ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये
Oct 4th
ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ?? क्यूँ ??
क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा जैसे आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, शेष आगे..>
ज़ाकिर भाई.. ओ ज़ाकिर भाई !
Aug 15th
ज़ाकिर भाई, आपकी पोस्ट देर से देख पाया । सटीक प्रश्न उठाया है, आपने । और मैं आपकी बेबाक दृष्टि का कायल भी हूँ । पहले तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि, मैं आस्थावान सनातनी हिन्दू हूँ । बहुत सारे वितँडता और प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष अनुभवों के बाद मैंने पूजा करना छोड़ दिया है । शेष आगे..>
पता नहीं क्यों ?
Jul 21st
लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ… पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, ” पता नहीं क्यों ? “ यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी शेष आगे..>
जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल
Jul 8th
आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और …………ठल्ले
उब दिनों एक गाना सुना करता था, उसे अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ भी लिया ( अभी ईस्वामी की टिप्पणी के बाद यह अँश जोड़ा है.. धन्यवाद स्वामी ! )
तो एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास शेष आगे..>
नँगे सच में नहायी बहना
May 26th
देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी, सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई, शेष आगे..>
जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये
May 17th
बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी शेष आगे..>
साक्ष्य एक अनर्गल प्रलाप का
May 10th
दोस्त हिन्दी ब्लोग की गरिमा को बनाये रखिए । विवाद मे कुछ नही मिलेगा । किसी के भी पास समय नही है इन बातों कि तह मे जाने का । हो सके तो आप विवाद का अंत करे अपनी तरफ से बढ़ावा ना दे । बिना वजह आपकी सकारात्मक ऊर्जा बर्बाद हो रही है ।
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यह कोई पोस्ट नहीं है ।
Feb 7th
टाइमखोटीकार डा. अमर कुमार लिखित एवँ वर्ग चिट्ठाचर्चा में
14 टिप्पणियाँ
यह कोई पोस्ट नहीं है । आज की ( असली और प्राचीन ) चिट्ठाचर्चा पर रतलामी भाई से असहमत होते हुये, यह टिप्पणी की तो है । पर आजकल मूँछों पर ताव देकर टिप्पणियों के डिलीट किये जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है ( हालाँकि बिना मूँछ वाले इसमें आगे हैं ), सो यह शेष आगे..>