेष — 38 comments
  4. माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू. — 36 comments
  5. ऎ वतन के सज़ीले नौज़वानों… — 32 comments

Author's posts listings

Aug
15

आँखों में भरे पानी का कौतुक

सुबह सात बजे के आसपास आँख खुलती है… दूर से आती हुई चिरपरिचित गीत की लाइनें कानों में पड़ती हैं.. ” ऎ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानीऽऽ.. मन में गुनता हूँ, अच्छा…. तो आज अगस्त की पन्द्रहवीं तारीख़ है । मन में कोई हुलस उत्पन्न होने के बज़ाये एक ख़ीज़ भर जाती है । दूसरे ही क्षण.. मन में एक कौतुक ज़ागता है, ठीक ही तो कह रहीं हैं, लता दीदी.. ज़रा आँखों में भर लो पानीऽऽ.. अहाहा, सत्य वचन दीदी, आदेश क्यों ? आँखों में जरा सा क्यों पूरा पानी भर लिया, लेकिन वह अफ़साने याद न दिलाओ, हुमायूँ जब घायल हुये हों तब घायल हुये रहे होंगे.. हम्मैं क्या, ऊपर वाले ( दिल्ली वालों ) की दया से आज पूरा देश घायल पड़ा कराह रहा है !

Jul
09

वह ताउम्र अज़ीब आदमी ही रहे

सुबह 9 बजे मोबाइल में लगा रिमाँडर ऍलार्म घनघनाने लगता है, तारीख़ 9 जुलाई बर्थडे .. 9 जुलाई बर्थडे .. बस इतना ही फ़्लैश कर रहा है । किसका है, भला ? बहुत देर तक याद ही नहीं आता कि कब किस झोंक में मैंने यह रिमाँडर लगाया होगा । दिमाग पर बहुत जोर दिया,… Continue reading »

Jul
06

नज़रिये का नज़रिया

कल रात ब्लॉगजगत के दौरे के दौरान दो स्थलों पर मतैक्य न होने का अनोखा नमूना देखा । पोस्ट लेखक और टिप्पणीकार पक्ष – विपक्ष की तरह आमने सामने डटे खड़े थे । एक स्थल पर टिप्पणीकर्ता ने राजा पुरु की तरह पीछे हटना स्वीकार किया तो दूसरे स्थल पर वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक के मध्य… Continue reading »

Jul
01

जात न पूछ साधो की

                              " यह इंसान कहलाने वाले उनके चोंचले उन तक ही रहने दे, यार ! " अभी तो मेरी पोस्ट शुरु भी नहीं हुई और यह अनपढ़ बंदर कमेंटिया कर चले जाने की फ़िराक में हैं । शायद ज़ाहिल हैं इसीलिये इस ज़ाहिली पोस्ट पर बेवज़ह उछलने लगे। अरे भाई, पढ़े-लिखों की शालीनता इसी में… Continue reading »

Jun
07

ये कहानी है दिये की और तूफ़ान की

ॐ नमः भगवते श्री अभयदाताय नमः दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः हनुमानञ्शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः अर्दयित्वा पुरीं लँकामभिवाद्य च मैथिलीम॒ समृद्धर्थो प्रतिष्ठामि समपतां सर्वरक्षताम‍॒ बहुत दिनों बाद एक पोस्ट देने की नीयत से बैठा हूँ,इधर हालात ऎसे हैं कि बिना दुष्टदलन हनुमान लला को स्मरण किये कोई पोस्ट लिखना ख़तरों से खेलने के समान हो गया है, न… Continue reading »

Jun
06

अमेरिका का राष्ट्रपति… और उसके मज़े

पिछले दिनों, करीब दो-ढाई माह पहले एक फ़ीचर पढ़ा था, “ अफ़गानिस्तान में फँसा अभिमन्यु – अमेरिका “ !  हालाँकि इसमें सामयिक वस्तुस्थितियाँ पूरी ईमानदारी से बयान की गयीं थी, पर मुझे इस फ़ीचर के शीर्षक में अभिमन्यु का होना नागवार गुज़रा था । हठात मुझे बरसों पहले एक कविता याद आयी, “ अमेरिका के… Continue reading »

Jun
05

पर्यावरण-वर्यावरण.. बहाने डा. अनुराग

डा. अनुराग की कई बार फ़रमाईश आयी कि जब तक आप नियमित लिखने का मन नहीं बना लेते, तब तक कुछ पुरानी पोस्ट का रीठेल देते रहिये । बैठा तो मैं आज इसी मँशा से था, किन्तु  लाइव-राइटर  के  नये  सँस्करण  पर हाथ आजमाते न आजमाते एक पोस्ट बन ही गयी.. ( खैर.. वह पोस्ट… Continue reading »

Apr
24

अर्श से फ़र्श तक

आज शनिवार है, या समझिये कि था, मेरे साप्ताहिक अवकाश का दिन ! शनिवार या सनीचर को छुट्टी रखने की मेरी अपनी जो भी व्यक्तिगत वज़हें हों.. पर क्या सूर्यपुत्र शनियों से भारतदेश कभी उबर भी पायेगा ? सूर्यपुत्र यानि कि  शिखर पर बैठे देपीप्यमान नीतिनियँता.. जो घूमफिर आख़िरकार देश पर मँडराते साढ़ेसाती ही साबित… Continue reading »

Apr
22

उस अनाम रेलवई वाले को धन्यवाद !

आखिर यह क्या बात हुई ? जिन सज्जनों को यहाँ खेमेबंदी की बू आरही हो, वह कृपया यहाँ से हट जायें आज तिरंगे को देख बैठे-बिठाये एक तरंग उठी, आखिरकार इस भारतदेश को आज़ादी कैसे मिली ? बड़ी अज़ीब तरह की बात है, अरे कौन नहीं जानता उस गाँधी महा-हुतात्मा को ? तो लीजिये हम… Continue reading »

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